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Raipur. रायपुर। छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकारियों को पदोन्नति देने की परंपरा एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी कर ऐसे अफसरों को ऊँचे पद पर बैठा दिया जाता है, जिनके खिलाफ विभागीय जांच और लोकायुक्त में मामले लंबित रहते हैं। इस बार मामला आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग से जुड़ा है, जहां तारकेश्वर देवांगन को बिलासपुर में अपर संचालक का पदभार सौंपा गया है। हैरानी की बात यह है कि उनके खिलाफ कांग्रेस शासनकाल से ही गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लंबित हैं, फिर भी पदोन्नति देने में नियमों का पालन नहीं किया गया।
आरटीआई कार्यकर्ता और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता आशीष देव सोनी ने इस पूरे मामले को उजागर किया है। उनके अनुसार पदोन्नति प्रक्रिया में सरकार द्वारा बनाई गई चेक लिस्ट का पालन अनिवार्य होता है। किसी भी अधिकारी को पदोन्नति देने से पहले यह जांच की जाती है कि उसके खिलाफ किसी विभाग में विभागीय जांच (DE) लंबित है या नहीं। यदि जांच लंबित होती है तो संबंधित दस्तावेजों को पदोन्नति की प्रक्रिया में संलग्न किया जाना अनिवार्य है। लेकिन इस मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तारकेश्वर देवांगन को पदोन्नति देने में इन सभी नियमों की अनदेखी की गई।
जानकारी के अनुसार कांग्रेस शासनकाल में तारकेश्वर देवांगन पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने अपनी करीबी कांग्रेसी फर्म स्वाति इवेंट एंड मैनेजमेंट को बिना किसी निविदा प्रक्रिया के 18 लाख रुपये का कार्य आवंटित किया था। इस पूरे मामले में विभागीय स्तर पर जांच चल रही थी और लोकायुक्त में भी इसकी शिकायत दर्ज थी। बावजूद इसके तत्कालीन अधिकारियों ने मिलीभगत कर उन्हें पदोन्नत कर दिया। यही नहीं, अब एक बार फिर उन्हें मंत्री के OSD की निकटता का लाभ मिला और नियमों को दरकिनार कर बिलासपुर में अपर संचालक पद पर पदस्थ कर दिया गया।
आशीष देव सोनी का आरोप है कि यह पूरा मामला सत्ता और प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत का उदाहरण है। उन्होंने उच्च स्तरीय विभागीय अधिकारियों को लिखित शिकायत दी है, जिसमें स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि देवांगन के खिलाफ चल रही विभागीय जांच को पदोन्नति प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया। इसके अलावा लोकायुक्त में लंबित मामलों का भी जिक्र नहीं किया गया। उनका कहना है कि जब नियम साफ तौर पर यह कहते हैं कि जांच लंबित होने पर पदोन्नति रोकी जानी चाहिए, तो ऐसे में भ्रष्टाचार के आरोपित अधिकारी को पदोन्नत करना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने जैसा है।
वर्तमान में तारकेश्वर देवांगन को बिलासपुर में आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग का अपर संचालक बनाया गया है। सूत्रों का कहना है कि उनकी यह पदस्थापना मंत्री के OSD के साथ उनकी करीबी और गहरी दोस्ती के चलते हुई है। कार्यकर्ता आशीष देव सोनी ने यहां तक आरोप लगाया है कि देवांगन और मंत्री के OSD के बीच मिलीभगत के कारण ही पदोन्नति की फाइल को नियमों की अनदेखी करते हुए हरी झंडी दिखाई गई। अब सवाल यह है कि मंत्री के संज्ञान में आने के बाद देवांगन इस पद पर कितने समय तक बने रहते हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकारियों को पदोन्नति मिली हो। पूर्ववर्ती सरकार के समय भी कई बार ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां आरोपित अधिकारी नियमों को ताक पर रखकर ऊँचे पद पर पहुंच गए। प्रशासनिक जगत के जानकार मानते हैं कि जब तक पदोन्नति प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं होगी और भ्रष्टाचार के आरोपित अधिकारियों को कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। इस घटना ने एक बार फिर शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर किसी अधिकारी के खिलाफ जांच लंबित है, तो पदोन्नति देना न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि यह संदेश भी देता है कि भ्रष्टाचार के बावजूद अधिकारी सुरक्षित हैं। इससे ईमानदार अधिकारियों का मनोबल टूटता है और भ्रष्टाचारियों का हौसला बढ़ता है। इस पूरे विवाद के बीच अब निगाहें सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। सरकार ऐसे भ्रष्टाचार के आरोपित अधिकारी के खिलाफ क्या बड़ी कार्रवाई करती है। यह देखना दिलचस्प होगा।
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