छत्तीसगढ़
CG: नार्को-एनालिसिस और पॉलीग्राफ टेस्ट बिना सहमति के नहीं हो सकेंगे
Shantanu Roy
2 July 2026 7:58 PM IST

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छग
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में जांच एजेंसियों को निर्देश दिया है कि किसी भी व्यक्ति को नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ एग्जामिनेशन, ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) टेस्ट या इसी तरह की किसी अन्य वैज्ञानिक जांच तकनीक के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे परीक्षण केवल संबंधित व्यक्ति की स्वेच्छा और विधिसम्मत सहमति के आधार पर ही किए जा सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह आदेश पारित करते हुए संबंधित याचिका को निराकृत कर दिया।
रायगढ़ हत्या मामले से जुड़ा है प्रकरण
यह मामला रायगढ़ जिले के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र में दर्ज एक हत्या और साक्ष्य छिपाने के केस से जुड़ा हुआ है। पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) और 238(A) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। जांच के दौरान संदेह के आधार पर लक्ष्मीनारायण पटेल (किसान, ग्राम बेहरापाली) और अर्धना भगत (गृहिणी, ग्राम महापल्ली) को पूछताछ के लिए बुलाया गया था।
याचिकाकर्ताओं के आरोप
दोनों याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया कि उनका नाम एफआईआर में नहीं है और उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य भी मौजूद नहीं है। इसके बावजूद उन्हें लंबे समय तक पुलिस स्टेशन बुलाया गया और लगभग 18 दिनों तक पूछताछ की गई। याचिका में यह भी कहा गया कि उन्हें बिना किसी कानूनी नोटिस के हिरासत जैसी स्थिति में रखा गया और दबाव बनाकर सुपुर्दनामा पर हस्ताक्षर करवाए गए। साथ ही, उनके मोबाइल फोन भी बिना किसी सीज़र मेमो या लिखित दस्तावेज के जब्त कर लिए गए। इसके अलावा आरोप लगाया गया कि पुलिस ने बिना न्यायालय की अनुमति और बिना सहमति के उन्हें ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ और नार्को-एनालिसिस जैसे परीक्षणों के लिए रायपुर में पेश होने के लिए बाध्य किया।
हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच एजेंसियां किसी भी व्यक्ति को इन अत्याधुनिक वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। यदि ऐसे परीक्षण कराने की आवश्यकता होती है, तो यह केवल संबंधित व्यक्ति की पूर्ण सहमति और जानकारी के आधार पर ही संभव है। कोर्ट ने कहा कि यह सहमति स्वतंत्र रूप से दी गई होनी चाहिए और इसे सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में दिए गए निर्णय और एनएचआरसी दिशानिर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए।
कानूनी सुरक्षा पर जोर
कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के प्रावधानों का पालन अनिवार्य है और किसी भी तरह की जांच प्रक्रिया में व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों को तकनीकी जांच के नाम पर किसी भी व्यक्ति पर दबाव बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए याचिका को समाप्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां कानून के दायरे में रहते हुए ही कार्रवाई करें और किसी भी स्थिति में मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो।
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