छत्तीसगढ़

अपनी ही जमीन का मुआवजा बांटेगी सरकार...

Janta Se Rishta Admin
29 April 2022 5:41 AM GMT
अपनी ही जमीन का मुआवजा बांटेगी सरकार...
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  1. कचना-खम्हारडीह सड़क पर ओवरब्रिज, अवैध कब्जाधारी ही उठाएंगे लाभ
  2. 570/71 खसरा का अवैध कब्जा आज तक नहीं हटाया
  3. जिला प्रशासन ने हाईकोर्ट का निर्देश भी नहीं माना
  4. रसूखदारों को लाभ दिलाने सड़क निर्माण में हुई गड़बड़ी
  5. सरकारी जमीन की बंदरबाट - कई वर्षों तक 37 एकड़ यह जमीन सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज थी, लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य गठन के दौरान वर्ष 2001 में लगभग यह जमीन अचानक निजी हाथों में चली गई. जमीन के बड़े हिस्से पर रसूखदारों के बंगले, इमारते, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और फ़्लैट बन गए। सरकारी जमीन की बड़े पैमाने पर बंदरबाट की गई। हाईकोर्ट के निर्देश पर प्रशासन ने जांच तो की लेकिन रसूखदारों के दबाव में अदालत की आंखों में धूल झोंकने के लिए कई ऐसे तथ्यों पर पर्दा डाल दिया जिससे रसूखदार अवैध कब्जाधारी बेदखली से बच सके. दरअसल जांच में शामिल पटवारियों ने 37 एकड़ जमीन पर खसरा मिटाने में गोलमाल किया. उन्होंने खम्हारडीह और मुख्य सड़क से लगी जमीन को खसरा नंबर 570 और 571 में बैठा दिया। नतीजतन सरकारी जमीन भी निजी जमीन में शामिल होकर निजी हो गई। इस मामले में प्रशासन ने कई वर्ष पुराने दस्तावेजों को खंगालना शुरू किया है. ताकि हकीकत सामने आ सके।

जसेरि रिपोर्टर

रायपुर। राजधानी के कचना-खम्हारडीह एमआर सड़क-15 में वाल्टेयर रुट पर ओवरब्रिज निर्माण के लिए केन्द्र ने 48 करोड़ रुपए की स्वीकृति दे दी है। बताया जा रहा है कि इस ओवरब्रिज का निर्माण तीन साल के भीतर हो जाएगा। जाहिर है सड़क पर रेल्वे क्रासिंग के चलते आवागमन में लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। इस बहुप्रतीक्षित मांग के पूरा हो जाने से एक बड़ी आबादी को काफी राहत मिलेगी। इसके निर्माण से लोगों की परेशानी तो दूर होगी लेकिन इस निर्माण के लिए जद में आने वाले काफी लोगों को मुआवजे का लाभ भी मिलेगा, जिससे सड़क किनारे सालों से अवैध कब्जा कर काबिज लोग उपकृत होंगे। दरअसल एमआर सड़क का निर्माण सरकारी जमीन पर स्वीकृत नक्शे और ले-आउट के विपरीत अवैध कब्जाधारियों को लाभ पहुंचाने के लिए कतिपय लोगों ने करवाया जिसमें संबंधित विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ जमीन माफिया का अहम रोल रहा है। सड़क खसरा क्रमांक 570 और 571 से होकर गुजरती है जिसके लगभग 37 एकड़ सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है जिसे हटाने के लिए हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया था जिस पर आज तक अमल नहीं किया गया। एक ओर सरकारी विभागों और जमीन माफिया की मिलीभगत से बेजा कब्जाधाधियों को लाभ पुहंचाने सड़क का नियम व ले-आउट के विपरीत निर्माण किया गया वहीं अब ओवरब्रिज के निर्माण से भी उन्हीं अवैध कब्जाधारियों को मुआवजे का लाभ भी मिलेगा। यानि सरकार अपनी ही जमीन का मुआवजा बांटेगी और अवैध कब्जाधारी इसका लाभ उठाएंगे।

हाईकोर्ट के निर्देश पर नहीं हुई कार्रवाई

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2017 में रायपुर के शंकर नगर इलाके में 37 एकड़ जमीन कब्जाधारियों से वापस लेने के निर्देश प्रशासन को दिए थे। कोर्ट ने कब्जाधारियों से छह माह के भीतर यह सरकारी जमीन खाली करने के लिए कहा था। स्थानीय निवासी खैरूनिशा फरिश्ता ने अपने अधिवक्ता के जरिए हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। इस याचिका में शंकर नगर के खसरा नबर 570 और 571 के जमीन पर बेजा लोगों के द्वारा कब्ज़ा किये जाने की शिकायत की गई थी। मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद ही वैधानिक दस्तावेजों और उसमे निहित तथ्यों के आधार पर अदालत में सरकारी जमीन पर अवैध कब्ज़ा पाया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने जमीन के जांच के आदेश देने के साथ ही स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश प्रशासन को दिए थे। प्रशासन के द्वारा अदालत में रिपोर्ट पेश की गई थी। सब डिविजनल मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई रिपोर्ट में कहा गया था कि कुछ निजी लोगों को यह जमीन संयुक्त मध्य प्रदेश के दौरान प्रशासन ने एलॉट की थी। रिपोर्ट में यह जानकारी भी दी गई है कि पूर्व में यहां बड़े और छोटे झाडिय़ों का जंगल था। मामले की सुनवाई के उपरांत हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस व जस्टिस शरद गुप्ता ने यह फैसला दिया कि अब इस जमीन को सरकार वापस ले ले। अदालत ने जमीन आवंटन की प्रक्रिया को गलत पाया। यही नहीं, आवंटन प्रक्रिया के दौरान कई क़ानूनी औपचारिकताएं भी पूरी नहीं पाई गईं। लिहाजा कोर्ट ने 6 महीने के भीतर इस जमीन को वापस लेने का निर्देश दिया था।

5 एकड़ जमीन ही गायब

जांच के बाद प्रशासन द्वारा सीमांकन की कार्रवाई के बाद तैयार फाइनल रिपोर्ट में रसूखदारों का दबदबा साफतौर पर दिखा। 37 एकड़ जमीन में से पांच एकड़ जमीन का कोई हिसाब- किताब रिपोर्ट में ही दर्ज नहीं है. 37 एकड़ जमीन के दो अलग- अलग खसरों में सिर्फ 35 लोगों के नाम दर्ज है। जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्शे और खसरे जमीन में अंतर है। जितनी जमीन खसरे में दर्ज है उससे ज्यादा जमीन नक्शे में दिखाई दे रही है। जांच रिपोर्ट में 1917 से लेकर अब तक के दस्तावेज जमा किए गए है. लेकिन ये दस्तावेज पूरे नहीं है। इसका मकसद कुछ एक कब्ज़ा धारियों को लाभ दिलाना है। आधी अधूरी रिपोर्ट तैयार कर प्रशासन ने अपना पल्ला झाड़ लिया।

अब तक जमीन खाली नहीं हुई

बिलासपुर हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट के बाद छह महीने के भीतर अवैध कब्जा हटाने का निर्देश दिया था लेकिन आज पर्यन्त उक्त आदेश पर जिला प्रशासन ने अमल नहीं किया है। जाहिर है जिला प्रशासन जमीन माफिया और रसूखदारों के दबाव में है जिसके चलते कोर्ट के आदेश को भी नजरअंदाज कर दिया गया।

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