छत्तीसगढ़

आठ एकड़ जमीन ने बढ़ाई भाई-बहन में दूरी, दशकों बाद रिश्तों में लौटा अपनापन

nidhi
26 Oct 2026 9:42 AM IST
आठ एकड़ जमीन ने बढ़ाई भाई-बहन में दूरी, दशकों बाद रिश्तों में लौटा अपनापन
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हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि रखी बरकरार

बालोद: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में जमीन को लेकर भाई-बहन के बीच शुरू हुई करीब 35 साल पुरानी कानूनी लड़ाई में बुजुर्ग महिला को राहत मिली है। डौंडीलोहारा क्षेत्र की गणेशिया बाई को अब शेष कारावास भुगतने के लिए जेल नहीं जाना होगा। हाई कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा पहले से जेल में बिताई गई 16 दिन की अवधि तक सीमित कर दी है। दूसरी ओर, परिवार के अनुसार भाई-बहन के संबंध भी सामान्य हो गए हैं और पुराने विवाद के बाद रिश्तों में फिर अपनापन लौटा है।

यह मामला केवल जमीन में हिस्सेदारी मांगने का नहीं था। विवाद के दौरान गणेशिया बाई पर अपनी मृत बहन राधा बाई की पहचान अपनाकर राजस्व कार्यवाही में पेश होने का आरोप लगा था। इसी आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला चला। अदालत से मिली मौजूदा राहत का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्हें आरोपों से बरी नहीं किया गया है। दोषसिद्धि कायम है, जबकि कारावास की अवधि घटाई गई है। इसलिए फैसले को जमीन के स्वामित्व का नया निर्णय या सभी आरोप समाप्त होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
गणेशिया बाई की उम्र हालिया पारिवारिक रिपोर्ट में करीब 80 वर्ष बताई गई है। परिवार के मुताबिक, उनके और लगभग 60 वर्षीय भाई पोषण लाल देवांगन के बीच अब पहले जैसी कड़वाहट नहीं रही। दोनों एक ही गांव में रहते हैं। वर्षों तक विवाद का कारण रही संपत्ति के बीच अब परिवार ने संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस मामले का मानवीय पक्ष यही है कि अदालत की लंबी प्रक्रिया के बाद भाई-बहन फिर सामान्य पारिवारिक संबंधों की ओर लौटे हैं।
परिवार ग्राम पासौद का रहने वाला है। सरजू राम देवांगन और उनकी पत्नी सुखबती के दो बेटे और तीन बेटियां थीं। परिवार के पास करीब आठ एकड़ जमीन थी। एक बेटी राधा बाई की जन्म के लगभग 15 दिन बाद मृत्यु हो गई थी। बाद में संपत्ति में हिस्सेदारी को लेकर विवाद सामने आया। पोषण लाल ने अपनी बहन गणेशिया बाई द्वारा राधा बाई की पहचान के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। इस तरह संपत्ति से शुरू हुआ मतभेद पहचान और दस्तावेजों से जुड़े आपराधिक प्रकरण तक पहुंच गया।
अभियोजन के अनुसार, वर्ष 1991-92 में नायब तहसीलदार, डौंडीलोहारा के समक्ष नामांतरण और बंटवारे की कार्यवाही के दौरान गणेशिया बाई ने खुद को राधा बाई बताया था। शिकायत के बाद पहचान से जुड़े अभिलेख जांच का हिस्सा बने। इस मामले में जन्म-मृत्यु पंजी और राजस्व कार्यवाही के दस्तावेज महत्वपूर्ण रहे। विवाद का केंद्र यह प्रश्न था कि कार्यवाही में जिस व्यक्ति की पहचान बताई जा रही थी, वह वास्तव में कौन था। निचली अदालत ने 30 अप्रैल 2016 को गणेशिया बाई को भारतीय दंड संहिता की धारा 419 और धारा 193 के तहत दोषी ठहराया था। दोनों अपराधों के लिए छह-छह महीने के सश्रम कारावास और 500-500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। अपील में भी दोषसिद्धि बरकरार रही। इसके बाद मामला आपराधिक पुनरीक्षण के माध्यम से हाई कोर्ट पहुंचा, जहां दोषसिद्धि और सजा से संबंधित पक्षों पर विचार हुआ।
हाई कोर्ट में महिला की ओर से दस्तावेजों और गवाहों से जुड़े तर्क रखे गए। वैकल्पिक तौर पर उनकी उम्र, मामले की पुरानी अवधि और परिस्थितियों को देखते हुए सजा में राहत मांगी गई। राज्य की ओर से दोषसिद्धि का समर्थन किया गया। उपलब्ध अदालती रिपोर्ट के अनुसार, न्यायालय ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया, लेकिन सजा के प्रश्न पर महिला को राहत दी। इस निर्णय में अपराध साबित होने और उसके लिए दी जाने वाली सजा को अलग-अलग स्तर पर परखा गया। गणेशिया बाई पहले दो अलग-अलग अवधियों में कुल 16 दिन जेल में रह चुकी थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, वह जुलाई 1994 और जुलाई 2017 में न्यायिक हिरासत में रही थीं। सजा को इसी भुगती हुई अवधि तक सीमित किए जाने के कारण अब उन्हें बाकी कारावास के लिए दोबारा जेल जाने की जरूरत नहीं होगी। लंबे समय से चले आ रहे मामले में यह उनके लिए व्यावहारिक रूप से सबसे बड़ी राहत है।
इस घटनाक्रम में कानूनी राहत के साथ पारिवारिक संबंधों का सामान्य होना भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, भाई-बहन के बीच मेल-मिलाप की जानकारी को अदालत द्वारा दोषसिद्धि समाप्त करने के बराबर नहीं माना जा सकता। उपलब्ध विवरण के अनुसार राहत सजा की अवधि में मिली है। जमीन के वर्तमान बंटवारे या स्वामित्व को लेकर कोई नया निष्कर्ष इससे अपने आप नहीं निकलता। करीब साढ़े तीन दशक पुराने विवाद के बाद अब बुजुर्ग महिला को शेष कारावास से राहत मिली है और परिवार पुराने मतभेद पीछे छोड़ने की कोशिश कर रहा है।
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