
औरंगाबाद (बिहार)। बिहार के औरंगाबाद जिले सहित इसके कमांड एरिया में रहने वाले हजारों किसानों के लिए खरीफ फसलों की सिंचाई को लेकर एक बड़ी उम्मीद जगी है। जल संसाधन विभाग द्वारा सोमवार को झारखंड के पलामू जिले के मोहम्मदगंज स्थित भीम बराज से उत्तर कोयल मुख्य नहर में 1024 क्यूसेक पानी छोड़ दिया गया है। इस पानी के छोड़े जाने से औरंगाबाद और आसपास के इलाकों में धान की रोपनी और फसलों को बचाने की जुगत में लगे किसानों को तात्कालिक राहत जरूर मिली है, लेकिन उनके माथे से चिंता की लकीरें अभी पूरी तरह गायब नहीं हुई हैं। किसानों की यह उम्मीद एक बार फिर से रूठे हुए मौसम और सालों से अधूरी पड़ी परियोजना की कमियों के बीच झूल रही है।
बारिश न होने पर घट सकता है डिस्चार्ज: विभाग की चेतावनी
जल संसाधन विभाग के वरीय अधिकारियों ने पानी छोड़े जाने के साथ ही एक गंभीर चेतावनी भी जारी की है। अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वर्तमान में उत्तर कोयल नदी के जलग्रहण (कैचमेंट) क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी देखी जा रही है। यदि अगले तीन से चार दिनों के भीतर नदी के ऊपरी इलाकों में पर्याप्त और भारी वर्षा नहीं होती है, तो भीम बराज का जलस्तर तेजी से नीचे गिर जाएगा।
ऐसी विकट स्थिति उत्पन्न होने पर विभाग के पास मुख्य नहर में पानी की मात्रा (डिस्चार्ज) को काफी कम करने या फिर सिंचाई के लिए पानी की सप्लाई को पूरी तरह से बंद करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। अधिकारियों की इस चेतावनी ने उन किसानों की धड़कनें बढ़ा दी हैं जो इस पानी के सहारे अपनी धान की फसल को इस सीजन में जिंदा रखने का ख्वाब देख रहे थे।
अधूरे गेट और अधूरी परियोजना बनी बड़ी रुकावट
उत्तर कोयल सिंचाई परियोजना के तहत भीम बराज से पानी तो छोड़ दिया गया है, लेकिन इसका समुचित लाभ किसानों को पूरी तरह नहीं मिल पा रहा है। इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ी रुकावट परियोजना का आज तक अधूरा होना और बराज के कई गेटों का काम पूरा न होना है। नहर नेटवर्क के पूरी तरह दुरुस्त न होने और रेगुलेटरों की कमी के कारण पानी का वितरण समान रूप से नहीं हो पा रहा है।
नहर के टेल एंड (अंतिम छोर) पर स्थित गांवों तक पानी सही समय और सही मात्रा में नहीं पहुंच पा रहा है। जल वितरण प्रभावित होने से एक तरफ जहां ऊपरी इलाकों के किसानों को पानी मिल जाता है, वहीं दूसरी तरफ अंतिम छोर पर बैठे किसान सिर्फ सूखी नहर को देखने को मजबूर हैं। सालों से लटकी इस परियोजना के पूर्ण न होने का खमियाजा हर साल यहां के अन्नदाताओं को भुगतना पड़ता है।
सूखे की आशंका से चिंतित हैं औरंगाबाद के किसान
औरंगाबाद जिला मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है और यहां की मुख्य फसल धान है। इस साल समय पर मानसून की सक्रियता न होने और पर्याप्त बारिश न होने के कारण पहले ही धान के बिचड़े (मोरी) बचाने में किसानों को भारी मशक्कत करनी पड़ी है। अब जब रोपनी का मुख्य समय चल रहा है, तब पानी की किल्लत ने खेती पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं।
किसानों का कहना है कि नहर में 1024 क्यूसेक पानी छोड़ना एक अच्छा कदम है, लेकिन यह नाकाफी साबित हो सकता है यदि पानी लगातार नहीं मिला। यदि बारिश नहीं हुई और नहर का पानी बंद हो गया, तो खेतों में लगाई गई धान की फसल सूख जाएगी और किसानों की लागत भी डूब जाएगी। अब औरंगाबाद के किसानों की निगाहें आसमान पर टिकी हैं कि कब बदरा बरसें और इस अधूरी परियोजना के जख्मों पर राहत की बौछारें डालें।





