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Bilaspur. बिलासपुर। नाबालिग से दुष्कर्म और अपहरण के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरोपी दिनेश यादव को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम होने की बात संदेह से परे साबित नहीं कर सका। अदालत ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया।
स्कूल रिकॉर्ड से उम्र साबित करने पर उठे सवाल
मामले में अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की जन्म तिथि 16 जुलाई 2005 साबित करने के लिए स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर और कक्षा आठवीं की अंकसूची पर भरोसा किया था। हालांकि, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान स्कूल के सहायक शिक्षक के बयान से उम्र संबंधी साक्ष्य पर सवाल खड़े हुए। सहायक शिक्षक ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि संबंधित जन्म तिथि की प्रविष्टि उन्होंने स्वयं नहीं की थी। उन्हें यह भी जानकारी नहीं थी कि स्कूल रिकॉर्ड में जन्म तिथि किस दस्तावेज या आधार के अनुसार दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट ने इसी पहलू को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि केवल स्कूल के प्रवेश रजिस्टर में जन्म तिथि दर्ज होना उम्र का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब उस प्रविष्टि का आधार स्पष्ट न हो।
माता-पिता भी वास्तविक जन्म तिथि नहीं बता सके
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता के माता-पिता के बयानों पर भी अदालत ने गौर किया। माता-पिता ने बताया कि उन्हें अपनी बेटी की वास्तविक जन्म तिथि की जानकारी नहीं थी। उन्होंने अपनी अशिक्षा का भी उल्लेख किया और पीड़िता की उम्र करीब 14 वर्ष बताई। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र या अन्य प्राथमिक और विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने चाहिए थे। अदालत के मुताबिक अभियोजन पक्ष उम्र को लेकर ऐसा ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे पीड़िता के 18 वर्ष से कम होने की बात संदेह से परे साबित हो सके।
पीड़िता के बयान और परिस्थितियों पर भी विचार
डिवीजन बेंच ने मामले की परिस्थितियों और पीड़िता के बयानों का भी विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि दोनों अवसरों पर पीड़िता अपने माता-पिता को बताए बिना सामुदायिक भवन के पास पहुंची और आरोपी के साथ मोटरसाइकिल से गई। अदालत के समक्ष यह भी सामने आया कि रास्ते में कई लोग मिले, लेकिन पीड़िता ने कथित तौर पर न तो शोर मचाया और न ही किसी व्यक्ति से मदद मांगी। आरोपी के घर पर भी वह लंबे समय तक रही और इस दौरान किसी व्यक्ति को घटना की जानकारी नहीं दी। हाईकोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि यौन अपराध के मामले में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव है। लेकिन ऐसी गवाही पूरी तरह विश्वसनीय और भरोसा पैदा करने वाली होनी चाहिए। मौजूदा मामले में अदालत ने पीड़िता के बयान में मौजूद विसंगतियों और परिस्थितियों को अभियोजन की कहानी के संबंध में उचित संदेह पैदा करने वाला माना।
मेडिकल और FSL रिपोर्ट भी बनी अहम
अदालत ने पीड़िता की मेडिकल जांच रिपोर्ट पर भी विचार किया। मेडिकल परीक्षण में शरीर या जननांगों पर कोई बाहरी अथवा आंतरिक चोट, खरोंच या अन्य चोट नहीं मिली। डॉक्टर ने हाइमन के पुराने रूप से फटे होने की बात कही और माना कि पीड़िता पहले यौन संबंध बना चुकी थी। हालांकि, डॉक्टर को जबरन यौन संबंध बनाए जाने के समय की कोई शारीरिक चोट नहीं मिली। जिरह के दौरान डॉक्टर ने यह भी माना कि शारीरिक विकास के आधार पर पीड़िता वयस्क प्रतीत होती थी। मामले की एफएसएल रिपोर्ट में भी भेजे गए नमूनों और वस्तुओं पर वीर्य या मानव शुक्राणु नहीं पाए गए। हाईकोर्ट ने मामले के सभी साक्ष्यों और परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए अभियोजन की कहानी में संदेह की स्थिति पाई।
2022 की सजा हाईकोर्ट ने की रद्द
प्रथम अतिरिक्त सत्र एवं विशेष न्यायाधीश, कुनकुरी ने 10 फरवरी 2022 को आरोपी दिनेश यादव को दोषी ठहराते हुए अलग-अलग धाराओं में सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत दो वर्ष, धारा 366 के तहत पांच वर्ष और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने अब आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए उक्त सजा को रद्द कर दिया और आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में अभियोजन द्वारा पीड़िता की उम्र और मामले के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को संदेह से परे साबित न कर पाने को फैसले का प्रमुख आधार माना।
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