छत्तीसगढ़
शरिया कोर्ट के तलाक फरमान पर हाईकोर्ट की रोक, दंपती फिलहाल माने जाएंगे विवाहित
Shantanu Roy
25 Sept 2026 1:18 PM IST

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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कथित शरिया कोर्ट यानी दारुल कजा की ओर से जारी तलाक संबंधी फरमान पर रोक लगा दी है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून के तहत ऐसे निजी धार्मिक निकाय को अदालत की तरह वैवाहिक स्थिति तय करने या बाध्यकारी न्यायिक आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी पूर्व में स्पष्ट कर चुका है कि दारुल कजा या ऐसे धार्मिक निकायों के फैसले कानूनी न्यायिक व्यवस्था से नहीं निकलते और अपने आप बाध्यकारी नहीं होते।
मामले में बिलासपुर निवासी उज्मा बानो पति रजा रहमान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि इदारा ए-शरिया दारुल कजा की मुहर और आदेश के आधार पर उन्हें दूसरा तलाक दिए जाने की बात कही गई है। याचिका में इस प्रक्रिया और तलाक संबंधी आदेश को चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ऐसे धार्मिक निकायों की कानूनी स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का संदर्भ लिया। सुप्रीम कोर्ट ने विश्व लोचन मदन बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि दारुल कजा या किसी अन्य नाम से काम करने वाली ऐसी संस्था का फैसला कानून द्वारा मान्यता प्राप्त न्यायिक प्रणाली का आदेश नहीं है और उसे जबरन लागू नहीं कराया जा सकता।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सितंबर 2026 के एक अन्य फैसले में भी स्पष्ट किया था कि खुद को इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट कहने वाली निजी संस्था किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति या कानूनी अधिकारों और दायित्वों का बाध्यकारी निर्धारण नहीं कर सकती। ऐसे निकाय का आदेश अधिकतम निजी धार्मिक राय के रूप में देखा जा सकता है, न कि अदालत की डिक्री के रूप में। वर्तमान मामले में कोर्ट ने तलाक संबंधी फरमान के प्रभाव पर रोक लगाते हुए कहा कि जब तक पति वैधानिक रूप से तलाक को साबित नहीं करता, तब तक पति-पत्नी को कानूनी रूप से विवाहित माना जाएगा। कोर्ट के समक्ष अब तलाक की वैधानिकता से जुड़े पक्षों पर आगे सुनवाई होनी है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी का केंद्र यह रहा कि किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति और उससे जुड़े कानूनी अधिकारों का निर्धारण कानून के तहत ही होना चाहिए। निजी धार्मिक संस्था स्वयं को न्यायिक अदालत के रूप में स्थापित कर ऐसा बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2025 के एक फैसले में दोहराया था कि ‘शरिया कोर्ट’, ‘कोर्ट ऑफ काजी’ या दारुल कजा जैसे निकायों को भारतीय कानून में अदालत के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। मामले में हाईकोर्ट ने फिलहाल तलाक के फरमान पर रोक बरकरार रखी है। याचिका पर अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को निर्धारित की गई है, जहां दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर मामले में आगे विचार किया जाएगा।
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