
बाढ़: साइबर ठगी के मामलों में इस्तेमाल होने वाले कथित ‘मनी म्यूल अकाउंट’ का एक मामला सामने आने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2024 में एक महिला ने उन्हें अनाज दिलाने का झांसा देकर उनके नाम से बैंक खाते खुलवाए। खाता खुलने के बाद उससे जुड़ी पासबुक, एटीएम कार्ड और सिम अपने पास रख लिया। अब इन खातों का इस्तेमाल संदिग्ध लेनदेन में किए जाने की आशंका जताई जा रही है।
मामले में ग्रामीणों के आरोपों की जांच और बैंक खातों में हुए वास्तविक लेनदेन की पुष्टि महत्वपूर्ण है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम के लिए किया गया था या नहीं और इसके पीछे कौन लोग शामिल थे।
अनाज दिलाने के नाम पर खुलवाए खाते
ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2024 में एक महिला उनके संपर्क में आई थी। उसने सरकारी या अन्य व्यवस्था के तहत अनाज मिलने का झांसा दिया और इसके लिए बैंक खाता खुलवाने की जरूरत बताई।
महिला की बातों पर भरोसा कर कई ग्रामीणों ने अपने नाम से खाते खुलवा लिए। आरोप है कि बैंक खाता खुलने के बाद उससे जुड़ी पासबुक और एटीएम कार्ड ग्रामीणों के पास रहने के बजाय महिला ने अपने कब्जे में ले लिए।
इतना ही नहीं, खातों से जुड़े मोबाइल नंबर और सिम पर भी कथित तौर पर उसी का नियंत्रण रहा। ऐसे में खाताधारकों को अपने खाते में होने वाले लेनदेन की जानकारी आसानी से नहीं मिल सकती थी।
पासबुक और ATM अपने पास रखने का आरोप
किसी बैंक खाते से पैसे निकालने या दूसरे खाते में भेजने के लिए एटीएम कार्ड, मोबाइल नंबर और अन्य बैंकिंग सुविधाएं महत्वपूर्ण होती हैं। ग्रामीणों का आरोप सही पाया जाता है तो पासबुक, एटीएम और सिम किसी दूसरे व्यक्ति के पास होने से खाते का वास्तविक नियंत्रण खाताधारक के बजाय किसी अन्य के हाथ में जा सकता था।
साइबर अपराध की जांच में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि खातों से कब-कब रकम का लेनदेन हुआ, पैसा कहां से आया और आगे किन खातों में भेजा गया।
बैंक स्टेटमेंट और डिजिटल लेनदेन का रिकॉर्ड पूरे नेटवर्क तक पहुंचने में अहम भूमिका निभा सकता है।
क्या होता है मनी म्यूल अकाउंट?
साइबर अपराध की भाषा में ‘मनी म्यूल अकाउंट’ ऐसे बैंक खाते को कहा जाता है जिसका इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति या गिरोह द्वारा संदिग्ध अथवा अपराध से हासिल रकम प्राप्त करने, निकालने या आगे ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है।
साइबर ठग आमतौर पर ठगी की रकम सीधे अपने व्यक्तिगत बैंक खातों में लेने से बचते हैं। इसके बजाय वे अलग-अलग लोगों के खातों का इस्तेमाल कर रकम को कई चरणों में आगे भेजते हैं।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य पैसे के वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी तक पहुंचने वाली कड़ी को जटिल बनाना हो सकता है।
खाताधारक को कई बार नहीं होती जानकारी
मनी म्यूल से जुड़े सभी मामलों में खाताधारक की भूमिका एक जैसी नहीं होती। कई बार लोग कमीशन या पैसे के लालच में जानबूझकर अपना बैंक खाता उपलब्ध करा देते हैं। वहीं कुछ मामलों में लोगों को नौकरी, सरकारी लाभ, लोन, निवेश या अन्य सुविधाओं का झांसा देकर उनके बैंक खातों और दस्तावेजों पर नियंत्रण हासिल कर लिया जाता है।
ऐसे मामलों में खाताधारक को यह जानकारी तक नहीं होती कि उसके नाम से खुले खाते में बड़ी रकम आ रही है या उसे आगे भेजा जा रहा है।
इसके बावजूद बैंक रिकॉर्ड में खाता उसी व्यक्ति के नाम पर दर्ज होता है। साइबर ठगी की जांच शुरू होने पर पुलिस और बैंक की शुरुआती जांच स्वाभाविक रूप से उसी खाताधारक तक पहुंच सकती है।
ग्रामीणों के सामने बढ़ सकती है परेशानी
यदि ग्रामीणों के नाम से खुले खातों का इस्तेमाल वास्तव में साइबर अपराध की रकम के लेनदेन के लिए किया गया है तो उन्हें जांच प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।
पुलिस उनसे यह पूछ सकती है कि खाता कब खुला, किसके कहने पर खुलवाया गया, एटीएम कार्ड और पासबुक किसके पास थे और खाते में हुए लेनदेन की उन्हें जानकारी थी या नहीं।
ऐसी स्थिति में खाताधारकों के बयान के साथ बैंक शाखा में उपलब्ध खाता खोलने के दस्तावेज, केवाईसी रिकॉर्ड, मोबाइल नंबर और ट्रांजेक्शन हिस्ट्री महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।
सिम कार्ड से खुल सकती है अहम कड़ी
ग्रामीणों का आरोप है कि खातों से जुड़ा सिम भी महिला ने अपने पास रखा था। यदि यह बात जांच में सही पाई जाती है तो संबंधित मोबाइल नंबर का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकता है।
मोबाइल बैंकिंग, ओटीपी और डिजिटल भुगतान जैसी कई सेवाएं बैंक खाते से जुड़े मोबाइल नंबर पर निर्भर करती हैं। इसलिए जांच एजेंसियां यह पता लगा सकती हैं कि सिम का वास्तविक इस्तेमाल किस डिवाइस में और किन स्थानों से किया गया।
तकनीकी जांच से खाते का संचालन करने वाले व्यक्ति तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
बैंक रिकॉर्ड बताएगा कहां गई रकम
पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बैंक खातों का लेनदेन रिकॉर्ड हो सकता है। खातों में रकम किन स्रोतों से आई, कितनी देर तक रही और बाद में कहां ट्रांसफर की गई, इससे संदिग्ध नेटवर्क की तस्वीर सामने आ सकती है।
यदि रकम एटीएम से निकाली गई है तो संबंधित एटीएम के सीसीटीवी फुटेज भी जांच में मददगार हो सकते हैं। इसी तरह डिजिटल माध्यम से पैसा दूसरे खातों में भेजा गया है तो उन खातों की श्रृंखला की जांच की जा सकती है।
एक खाते से दूसरे और फिर तीसरे खाते में रकम भेजे जाने पर पुलिस पूरे ट्रांजेक्शन ट्रेल को खंगाल सकती है।
साइबर ठगी में खातों का नेटवर्क बड़ी चुनौती
साइबर अपराधी ठगी से मिली रकम को छिपाने के लिए कई बैंक खातों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अलग-अलग खातों में छोटी-बड़ी रकम भेजकर बाद में उसे नकद निकालना या अन्य खातों में ट्रांसफर करना जांच को जटिल बना देता है।
इसी वजह से साइबर अपराध की जांच में बैंक खाते, मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस और डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड की अहम भूमिका होती है।
बाढ़ में सामने आए इस मामले में भी यह जांच का विषय है कि ग्रामीणों के नाम पर कितने खाते खुलवाए गए और उनमें कितना लेनदेन हुआ।
बैंक खाता और ATM किसी को न सौंपें
यह मामला बैंकिंग सुरक्षा को लेकर भी सतर्क करता है। किसी व्यक्ति को अपना एटीएम कार्ड, पासबुक, पिन, ओटीपी या बैंक खाते से जुड़ा सिम देना जोखिम भरा हो सकता है।
यदि कोई व्यक्ति नौकरी, अनाज, सरकारी योजना या अन्य लाभ दिलाने के नाम पर बैंक खाता खुलवाने के बाद उसका एटीएम और सिम अपने पास रखने को कहता है तो इसकी तत्काल पुष्टि संबंधित बैंक या अधिकृत विभाग से करनी चाहिए।
अपने खाते में अनजान रकम आने पर उसे आगे ट्रांसफर या नकद निकालने से पहले बैंक को जानकारी देना भी जरूरी है।
जांच से स्पष्ट होगी वास्तविक भूमिका
फिलहाल ग्रामीणों ने महिला पर अनाज का झांसा देकर खाते खुलवाने और बैंकिंग दस्तावेज अपने पास रखने का आरोप लगाया है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
बैंक रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होगा कि संबंधित खातों का इस्तेमाल किस तरह किया गया और उनमें संदिग्ध रकम आई थी या नहीं। साथ ही यह भी जांच का विषय होगा कि ग्रामीणों को लेनदेन की जानकारी थी या वे किसी दूसरे व्यक्ति के झांसे में आए थे।
यदि साइबर फ्रॉड से जुड़े लेनदेन की पुष्टि होती है तो खाते से रकम भेजने और निकालने वाले वास्तविक लोगों की पहचान पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी होगी।





