
पटना: बिहार में एससी-एसटी आरक्षण के मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा को लेकर सियासी विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और समीक्षा के मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के बयान सामने आ रहे हैं। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान अपने रुख पर कायम हैं और उन्होंने साफ कहा है कि किसी भी स्थिति में समाज में बिखराव नहीं होने दिया जाएगा।
चिराग पासवान का कहना है कि किसी एक वर्ग की मांग को पूरा करने के लिए मौजूदा अधिकारों में कटौती स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि कमजोर और वंचित वर्गों के हितों की रक्षा करना जरूरी है।
चिराग अपने बयान पर कायम
आरक्षण के मुद्दे पर चिराग पासवान लगातार अपनी बात रखते आ रहे हैं। उनका कहना है कि संविधान में दिए गए अधिकारों के साथ किसी भी तरह का छेड़छाड़ नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीति करने के बजाय सभी दलों को मिलकर ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिससे सामाजिक न्याय की भावना मजबूत हो।
हम नेताओं की चुप्पी पर चर्चा
आरक्षण के मुद्दे को लेकर जहां चिराग पासवान और लोजपा (रामविलास) के बीच बयानबाजी जारी है, वहीं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के दोनों शीर्ष नेताओं ने सोमवार को इस मामले पर चुप्पी बनाए रखी।
राजनीतिक गलियारों में इस चुप्पी को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पार्टी फिलहाल सीधे बयान देने से बच रही है।
भाजपा कोटे के मंत्री की एंट्री
आरक्षण विवाद में पहली बार भाजपा कोटे के मंत्री ने भी प्रतिक्रिया दी है। एससी-एसटी कल्याण मंत्री लखेन्द्र कुमार रौशन ने इस मामले में चिराग पासवान और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेताओं पर निशाना साधा।
उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों नेताओं ने समाज के मुद्दों से ज्यादा अपने परिवार के विकास पर ध्यान दिया है। मंत्री के इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में आरक्षण मुद्दे पर बयानबाजी और तेज हो गई है।
विपक्ष ने भी रखा अपना पक्ष
वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने आरक्षण समीक्षा के मुद्दे पर अलग रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि अगर समीक्षा की बात होती है तो इसमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी भी व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा होना सामान्य प्रक्रिया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समीक्षा का उद्देश्य सामाजिक न्याय और जरूरतमंद वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए।
आरक्षण बना राजनीतिक मुद्दा
बिहार में एससी-एसटी आरक्षण का मुद्दा अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता अपने-अपने तर्कों के साथ सामने आ रहे हैं।
एक तरफ कुछ नेता आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत पर जोर दे रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ नेता मौजूदा अधिकारों में किसी भी तरह की कटौती का विरोध कर रहे हैं।
चुनावी माहौल में बढ़ी बयानबाजी
बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरणों का बड़ा महत्व रहा है। ऐसे में आरक्षण जैसे मुद्दे पर नेताओं के बयान राजनीतिक रूप से भी काफी अहम माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि एससी-एसटी आरक्षण से जुड़ा कोई भी फैसला व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि सभी दल इस मुद्दे पर बेहद सावधानी से अपनी रणनीति तय कर रहे हैं।
फिलहाल बिहार में आरक्षण समीक्षा को लेकर सियासी तकरार जारी है। चिराग पासवान अपने विरोध के रुख पर कायम हैं, भाजपा मंत्री के बयान के बाद विवाद और बढ़ गया है, जबकि राजद ने समीक्षा के पक्ष में अपनी अलग राय रखी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।





