छत्तीसगढ़
हरी खाद से खेत होंगे उपजाऊ, बढे़गी पैदावार और घटेगी खेती की लागत
Shantanu Roy
8 July 2026 11:56 PM IST

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Raigarh. रायगढ़। कृषि की बढ़ती लागत और मृदा की घटती उर्वरता के बीच हरी खाद किसानों के लिए एक प्रभावी, प्राकृतिक और किफायती विकल्प बनकर उभर रही है। कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के प्राध्यापकों एवं वैज्ञानिकों ने किसानों से हरी खाद एवं हरी पत्तियों की खाद का अधिकाधिक उपयोग करने की अपील करते हुए बताया कि इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है तथा फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि हरी खाद के लिए ढैंचा, सनई, मूंग, उड़द, लोबिया एवं ग्वार जैसी दलहनी फसलें बोई जाती हैं। इन फसलों को बुवाई के लगभग 35 से 45 दिन बाद, फूल आने से पहले रोटावेटर अथवा कल्टीवेटर की सहायता से खेत में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। कुछ दिनों में यह सड़कर जैविक खाद का रूप ले लेती हैं, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन, कार्बनिक पदार्थ तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है।
इसी प्रकार हरी पत्तियों की खाद के लिए नीम, करंज, ग्लिरिसिडिया एवं सहजन जैसे वृक्षों की कोमल पत्तियों और टहनियों को खेत में मिलाया जाता है। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता में सुधार होने के साथ लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता भी बढ़ती है। वैज्ञानिकों के अनुसार हरी खाद से प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। इससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है, भूमि का कटाव कम होता है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होने से खेती की लागत घटती है। साथ ही फसलों की उपज में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि तथा गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया है। धान में विटामिन एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ने जैसे सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि ढैंचा क्षारीय एवं लवणीय भूमि के लिए अत्यंत उपयुक्त हरी खाद फसल है, जबकि सनई शीघ्र गलने वाली कोमल फसल है। मूंग, उड़द, लोबिया तथा ग्वार जैसी दलहनी फसलें भी मृदा में नाइट्रोजन बढ़ाने के लिए उपयोगी हैं। इन फसलों की फलियां तोड़ने के बाद शेष हरे पौधों को भी खाद के रूप में मिट्टी में दबाया जा सकता है।उन्होंने किसानों को बीज की अनुशंसित मात्रा का पालन करने की सलाह दी। इसके अनुसार ढैंचा के लिए 20 से 25 किलोग्राम, मूंग 12 से 15 किलोग्राम, सनई 25 से 30 किलोग्राम, लोबिया 30 से 35 किलोग्राम तथा ग्वार 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि हरी खाद वाली फसलों में सामान्यतः अतिरिक्त खाद की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि शुरुआती वृद्धि के लिए आवश्यकता अनुसार पोषक तत्व दिए जा सकते हैं। बुवाई प्रसारण (ब्रॉडकास्टिंग) अथवा कतार विधि से की जा सकती है। आवश्यक सिंचाई के बाद 45 दिन की कोमल अवस्था में फसल को रोटावेटर से मिट्टी में मिलाकर 7 से 10 दिन तक सड़ने दिया जाए। इसके बाद धान की रोपाई, लेही विधि से बुवाई अथवा ड्रम सीडर के माध्यम से कतार बुवाई की जा सकती है। धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) अपनाने वाले किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने ब्राउन मैन्योरिंग तकनीक को भी उपयोगी बताया। इस पद्धति में धान के साथ 2ः1 अनुपात में ढैंचा बोया जाता है। बाद में ढैंचा को नष्ट कर खेत में ही मल्च के रूप में छोड़ दिया जाता है, जिससे खरपतवार नियंत्रण, नमी संरक्षण और मृदा की उर्वरता बढ़ने के साथ धान की उपज में भी सुधार होता है। कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे हरी खाद एवं ब्राउन मैन्योरिंग जैसी पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाएं, खेती की लागत कम करें तथा दीर्घकालीन टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि की दिशा में आगे बढ़ें।
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