छत्तीसगढ़
बिलासपुर हाईकोर्ट का अहम फैसला, 36 साल पुराना लोन विवाद किया समाप्त
Shantanu Roy
13 Dec 2025 9:47 PM IST

x
छग
बिलासपुर। बिलासपुर हाईकोर्ट ने 36 साल पुराने लोन मामले में महत्वपूर्ण फैसले में सीबीआई कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने कहा कि सीबीआई का मामला केवल इस संदेह पर आधारित था कि फर्मों का वास्तविक अस्तित्व नहीं था। लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी संदेह के मजबूत होने से ठोस सबूत का स्थान नहीं लिया जा सकता। हाईकोर्ट के इस फैसले से देना बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक इंद्रजीत सोलंकी और उनके सहयोगियों सुदर्शन जैन व सुधीर क्षीरसागर को कानूनी राहत मिली है।
मामले का इतिहास
सीबीआई ने रायपुर स्थित देना बैंक की शाखा द्वारा लोन स्वीकृति के मामले में जांच की थी। जांच के दौरान पाया गया कि तत्कालीन शाखा प्रबंधक इंद्रजीत सोलंकी ने 1989 से 1992 के दौरान सुदर्शन जैन और सुधीर क्षीरसागर के साथ मिलकर कथित आपराधिक साजिश रची। सीबीआई का आरोप था कि सोलंकी ने अपनी आधिकारिक स्थिति का दुरुपयोग करते हुए मेसर्स शिल्पा एंटरप्राइजेज और मेसर्स श्रीवास्तव ट्रेडर्स जैसी आभासी फर्मों के नाम पर 1,50,000 रुपए के लोन मंजूर कराए। इसके लिए कथित जाली दस्तावेजों का उपयोग किया गया। सीबीआई कोर्ट ने 2007 में आरोपियों को साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अलग-अलग सजा सुनाई। इसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
सीबीआई का तर्क
सीबीआई ने दावा किया था कि शिल्पा एंटरप्राइजेज और श्रीवास्तव ट्रेडर्स नामक फर्मों का अस्तित्व ही नहीं था। आरोप था कि उनके नाम पर लोन स्वीकृत कराना धोखाधड़ी के अंतर्गत आता है। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकांश सरकारी गवाहों और बैंक अधिकारियों ने स्वीकार किया कि संबंधित फर्मों के स्टॉक का बीमा नियमित रूप से हुआ। यह केवल वास्तविक सामान के मौजूद होने पर ही संभव था। इसके अलावा, लोन खातों में कई वर्षों तक रकम जमा होती रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि फर्में सक्रिय थीं। बैंक के रिकॉर्ड में पता बदलने के पत्र और रसीदें भी उपलब्ध थीं, जिन्हें सीबीआई ने जांच में महत्व नहीं दिया।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि किसी दस्तावेज को जालसाजी से तैयार किया गया। न ही ऐसा कोई प्रमाण है कि आरोपी किसी आपराधिक साजिश में शामिल थे। बैंक ऑडिट में कोई अनियमितता दर्ज नहीं हुई और विभागीय जांच भी हुई। सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए जस्टिस रजनी दुबे ने कहा कि अपराध साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं। इस आधार पर हाईकोर्ट ने सीबीआई कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए इंद्रजीत सोलंकी, सुदर्शन जैन और सुधीर क्षीरसागर की सजा को निरस्त किया और उन्हें बरी कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।
प्रभाव और महत्व
हाईकोर्ट का यह फैसला लंबे समय से लंबित मामलों में न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को बढ़ाने वाला माना जा रहा है। यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि किसी भी अपराध का प्रमाण ठोस और स्पष्ट होना चाहिए, विशेषकर वित्तीय और बैंकिंग मामलों में। आभासी फर्मों से जुड़े मामलों में केवल संदेह पर कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है। हाईकोर्ट का यह निर्णय भविष्य में बैंकिंग धोखाधड़ी मामलों में ठोस सबूत की आवश्यकता को और मजबूत करता है।
Tagsबिलासपुरहाईकोर्टदेना बैंकलोन मामलाआभासी कंपनियांबैंक मैनेजरइंद्रजीत सोलंकीसुदर्शन जैनसुधीर क्षीरसागरसीबीआई कोर्टसजा रद्दबरीधोखाधड़ीजालसाजीभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम1.5 लाख रुपएरायपुरफर्म अस्तित्वस्टॉक बीमाबैंक रसीदठोस साक्ष्यसुप्रीम कोर्टन्यायाधीश रजनी दुबेसिंगल बेंचआपराधिक साजिशवित्तीय मामलेलंबित जांचकानूनी राहतउच्च न्यायालयन्यायिक प्रक्रियाबैंकिंग धोखाधड़ीBilaspurHigh CourtDena Bankloan caseshell companiesbank managerIndrajit SolankiSudarshan JainSudhir KshirsagarCBI courtsentence quashedacquittalfraudforgeryPrevention of Corruption ActRs 1.5 lakhRaipurfirm existencestock insurancebank receiptconcrete evidenceSupreme CourtJustice Rajni Dubeysingle benchcriminal conspiracyfinancial matterspending investigationlegal reliefjudicial processbanking fraud
Next Story





