
Bihar: बिहार में शिक्षक भर्ती परीक्षा (टीआरई) के तहत नियुक्त शिक्षकों की नौकरी पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। राज्य सरकार ने बड़े पैमाने पर दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है, जिसमें हजारों शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की गहन पड़ताल की जा रही है। यह कार्रवाई उन शिकायतों के बाद शुरू हुई है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि बिहार से बाहर के अभ्यर्थियों ने राज्य में आरक्षित श्रेणी का लाभ लेकर नियुक्ति प्राप्त की है।
शिक्षा विभाग और मंत्रिमंडल सचिवालय एवं निगरानी विभाग के निर्देश पर यह राज्यव्यापी अभियान चलाया जा रहा है। विभाग का कहना है कि जिन अभ्यर्थियों ने टीआरई-1, टीआरई-2 और टीआरई-3 के तहत नौकरी पाई है, उनके दस्तावेजों की जांच की जाएगी। खासकर उन मामलों पर ध्यान दिया जा रहा है, जहां अभ्यर्थी दूसरे राज्यों के निवासी होने के बावजूद बिहार में आरक्षण का लाभ लेकर नियुक्त हुए हैं।
जांच के दौरान चार प्रमुख दस्तावेजों की गहन समीक्षा की जा रही है, जिनमें आवासीय प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र, क्रीमीलेयर प्रमाणपत्र और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) प्रमाणपत्र शामिल हैं। सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों से इन शिक्षकों के दस्तावेजों की प्रतियां मांगी गई हैं और उन्हें निगरानी विभाग को भेजा जा रहा है।
विभाग ने सभी जिलों से ऐसे शिक्षकों की सूची भी मांगी है, जो अन्य राज्यों से आकर बिहार में नियुक्त हुए हैं। साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि समय पर जानकारी उपलब्ध नहीं कराने पर संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
सरकार ने साफ कर दिया है कि यदि जांच में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पाई जाती है, जैसे फर्जी प्रमाणपत्र या गलत तरीके से आरक्षण का लाभ लेना, तो संबंधित शिक्षकों की नौकरी रद्द की जा सकती है। इसके साथ ही उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई और प्राथमिकी दर्ज करने का भी प्रावधान रखा गया है।
टीआरई भर्ती प्रक्रिया पहले से ही विवादों में रही है। डोमिसाइल नीति और आरक्षण के लाभ को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कई संगठनों ने आरोप लगाया था कि बाहरी अभ्यर्थियों ने नियमों का गलत फायदा उठाया है। अब सरकार इस पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए व्यापक स्तर पर जांच कर रही है, जिससे हजारों शिक्षकों की भविष्य की स्थिति पर अनिश्चितता बढ़ गई है।





