छत्तीसगढ़

भारतमाला परियोजना घोटाला: राजस्व अधिकारियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

Shantanu Roy
28 Oct 2025 6:39 PM IST
भारतमाला परियोजना घोटाला: राजस्व अधिकारियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज
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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मंगलवार को बहुचर्चित भारतमाला परियोजना भूमि अधिग्रहण घोटाले में फंसे राजस्व विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने माना कि मामला गंभीर वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़ा है, जिसकी जांच अभी जारी है। ऐसे में आरोपियों को अग्रिम जमानत देना न्यायहित में उचित नहीं होगा। यह निर्णय मुख्य न्यायाधीश रमेशचंद्र सिन्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के बाद सुनाया। जिन अधिकारियों की याचिकाएं खारिज की गई हैं, उनमें तत्कालीन एसडीएम निर्भय कुमार साहू, तहसीलदार लेखराम देवांगन, लखेश्वर प्रसाद किरन, शशिकांत कुर्रे, नायब तहसीलदार डी.एस. उइके, राजस्व निरीक्षक रौशन लाल वर्मा और पटवारी दीपक देव शामिल हैं। सभी को आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो (ACB) द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के प्रकरण में आरोपी बनाया गया है।

ईओडब्ल्यू-एसीबी ने किया था बड़ा खुलासा
भारतमाला परियोजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण किया गया था। जांच एजेंसी को शिकायतें मिली थीं कि भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में कई जगहों पर भारी वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। ईओडब्ल्यू-एसीबी की जांच में सामने आया कि कुछ राजस्व अधिकारी और कर्मचारियों ने भूमाफियाओं के साथ सांठगांठ कर भूमि के वास्तविक मूल्य से कई गुना अधिक मुआवजा राशि स्वीकृत करवाई। इससे राज्य सरकार को करीब 600 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ भूमिधारकों को गलत वर्गीकरण के तहत उनकी भूमि को “उच्च मूल्य की श्रेणी” में दिखाया गया, जिससे उन्हें अत्यधिक मुआवजा प्राप्त हुआ। बदले में अधिकारियों पर कमीशन और लाभ लेने के आरोप हैं।

हाईकोर्ट ने कहा— “घोटाला गंभीर, जांच में बाधा बन सकती है जमानत”
मंगलवार को बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से अग्रिम जमानत की मांग की गई। उनका तर्क था कि जांच लंबी खिंच रही है और गिरफ्तारी की आशंका के कारण वे मानसिक दबाव में हैं। इस पर राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल डॉ. सौरभ कुमार पांडेय ने अदालत को बताया कि यह मामला अत्यंत गंभीर आर्थिक अपराध का है, जिसमें सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि आरोपियों ने जांच में सहयोग नहीं किया और कई बार पूछताछ से बचने की कोशिश की। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने सभी तर्कों को सुनने के बाद कहा “यह मामला गंभीर आर्थिक अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है। जांच एजेंसी अभी साक्ष्य एकत्र करने की प्रक्रिया में है। यदि इस स्तर पर आरोपियों को अग्रिम जमानत दी जाती है, तो इससे जांच प्रभावित हो सकती है।” इसी आधार पर अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं और ईओडब्ल्यू को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई जारी रखे।

8 हजार पन्नों का चालान पेश कर चुकी है ईओडब्ल्यू
इस मामले में ईओडब्ल्यू-एसीबी ने हाल ही में जिला विशेष न्यायालय में 8 हजार से अधिक पृष्ठों का चालान पेश किया था। चालान में विस्तृत रूप से बताया गया है कि कैसे राजस्व अधिकारियों ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी कर निजी व्यक्तियों को लाभ पहुंचाया। चालान के अनुसार, कई जगहों पर भूमि के रकबे को गलत तरीके से बढ़ाकर दर्ज किया गया, वहीं कुछ मामलों में पहले से अधिग्रहित भूमि को दोबारा भुगतान के लिए शामिल किया गया। यह पूरा खेल कई महीनों तक चला और स्थानीय स्तर पर कई कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई।

निलंबन के बाद अब गिरफ्तारी की तैयारी
ईओडब्ल्यू द्वारा मामला दर्ज किए जाने के बाद राज्य शासन ने सभी आरोपित अधिकारियों और कर्मचारियों को निलंबित कर दिया था। हालांकि, अब हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद एजेंसी गिरफ्तारी की दिशा में कदम बढ़ा सकती है। सूत्रों के मुताबिक, ईओडब्ल्यू ने संबंधित भूमि अधिग्रहण फाइलें, बैंक भुगतान रिकॉर्ड और सरकारी आदेशों को खंगालना शुरू कर दिया है। साथ ही, कुछ निजी व्यक्तियों और बिचौलियों के बयान भी दर्ज किए जा रहे हैं, जिनकी भूमिका जांच के दायरे में है। एजेंसी आने वाले दिनों में आरोपियों से दोबारा पूछताछ करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि यह पूछताछ गिरफ्तारी से पहले का अंतिम चरण हो सकता है।

सरकार की साख पर भी उठे सवाल
भारतमाला परियोजना घोटाले के उजागर होने के बाद प्रदेश की प्रशासनिक साख पर भी सवाल उठे हैं। यह परियोजना केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय राजमार्ग विकास योजना का हिस्सा है, जिसे राज्य सरकार ने स्थानीय स्तर पर क्रियान्वित किया था। इस तरह की गड़बड़ियां न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी हैं, बल्कि विकास योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी चोट करती हैं। यदि ऐसे अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में ऐसी अनियमितताओं पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा।

जांच एजेंसी का रुख सख्त
ईओडब्ल्यू-एसीबी अब इस घोटाले को राज्य के सबसे बड़े राजस्व घोटालों में से एक मान रही है। एजेंसी के अधिकारियों के अनुसार, “यह सिर्फ मुआवजे की हेराफेरी का मामला नहीं है, बल्कि इसमें संगठित तरीके से सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया गया है।” अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि आने वाले हफ्तों में कुछ और अफसरों, भूमाफियाओं और बिचौलियों से भी पूछताछ की जाएगी। उन्होंने कहा कि “जांच में किसी भी स्तर पर कोई रियायत नहीं दी जाएगी, चाहे आरोपी कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो।”
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