छत्तीसगढ़
CG BREAKING: 39 साल पुराने रिश्वत मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिल सहायक बरी
Shantanu Roy
23 Sept 2025 7:54 PM IST

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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में 39 साल पुराने रिश्वत मामले में बिल सहायक रहे रामेश्वर प्रसाद अवधिया को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। रायपुर की निचली अदालत ने दिसंबर 2004 में उन्हें 100 रुपये रिश्वत लेने के आरोप में एक साल की कैद और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने अभियोजन की दलीलों और साक्ष्यों को कमजोर मानते हुए निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।
मामला 1980 के दशक का
इस प्रकरण की शुरुआत वर्ष 1981 से 1985 के बीच हुई थी। उस समय शिकायतकर्ता अशोक कुमार वर्मा ने अपने सेवाकालीन बकाया बिल भुगतान के लिए वित्त विभाग के बिल सहायक रामेश्वर प्रसाद अवधिया से संपर्क किया। आरोप था कि अवधिया ने बिल पारित करने के लिए 100 रुपये रिश्वत की मांग की थी। इस पर वर्मा ने तत्कालीन लोकायुक्त के पास शिकायत दर्ज कराई। लोकायुक्त टीम ने ट्रैप की योजना बनाई और शिकायतकर्ता को 50-50 रुपये के रासायनिक लगे नोट देकर आरोपी को रिश्वत देने भेजा। कार्रवाई के दौरान टीम ने अवधिया को नोटों के साथ पकड़ लिया और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 के तहत मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया।
निचली अदालत का फैसला
लगभग दो दशकों तक चले मुकदमे के बाद रायपुर की निचली अदालत ने 9 दिसंबर 2004 को आरोपी अवधिया को दोषी मानते हुए एक साल की कैद और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अदालत ने कहा था कि आरोपी ने शिकायतकर्ता से अवैध परितोषण की मांग और स्वीकारोक्ति की थी।
हाईकोर्ट में अपील
इस फैसले के खिलाफ अवधिया ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान उनके वकीलों ने दलील दी कि ट्रैप की कार्रवाई के दौरान अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने वास्तव में रिश्वत मांगी थी। नोट उसके पास मिले जरूर, लेकिन उन्हें देने की पहल शिकायतकर्ता की थी, जिससे अभियोजन का मामला कमजोर हो जाता है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने मामले की गहन सुनवाई के बाद कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 के प्रावधान इस मामले में लागू होते हैं, क्योंकि मामला अधिनियम 1988 लागू होने से पहले का है। इसके बावजूद अभियोजन को यह साबित करना था कि आरोपी ने अवैध परितोषण की मांग और स्वीकार दोनों की थी। न्यायालय ने पाया कि उपलब्ध मौखिक, दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य साक्ष्य इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि आरोपी ने रिश्वत मांगी या स्वीकार की। सिर्फ नोट बरामद होने से रिश्वतखोरी सिद्ध नहीं होती, जब तक कि अभियोजन यह साबित न कर दे कि आरोपी ने स्वयं मांग की और स्वेच्छा से रिश्वत ली।
दोषसिद्धि निरस्त
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन अपने साक्ष्य भार को सिद्ध करने में विफल रहा। इसलिए निचली अदालत द्वारा दिया गया दोषसिद्धि और सजा का आदेश अस्थिर है और न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए अवधिया को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला अभियोजन पक्ष के लिए सबक है कि ट्रैप कार्रवाई में केवल नोट बरामद होना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने खुद रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति की। वरना लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों में निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक रूप से सजा भुगतनी पड़ सकती है।
समाज और न्याय व्यवस्था पर असर
यह मामला लगभग चार दशकों तक न्यायिक प्रक्रिया में उलझा रहा। इस दौरान आरोपी को सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा। वहीं, यह केस इस बात का उदाहरण है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में मुकदमों की लंबी अवधि न सिर्फ आरोपी बल्कि शिकायतकर्ता और पूरे तंत्र को प्रभावित करती है।
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