छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य कानून को हाईकोर्ट में चुनौती, राज्य सरकार से तीन सप्ताह में जवाब तलब
बिलासपुर, 08 अक्टूबर 2026। छत्तीसगढ़ में लागू किए गए धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 और इससे जुड़े नियमों की संवैधानिक वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। याचिका में नए कानून के कई प्रावधानों को संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों के विपरीत बताया गया है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की खंडपीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर और मनोज परांजपे ने वर्चुअल माध्यम से पक्ष रखा। उन्होंने अदालत के सामने तर्क दिया कि किसी व्यक्ति की आस्था या धार्मिक पहचान का निर्धारण सरकारी अनुमति या सार्वजनिक घोषणा की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया पर सवाल
याचिकाकर्ताओं ने कानून के तहत धर्म परिवर्तन से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं और सरकारी स्तर पर जानकारी देने की अनिवार्यता पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यदि कोई वयस्क व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहता है तो उसे पहले से सार्वजनिक घोषणा और विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरने के लिए बाध्य करना उसकी निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि धर्म व्यक्ति की अंतरात्मा और निजी विश्वास से जुड़ा विषय है। ऐसे में धार्मिक आस्था बदलने की प्रक्रिया में राज्य की भूमिका और निगरानी की सीमा को संविधान के मूल अधिकारों की कसौटी पर परखा जाना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ के नए कानून में धर्म परिवर्तन से संबंधित प्रक्रिया के लिए पूर्व घोषणा सहित कई प्रावधान किए गए हैं। कानून का उद्देश्य सरकार के अनुसार बल, धोखे, प्रलोभन या अन्य अनुचित तरीकों से होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना है। कानून में स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन पर भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने का प्रावधान है।
धार्मिक आयोजकों के पंजीकरण पर भी आपत्ति
याचिकाकर्ताओं ने धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल पादरी, पुरोहित या अन्य धार्मिक व्यक्तियों के पंजीकरण संबंधी प्रावधानों को भी चुनौती दी है। उनका कहना है कि धार्मिक गतिविधियों से जुड़े लोगों पर इस तरह की अतिरिक्त प्रशासनिक शर्तें लगाने से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर असर पड़ सकता है। कानून में धर्म परिवर्तन से जुड़े अपराधों के लिए कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। सामान्य रूप से बल, धोखाधड़ी, दबाव या प्रलोभन के माध्यम से कराए गए धर्म परिवर्तन के मामलों में सात से दस वर्ष तक की सजा और न्यूनतम पांच लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है। महिला, नाबालिग तथा कुछ संरक्षित वर्गों से जुड़े मामलों में सजा अधिक कठोर हो सकती है। सामूहिक धर्म परिवर्तन के मामलों में सजा दस वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है।
धार्मिक स्थलों को लेकर भी उठाए सवाल याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि नए कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल कुछ मामलों में धार्मिक स्थलों को बंद कराने या वहां धार्मिक गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए किया गया है। उनका दावा है कि इससे लोगों के शांतिपूर्वक एकत्र होने, पूजा करने और अपने धार्मिक विश्वासों का पालन करने की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है। हाईकोर्ट में राज्य सरकार का जवाब आने के बाद याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों पर आगे सुनवाई होगी।
राज्य के जवाब पर टिकी अगली सुनवाई
राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखना है। इसके बाद हाईकोर्ट यह देखेगा कि कानून और उसके नियमों के जिन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, वे संविधान में मिले मौलिक अधिकारों के अनुरूप हैं या नहीं।धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 को पुराने कानून की जगह लाया गया है और इसे धर्मांतरण से जुड़े मामलों में अधिक विस्तृत कानूनी व्यवस्था के तौर पर लागू किया गया है। विधानसभा ने मार्च 2026 में विधेयक पारित किया था।
अब हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई में राज्य सरकार के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि सरकार कानून के विवादित प्रावधानों का संवैधानिक आधार किस तरह अदालत के सामने रखती है। फिलहाल याचिका पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और मामले की न्यायिक प्रक्रिया जारी है।







