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जेनरिक दवाइयों को डंप कराने में डॉक्टरों का गिरोह सक्रिय मोटी कमाई का टार्गेट, दवाई समय पर मिलती ही नहीं
डाक्टरों का गिरोह चला रहा है रेपऱल का रैकेट, मरीजों को भेज रहे निजी अस्पतालों में
सरकारी और निजी अस्पतालों में नहीं थम रहा मरीजों को लूटने का सिलसिला
कम मानक और कम एमजी की दवाएं बिकना आम बात, जांच करने वाला कोई भी विभाग नहीं
मोटे कमीशन के चक्कर में घटिया और नई कंपनियों के दवाईयों को रेफर कर डिमांड बढ़ाया जाता है और शासकीय खरीदी भी उसी के आधार पर होती है
जनता से रिश्ता की खबर का असर, लगातार हमने नकली दवाओं की खेप तस्करी की ख़बरें प्रकाशित की थी हमारे खबर की पुष्टि हुई
जनता से रिश्ता की लगातार रिपोर्टिंग का असर, नकली दवाओं की तस्करी पर एफडीए प्रशासन हरकत में आया, बाकी संबंधित विभागों की आंख बंद क्यों?
अब रजबंधा मैदान, मेडिकल कॉ प्लेक्स और गुरुनानक चौक, तेलीबांधा, देवेंद्र नगर में भी अवैध दवाओं के तस्करी का जल्द होगा बड़ा खुलासा
देवेंद्र नगर, मेडिकल कॉ प्लेक्स में लगातार नकली दवाओं की तस्करी की खबरें सामने आ रही, विभाग के अधिकारी पैसा वसूली में मस्त
दवाओं के नकली होने की आशंका के कारण एफडीए ने तत्काल कार्रवाई की
एफडीए ने पूरे राज्य के जिलों में सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दिए
स्नष्ठ्र ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हर संभावित जोखिम को रोकने का लक्ष्य रखा
रायपुर (जसेरि)। प्रदेश के लगभग सभी खासकर सरकारी और निजी अस्पतालों के डाक्टरों के बीच गला काट प्रतिस्पर्धा चल रहा है। मरीजों की कौन कितना गला काटता है इसको लेकर अंधाधुंध स्पर्धा के चलते डाक्टरों ने जो शिक्षा ग्रहण करते समय ओथ सेरेमनी में जो शपथ लिया था उसे तिलांजिल देकर मौत के सौदागरों के साथ मिलकर नकली और महंगी दवाई लिखकर सीरियल कीलर की भूमिका निभा रहे है। ऊपर से डाक्टरों में जो इगो हट का ग्रहण लग चुका है उसमें पैसे के अलावा और कुछ भी डाक्टरों को दिखाई दे रहा है। सबसे मजेदार बात तो यह है कि इस गिरोह में सरकारी डाक्टरों की भूमिका अहम है जो कमाई के चक्कर में निजी अस्पताल के संचालकों से मोटी रकम लेकर मरीजों को रेफर करते है। जेनरिक दवाई कोई सरकारी डाक्टर नहीं लिखता, कारण साफ है, एलोपैथी दवाई में 40 प्रतिशत कमीशन अकेले डाक्टर को मिलता है 40 प्रतिशत दुकानदार को औऱ 20 प्रतिशत दवाई उत्पादक कंपनी को मिलता है, ऐसे में कोई अपनी कमाई पर क्यों लात मारेगा। सरकारी तनखा के अलावा हर रोज 10 हजार की कमाई सरकारी डाक्टर कर रहे है।
शासन के आदेश को डाक्टर प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके हैं इसलिए शायद निजी असपताल वाले तो जेनरिक दवाई लिख ही नहीं रहे हैं अब सरकारी अस्पताल के डाक्टर भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलना चालू कर दिए हैं। सरकारी अस्पताल में भी जेनरिक दवाइयां नहीं लिखी जा रही है। मज़बूरी में मरीज के परिजनों को बाजार से मंहगी दवाई लेनी पड़ रही है। जबकि शासन का स्पष्ट निर्देश है कि जेनेरिक दवाइयां लिखी जाए। बताया जाता है की निजी अस्पतालों में डाक्टरों और मेडिकल कंपनी वालों का डील फिक्स रहता है जो भारी भरकम कमीशन के रूप में सामने आता है इसी वजह से डाक्टर जेनेरिक दवाई नहीं लिखते क्योंकि जेनेरिक दवाओं में कोई कमीशन नहीं मिलता। एक तरफ मरीजों से जबरदस्त फीस वसूलते ही हैं ऊपर से दवाई में कमीशन भी खाने के लिए मंहगी दवाई लिखते हैं। डॉक्टर इसको ईगो के रूप में देखने लग गए हैं। देखने में आ रहा है कि इगो के चक्कर में डाक्टर अपने मूल कर्तव्य से ही भटक गए है। आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने की आदत डाक्टरों में इतनी बढ़ गई है कि वो अब मरीजों से भी इसी तरह का ट्रीट कर रहे है। सरकारी और निजी अस्पतालों में इलाज कराने जाने वाले मरीज और उनके परिजनों के साथ डाक्टरों का दुर्व्यवहार थमने का नाम नहीं ले ले रहा है।
मरीज को मारपीट कर बाहर खदेड़ा : प्रदेश शासन जब छत्तीसगढ़ की जनता के लिए स्वास्थ्य संबंधित सभी सुविधाएं मेकाहारा में उपलब्ध करा रही है उसके बावजूद डाक्टरों की लापरवाही से यहां के लोगों को फायदा नहीं मिल पा रहा है। सरकार की स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के बारे में जिक्र कर दिया तो उसकी खैर नहीं देखा जा रहा है कि जूनियर डाक्टरों की उदंडता मेकाहारा में कम होने का नाम नहीं ले रहा है। आए दिन इस तरह की घटना प्रकाश में आ रही है। यह पहला मौका नहीं है जब मरीज को मारपीट कर बाहर खदेड़ा गया हो। अस्पताल प्रबंधन इस संबंध में शिकायत होने के बाद भी गरीब मरीजों की कोई सुनवाई नहीं कर रहा है। पिछले दिनों एक मरीज के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया। पीड़ित मरीज और उसके परिजनों ने बताया कि शारीरिक पीड़ा और लगातार बीमार रहने के कारण कामकाज नहीं मिल रहा है। मेकाहारा से दुव्यवहार कर भगाने के बाद उन लोग रेलवे स्टेशन जाकर गरीबों को बांटने वाले भोजन से भूख शांत किए।
छत्तीसगढ़ में नकली और अमानक दवाओं का बड़ा खुलासा, एफडीए ने किया जब्त और अलर्ट जारी
छत्तीसगढ़ में नकली और अमानक दवाओं के खिलाफ खाद्य-औषधि प्रशासन ने कड़े कदम उठाए हैं। विभाग ने संदिग्ध परिस्थितियों में परिवहन हो रही दवाओं की खेप जब्त कर जाँच की, जिसमें तीनों दवाएं अमानक और नकली पाई गईं। इस कार्रवाई के बाद पूरे राज्य में स त अलर्ट जारी कर दिया गया है। सूचना मिली थी कि नागपुर गोल्डन ट्रांसपोर्ट, गोगांव (रायपुर) में इंदौर से भेजी गई दवाओं की एक खेप को लेने कोई नहीं पहुंच रहा है और उसके नकली होने की आशंका है। इसे गंभीरता से लेते हुए स्नष्ठ्र ने औषधि-प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत निरीक्षण दल गठित किया।
निरीक्षण के दौरान जब परिवहन दस्तावेज (बिल्टी) और दवाओं की जाँच की गई, तो बड़ा खुलासा हुआ। बिल में जिन दवाओं का उल्लेख था, वे पैकेट में मौजूद ही नहीं थीं। इसके बजाय वहां तीन अन्य प्रकार की दवाएं पाई गईं। मौके पर ही सभी दवाओं के नमूने चार-चार भागों में लेकर शेष मात्रा जब्त कर ली गई और नमूनों को राज्य औषधि परीक्षण प्रयोगशाला, कालीबाड़ी (रायपुर) भेजा गया।
जांच रिपोर्ट में दवाएं नकली और अमानक
16 दिसंबर 2025 को प्राप्त जांच रिपोर्ट में तीनों दवाएं अमानक और नकली पाई गईं। ये दवाएं हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित मेसर्स जी बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड, मेसर्स जी.सी. हेल्थ केयर, और चेन्नई की मेसर्स लार ऑक्स फार्मास्युटिकल्स के नाम से निर्मित बताई जा रही थीं। इस खुलासे के बाद स्नष्ठ्र ने पूरे राज्य में अलर्ट जारी किया और सभी जिलों के औषधि नियंत्रकों को सघन जांच और स त कार्रवाई के निर्देश दिए। अमानक दवाओं के परिवहन और बाजार में संभावित उपलब्धता को लेकर विभाग ने स त निगरानी और अनुशासनात्मक कार्रवाई का ऐलान किया।
जनता और दवा विक्रेताओं से अपील
स्नष्ठ्र ने आम नागरिकों, दवा विक्रेताओं और परिवहन एजेंसियों से अपील की कि किसी भी संदिग्ध दवा या अनियमित गतिविधि की जानकारी तुरंत हेल्पलाइन नंबर 9340597097 पर दें। साथ ही विभाग ने जोर देकर कहा कि केवल लाइसेंस प्राप्त और विश्वसनीय स्रोतों से ही दवाओं की खरीद-फरो त करें। खाद्य-औषधि प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य में सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और प्रमाणिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभाग पूरी तरह प्रतिबद्ध है। विभाग की कार्रवाई का उद्देश्य जनता को नकली और हानिकारक दवाओं से बचाना और चिकित्सा सुरक्षा को मजबूत बनाना है।
संबंधित अधिकारियों ने कहा कि इस मामले की गहन जांच जारी है और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। राज्य सरकार और स्नष्ठ्र ने सुनिश्चित किया है कि भविष्य में नकली दवाओं के परिवहन और बिक्री पर सतत निगरानी रखी जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि अवमानक और नकली दवाओं का सेवन गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। ऐसे दवाओं से जीवन के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है, इसलिए केवल प्रमाणित दवाओं का उपयोग करना बेहद जरूरी है।
स्नष्ठ्र की इस कार्रवाई से यह संदेश गया कि छत्तीसगढ़ सरकार स्वास्थ्य सुरक्षा और चिकित्सा गुणवत्ता के मामले में संवेदनशील है और जनता की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। विभाग ने भविष्य में ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए नियमित निरीक्षण और सघन जांच की योजना बनाई है।
स्वास्थ्य विभाग की दुर्गति की वजह?
स्वास्थ्य अमले का फेल होने का प्रमुख कारण राजनेता और रसूखदार और सरकारी डाक्टर, अधिकारियों के पार्टनरशिप में निजी अस्पताल चलाना है । इनके धौंस या रसूख की वजह से स्वास्थ्य विभाग का चुप रहना मज़बूरी हो सकती है लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या स्वास्थ्य मंत्री भी इनके धौंस के आगे घुटने टेकने मजबूर हैं? हालांकि यह असंभव है लेकिन हालत यही बयान कर रहे हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में इन अधिकारियो के स्वामित्व वाले या पार्टनरशिप में अस्पताल चल रहे हैं। क्या यही वजह है जिसके कारण निजी अस्पताल वाले खुली लूट मचा रखे हैं। एक बार अस्पताल में घुसे यानी जिंदगी भर की कमाई इन अस्पताल मालिकों के जेब में। यह भी देखा गया है की निजी अस्पताल वाले डाक्टर वही दवाई लिखते हैं जो उनके स्वामित्व वाले मेडिकल स्टोर में उपलब्ध रहते हैं। बाजार में जो इंजेक्शन 1000 की आती है। वही इंजेक्शन 2500 रूपये में इनके द्वारा संचालित मेडिकल स्टोर में मिलते हैं। मरीज की जान को खतरा बता कर बेतहाशा कमाई करने से ये पीछे नहीं रहते। एक बीमार जब निजी अस्पतालों में पहुंचता है कि टेस्ट के नाम पर सभी टेस्ट करवा लेते हैं जिसका उसके बीमारी से संबंध ही नहीं होता फिर ईलाज शुरू करते हैं। ये सब अपने कमीशन के लिए करते हैं। सभी टेस्ट और दवाइयों में लिखने वाले डाक्टरों का कमीशन रहता है।
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