छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट नाराज: बिना मान्यता के नर्सरी स्कूलों पर कसा शिकंजा
Shantanu Roy
5 Aug 2025 9:57 PM IST

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छग
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में बिना मान्यता के धड़ल्ले से संचालित हो रहे प्राइवेट नर्सरी स्कूलों को लेकर हाईकोर्ट सख्त हो गया है। मंगलवार को चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शासन के जवाब पर नाराजगी जाहिर की और शिक्षा सचिव को 13 अगस्त तक नया शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि, अफसरों की लापरवाही से गरीब छात्रों को निशुल्क शिक्षा का अधिकार नहीं मिल पा रहा है, यह बेहद दुखद है।
हाईकोर्ट ने बिना मान्यता संचालित हो रहे स्कूलों को छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया और यह भी कहा कि प्राइवेट स्कूल मालिक महंगी मर्सिडीज में घूम रहे हैं, जबकि गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। कोर्ट ने शिक्षा सचिव से पूछा कि जब वर्ष 2013 में जारी शासनादेश में नर्सरी कक्षाओं को भी मान्यता के दायरे में लाया गया है, तो फिर आज तक यह स्कूल बिना मान्यता के कैसे चल रहे हैं?
दरअसल, कांग्रेस नेता विकास तिवारी ने इस मुद्दे पर जनहित याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत प्रवेश न देना पड़े, इसलिए प्राइवेट नर्सरी स्कूल जानबूझकर मान्यता नहीं ले रहे हैं। मामले में मंगलवार को सुनवाई हुई, जिसमें याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे, मानस वाजपेयी और प्रगति कौशिक ने पक्ष रखा।
शासन की ओर से जवाब पर जताई नाराजगी
शिक्षा सचिव की ओर से शपथपत्र में कहा गया कि विभाग के नियमों में नर्सरी स्कूलों की मान्यता का कोई प्रावधान नहीं है। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि 2013 के बाद से नर्सरी से केजी-2 तक के स्कूलों को मान्यता लेना अनिवार्य किया गया है। बावजूद इसके, आज भी राज्य भर में सैकड़ों स्कूल बिना अनुमति के चल रहे हैं, जो दुर्भाग्यजनक है।
कोर्ट के तीखे सवाल
हाईकोर्ट ने पूछा कि जब सरकार के पास यह डेटा नहीं है कि कितने स्कूल बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं, तो फिर कैसे इन पर नियंत्रण किया जाएगा? डीपीआई द्वारा पेश पूर्व के शपथपत्र में केवल कुल निजी स्कूलों की संख्या दी गई थी, लेकिन यह नहीं बताया गया कि इनमें से कितने स्कूल बगैर मान्यता के चल रहे हैं।
350 से अधिक स्कूल बिना मान्यता के
याचिकाकर्ता के अनुसार राज्य में कुल 7195 निजी स्कूल संचालित हैं, जिनमें से 350 से अधिक बिना मान्यता के बच्चों को दाखिला दे रहे हैं। यह न सिर्फ आरटीई एक्ट का उल्लंघन है, बल्कि बच्चों के भविष्य से भी खिलवाड़ है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब तक मान्यता नहीं ली जाती, ऐसे स्कूल नए छात्रों को प्रवेश नहीं दे सकते। हालांकि पहले से पढ़ रहे बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होगी।
शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल
कोर्ट ने शिक्षा विभाग की सुस्ती पर चिंता जताते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ एक प्रगतिशील राज्य है, लेकिन शिक्षा विभाग की लापरवाही गरीब बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर रही है। यह स्थिति गंभीर है और सरकार को तत्काल प्रभाव से सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है।
आगे की कार्रवाई
कोर्ट ने शिक्षा सचिव को 13 अगस्त तक फिर से व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने का आदेश दिया है, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि शासन अब तक किन-किन स्कूलों पर कार्रवाई कर चुका है और भविष्य में क्या कदम उठाए जाएंगे।
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