छत्तीसगढ़

बंदूक से रोजगार तक, मैत्री कैफे में बदल रही पुनर्वास की तस्वीर

Shantanu Roy
10 Sept 2026 9:21 PM IST
बंदूक से रोजगार तक, मैत्री कैफे में बदल रही पुनर्वास की तस्वीर
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छग
Narayanpur. नारायणपुर। नारायणपुर जिला लंबे समय तक नक्सलवाद की चुनौती से प्रभावित रहा है। विशेष रूप से अबूझमाड़ क्षेत्र में अनेक लोगों का जीवन हिंसा, भय और संगठनात्मक गतिविधियों के बीच प्रभावित हुआ। ऐसे वातावरण में नक्सली संगठन से बाहर निकलकर सामान्य सामाजिक जीवन में लौटना केवल हथियार छोड़ने तक सीमित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके साथ सम्मानजनक आजीविका, सामाजिक स्वीकार्यता, पारिवारिक जीवन और आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। इसी
दृष्टिकोण
के अनुरूप छत्तीसगढ़ शासन द्वारा नक्सलवादी आत्मसमर्पण, पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति-2025 लागू की गई है। नीति का उद्देश्य आत्मसमर्पित व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में पुनर्स्थापित करना तथा उन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वरोजगार, आर्थिक सहायता एवं अन्य पुनर्वास सुविधाओं से जोड़ना है। नारायणपुर में इस नीति को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित न रखते हुए व्यावहारिक आजीविका से जोड़ने की दिशा में मैत्री कैफे एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।

जिला प्रशासन, नारायणपुर द्वारा 21 जून 2026 से प्रारंभ किए गए मैत्री कैफे में पांच आत्मसमर्पित, पुनर्वासित व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध कराया गया। इन पांचों व्यक्तियों को कैफे के संचालन से संबंधित विभिन्न कार्यों में लगाया गया है। इनमें किचन एवं खाद्य सामग्री की तैयारी, ग्राहकों से ऑर्डर प्राप्त करना, खाद्य एवं पेय पदार्थ परोसना, कैफे की साफ-सफाई एवं व्यवस्था तथा दैनिक संचालन में सहयोग जैसे कार्य शामिल हैं। प्रत्येक व्यक्ति को लगभग 6,500 रूपये प्रतिमाह पारिश्रमिक प्राप्त हो रहा है। यह पहल इसलिए विशेष है क्योंकि पुनर्वासित व्यक्तियों को केवल आर्थिक सहायता प्रदान करने के बजाय उन्हें नियमित कार्य, जिम्मेदारी, आय और सामाजिक संपर्क से जोड़ा गया है। मैत्री कैफे में कार्यरत पांचों पुनर्वासित व्यक्तियों की पृष्ठभूमि अलग-अलग रही है। किसी ने संगठन में चिकित्सा संबंधी भूमिका निभाई, किसी ने कृषि से जुड़े कार्य देखे और किसी ने प्रचार-प्रसार एवं प्रेस संबंधी गतिविधियों में भूमिका निभाई।

आज वही लोग एक साथ मिलकर एक कैफे का संचालन कर रहे हैं। यह परिवर्तन केवल रोजगार प्राप्त करने का परिवर्तन नहीं है, बल्कि जीवन की दिशा बदलने का उदाहरण है। इस सफलता की कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष है आत्मसमर्पित दंपति सुखलाल जुर्री एवं कमला गोटा का एक साथ सामान्य जीवन की ओर लौटना। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सुखलाल जुर्री प्रतिबंधित माओवादी संगठन में क्टब्ड स्तर पर सक्रिय रहे तथा संगठन में चिकित्सा संबंधी भूमिका भी निभाते थे। कमला गोटा भी संगठन में सक्रिय पद पर रही थीं। एक समय जंगल में संगठनात्मक जीवन जीने वाले इस दंपति के हाथों में हथियार थे; आज वही हाथ मैत्री कैफे की रसोई में भोजन एवं पेय पदार्थ तैयार कर रहे हैं और ग्राहकों की सेवा कर रहे हैं। आत्मसमर्पण के बाद उनका जीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। अब वे शहर में किराये का कमरा लेकर रह रहे हैं। घर का किराया, भोजन, दैनिक आवश्यकताएं और पारिवारिक जिम्मेदारियां अब उनके अपने श्रम और आय से पूरी हो रही हैं। पहले जहां जीवन संगठन पर निर्भर था, वहीं अब वे स्वयं कार्य कर आय अर्जित कर रहे हैं।
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