छत्तीसगढ़
एर्राबोर पोटाकेबिन दुष्कर्म मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Shantanu Roy
22 April 2026 7:27 PM IST

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छग
Bilaspur. बिलासपुर। बस्तर के चर्चित एर्राबोर पोटाकेबिन आश्रम में 6 वर्ष 10 महीने की मासूम बच्ची से दुष्कर्म के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई “मृत्युपर्यंत कारावास” की सजा में आंशिक संशोधन करते हुए आरोपी की सजा को घटाकर 20 वर्ष की कठोर कैद में बदल दिया है। अदालत ने अन्य सभी सजाओं और जुर्माने को यथावत रखा है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया। मामला बस्तर क्षेत्र के एर्राबोर पोटाकेबिन आश्रम का है, जहां 22 जुलाई 2023 को एक नाबालिग बच्ची रहस्यमय तरीके से लापता हो गई थी। बाद में बच्ची ने परिजनों को बताया कि उसे एक व्यक्ति द्वारा कमरे से ले जाकर यौन शोषण किया गया।
घटना की रिपोर्ट 24 जुलाई 2023 को दर्ज कराई गई, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण सुकमा जिला अस्पताल में कराया गया। जांच के दौरान आरोपी की पहचान माडवी हिडमा उर्फ सोनू उर्फ राजू के रूप में हुई, जो पोटाकेबिन एर्राबोर के स्टाफ क्वार्टर में रहता था। उसे 27 जुलाई 2023 को गिरफ्तार किया गया। जांच के दौरान पीड़िता का बयान धारा 164 के तहत दर्ज किया गया, जबकि गवाहों के बयान धारा 161 के तहत लिए गए। पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 450, 363, 366, 324, 376 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद आरोपी को गंभीर धाराओं में दोषी पाते हुए विभिन्न सजाएं सुनाई थीं। इसमें IPC की धारा 450 के तहत 10 वर्ष, धारा 363 और 366 के तहत 3-3 वर्ष, धारा 324 के तहत 3 वर्ष की सजा और जुर्माना शामिल था।
सबसे गंभीर अपराध POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत आरोपी को मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी तथ्यों, पीड़िता की उम्र, साक्ष्यों और अपराध की गंभीरता पर विचार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत न्यूनतम सजा 20 वर्ष की कठोर कैद है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। अदालत ने माना कि इस मामले में परिस्थितियों को देखते हुए आजीवन कारावास की सजा को 20 वर्ष की कठोर कैद में बदलना न्यायसंगत होगा। हालांकि, जुर्माने और अन्य धाराओं के तहत दी गई सजा को कोर्ट ने बरकरार रखा है और सभी सजाओं को साथ-साथ चलाने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि नाबालिग बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति के होते हैं और ऐसे मामलों में कठोर सजा आवश्यक है, ताकि समाज में एक सख्त संदेश जाए। इस फैसले के बाद बस्तर क्षेत्र और पूरे छत्तीसगढ़ में इस मामले को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। यह मामला बच्चों की सुरक्षा और आश्रमों में निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
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