बिहार

झरने के भरोसे 200 ग्रामीणों की प्यास

Kavita2
3 Sept 2026 11:49 AM IST
झरने के भरोसे 200 ग्रामीणों की प्यास
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जमुई। देश को आजाद हुए कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन बिहार के खैरा प्रखंड की हरणी पंचायत स्थित आदिवासी गांव ऊपरी केरवातरी के लोगों के लिए आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव बड़ी समस्या बना हुआ है। गांव के लोग अब भी शुद्ध पेयजल के लिए पहाड़ से निकलने वाले एक छोटे से झरने पर निर्भर हैं। सरकारी योजनाओं के दावों के बीच यहां के ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरत के पानी के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ रहा है।

ऊपरी केरवातरी गांव में करीब 30 घर हैं, जिनमें लगभग 200 लोग रहते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, गांव तक अब तक नल-जल योजना नहीं पहुंच सकी है। वहीं सरकारी चापाकल भी लंबे समय से खराब पड़े हुए हैं। ऐसे में ग्रामीणों के पास पानी जुटाने के लिए पहाड़ के झरने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।

गांव की सबसे बड़ी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है। हर दिन सुबह से ही महिलाएं पानी भरने के लिए जंगल के रास्ते निकल पड़ती हैं। उन्हें घने जंगलों के बीच करीब एक किलोमीटर की दूरी तय कर बंधेथान पहाड़ के नीचे पहुंचना पड़ता है। वहां पहाड़ से निकलने वाले छोटे से झरने से पानी भरकर महिलाएं वापस घर लौटती हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि पानी की यह समस्या केवल एक दिन या कुछ समय की नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही है। गर्मी के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। झरने में पानी कम होने पर ग्रामीणों को और ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है।

पानी भरने का यह सिलसिला दिन में एक बार नहीं बल्कि कई बार चलता है। महिलाओं को घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त पानी जुटाने के लिए दिन में लगभग तीन बार पहाड़ तक जाना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में रोजाना तीन से चार घंटे का समय केवल पानी की व्यवस्था में ही खर्च हो जाता है।

ग्रामीणों के अनुसार, सुबह का काफी समय पानी लाने में निकल जाता है। इसके बाद घर के अन्य काम और परिवार की जिम्मेदारियां पूरी करनी पड़ती हैं। बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं के अन्य जरूरी काम भी प्रभावित होते हैं। पानी जैसी मूलभूत जरूरत के लिए इतना समय खर्च होना ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है।

गांव के लोगों का कहना है कि कई बार उन्होंने प्रशासन और संबंधित विभागों को अपनी समस्या से अवगत कराया, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं हो सका है। ग्रामीण चाहते हैं कि गांव में जल्द से जल्द नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन बिछाई जाए या खराब पड़े चापाकलों को ठीक कराया जाए, ताकि उन्हें झरने के भरोसे न रहना पड़े।

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सरकार की ओर से पेयजल सुविधा पहुंचाने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन ऊपरी केरवातरी जैसे गांवों तक इन योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाया है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के दावों के बावजूद उनका गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर है।

झरने का पानी इस्तेमाल करना भी हमेशा सुरक्षित नहीं माना जा सकता। बारिश के मौसम में पानी दूषित होने की संभावना रहती है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। ग्रामीणों को मजबूरी में इसी पानी का इस्तेमाल पीने, खाना बनाने और अन्य घरेलू कार्यों के लिए करना पड़ता है।

महिलाओं के लिए यह समस्या सबसे ज्यादा गंभीर है। पानी लाने के दौरान उन्हें जंगल के रास्तों से गुजरना पड़ता है। कई बार जंगली जानवरों और अन्य जोखिमों का भी सामना करना पड़ सकता है। इसके बावजूद परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें रोज यह कठिन सफर तय करना पड़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर गांव में नियमित पेयजल व्यवस्था हो जाए तो उनकी कई परेशानियां खत्म हो सकती हैं। बच्चों और महिलाओं का समय बचेगा और लोग दूसरे जरूरी कामों पर ध्यान दे सकेंगे।

गांव के लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द सर्वे कराकर पेयजल योजना का लाभ दिया जाए। खराब पड़े चापाकलों की मरम्मत कराई जाए और स्थायी जल स्रोत की व्यवस्था की जाए।

विशेषज्ञों के अनुसार, दूरदराज और पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल पहुंचाना चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो ऐसी समस्याओं का समाधान संभव है। छोटे जल स्रोतों का संरक्षण, पाइपलाइन विस्तार और स्थानीय जरूरतों के अनुसार योजनाएं तैयार करना जरूरी है।

ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन उनके गांव में भी घर तक पानी पहुंचेगा। लेकिन अभी भी उन्हें अपनी प्यास बुझाने के लिए पहाड़ और जंगल का रास्ता तय करना पड़ रहा है।

ऊपरी केरवातरी की कहानी केवल एक गांव की समस्या नहीं बल्कि उन दूरदराज इलाकों की तस्वीर दिखाती है जहां आज भी बुनियादी सुविधाएं लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं। सरकार की योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर यहां साफ दिखाई देता है।

फिलहाल गांव के करीब 200 लोग झरने के पानी पर निर्भर हैं और महिलाओं का रोजाना कई घंटे पानी जुटाने में बीत रहा है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन उनकी समस्या को गंभीरता से लेगा और जल्द ही उन्हें शुद्ध पेयजल की सुविधा मिल सकेगी।

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