बिहार

16 साल बाद पत्थर उत्खनन शुरू होने की उम्मीद, पांच स्टोन ब्लॉकों को मिली राहत

nidhi
6 Nov 2026 9:44 AM IST
16 साल बाद पत्थर उत्खनन शुरू होने की उम्मीद, पांच स्टोन ब्लॉकों को मिली राहत
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मुंगेर में 16 साल बाद खुलेंगी पत्थर खदानें?
मुंगेर: बिहार के मुंगेर जिले में करीब 16 वर्षों से बंद पड़े पत्थर उत्खनन उद्योग को दोबारा शुरू करने की कवायद तेज हो गई है। वन एवं पर्यावरण संबंधी प्रतिबंधों के कारण लंबे समय से बंद खदानों के फिर खुलने की संभावना से स्थानीय मजदूरों, कारोबारियों और पत्थर उद्योग से जुड़े लोगों में उम्मीद जगी है। जमालपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक नचिकेता मंडल ने भी मुख्यमंत्री के समक्ष इस उद्योग को दोबारा शुरू करने की मांग उठाई है। मुंगेर में पहले आठ स्टोन ब्लॉकों से पत्थर का उत्खनन होता था। इनमें जमालपुर, शंकरपुर, बाकरपुर, सिकंदरपुर, शीतलपुर, नौवागढ़ी, पाटम और पासिया ऋषिकुंड क्षेत्र शामिल थे। वन संरक्षण और पर्यावरण संबंधी नियमों के कारण वर्ष 2010 से इन क्षेत्रों में उत्खनन गतिविधियां प्रभावित रहीं। उद्योग बंद होने से बड़ी संख्या में मजदूरों को रोजगार के लिए दूसरे क्षेत्रों का रुख करना पड़ा। अब खान एवं भूतत्व विभाग और जिला प्रशासन की पहल के बाद पांच स्टोन ब्लॉकों को भीमबांध वन्यजीव आश्रयणी के प्रतिबंधित दायरे से बाहर किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे इन ब्लॉकों में निर्धारित कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद उत्खनन शुरू करने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, अभी सभी पहाड़ियों पर खनन शुरू करने की अनुमति मिलने की पुष्टि नहीं हुई है।
जिला खनन पदाधिकारी गोपाल कुमार सिंह के अनुसार, पत्थर उद्योग को फिर सक्रिय करने के लिए विभागीय स्तर पर आवश्यक प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। खनन शुरू होने से पहले जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (डीएसआर), खनन क्षेत्रों की नीलामी तथा अन्य जरूरी स्वीकृतियां प्राप्त करनी होंगी।
इस बीच जमालपुर विधायक नचिकेता मंडल ने बंद पड़ी पत्थर खदानों का मुद्दा उठाते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इन्हें दोबारा चालू कराने का आग्रह किया है। विधायक का मानना है कि पत्थर उद्योग के पुनर्जीवित होने से स्थानीय युवाओं और मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। साथ ही लंबे समय से प्रभावित कारोबार को नई गति मिलेगी।
मुंगेर और जमालपुर क्षेत्र में पत्थर उत्खनन कभी स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। खदानों से जुड़े मजदूरों के अलावा पत्थर ढुलाई करने वाले वाहन संचालकों, मशीन ऑपरेटरों, छोटे व्यापारियों और निर्माण सामग्री के कारोबारियों की आजीविका भी इस उद्योग पर निर्भर थी।
खदानों के बंद होने के बाद इन गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ा। कई लोगों को वैकल्पिक रोजगार तलाशना पड़ा, जबकि पत्थर से जुड़े कारोबार में भी गिरावट आई। स्थानीय स्तर पर अनुमान जताया जा रहा है कि खदानों के दोबारा शुरू होने से करीब 10 हजार लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर बन सकते हैं। इसके अलावा सरकार को सालाना लगभग 20 करोड़ रुपये के राजस्व की संभावना भी बताई जा रही है। हालांकि, रोजगार और राजस्व के ये आंकड़े अनुमानित हैं। वास्तविक लाभ खनन की मंजूरी, उत्पादन क्षमता और बाजार की मांग पर निर्भर करेगा।
जमालपुर क्षेत्र के एक महत्वपूर्ण स्टोन ब्लॉक को लेकर अभी वन्यजीव आश्रयणी की सीमा में संशोधन से संबंधित तकनीकी प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई है। ऐसे में सभी पुराने खनन क्षेत्रों में एक साथ काम शुरू होने की संभावना फिलहाल स्पष्ट नहीं है। पर्यावरण संरक्षण भी इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू है। भीमबांध वन्यजीव आश्रयणी और आसपास के वन क्षेत्रों में जैव विविधता तथा वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। खनन गतिविधियों की अनुमति देते समय पर्यावरणीय शर्तों, वन कानूनों और निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा।
प्रशासनिक स्तर पर चल रही इस कवायद से मुंगेर में पत्थर उद्योग के पुनर्जीवन की उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन खदानों में वास्तविक उत्खनन कब शुरू होगा, यह शेष स्वीकृतियों और नीलामी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल जिले के मजदूरों और कारोबारियों की नजर सरकार के अगले फैसले पर टिकी है। यदि सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं, तो लंबे समय से बंद पड़े पत्थर उद्योग को नई शुरुआत मिल सकती है।
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