
पटना। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद और पार्टी के किसान प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुधाकर सिंह ने बिहार विशेष कार्यबल (एसटीएफ) के महानिदेशक और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की संपत्तियों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने अधिकारी और उनके परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज चल-अचल संपत्तियों के मूल्यांकन, खरीद की प्रक्रिया और धन के स्रोत पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। सुधाकर सिंह का आरोप है कि कुछ संपत्तियों के घोषित मूल्य और वास्तविक बाजार मूल्य में काफी अंतर है। उन्होंने ऐसी जमीनों का भी जिक्र किया है, जिनका विवरण वार्षिक संपत्ति घोषणा में नहीं होने का दावा किया गया है।
मंगलवार, 3 नवंबर को सामने आए इन आरोपों के बाद बिहार की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, सुधाकर सिंह के आरोपों की स्वतंत्र जांच में पुष्टि होने की जानकारी अभी सामने नहीं आई है। इसलिए संपत्तियों में अनियमितता या भ्रष्टाचार का आरोप फिलहाल राजनीतिक दावा है, स्थापित तथ्य नहीं।
सुधाकर सिंह ने कहा कि कुंदन कृष्णन, उनकी पत्नी और परिवार के अन्य संबंधित सदस्यों के नाम पर मौजूद सभी चल-अचल संपत्तियों का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि जमीनों की खरीद से जुड़े दस्तावेजों, रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज, जमाबंदी और भुगतान के स्रोत की जांच की जाए। इसके साथ ही संपत्ति घोषणा में दर्ज विवरणों का सरकारी भूमि अभिलेखों से मिलान कराने पर भी जोर दिया।
राजद सांसद ने आरोप लगाया कि संपत्ति विवरण में कुछ जमीनों की कीमत वास्तविक बाजार मूल्य की तुलना में काफी कम दर्शाई गई है। उनका कहना है कि किसी संपत्ति का घोषित मूल्य और वर्तमान बाजार मूल्य अलग होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन संबंधित संपत्तियों की खरीद की तारीख, भुगतान और घोषित आय का परीक्षण किया जाना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि संपत्तियों को खरीदने के लिए धन कहां से आया और क्या इस धन के स्रोत का उल्लेख संबंधित दस्तावेजों में किया गया है।
सुधाकर सिंह ने नालंदा जिले में स्थित कुछ कृषि भूमि का विशेष रूप से जिक्र किया। उनके अनुसार, बिंद गांव में लगभग 7.5 एकड़ पैतृक कृषि भूमि का मूल्य करीब 70 लाख रुपये बताया गया है। इसी तरह दरियापुर में लगभग 5.5 एकड़ जमीन का मूल्य 65 लाख रुपये दर्शाए जाने का दावा किया गया है।
सांसद ने वर्ष 2020 में दरियापुर में खरीदी गई लगभग 3.8 एकड़ जमीन का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, इस जमीन की कीमत संपत्ति विवरण में करीब 12 लाख रुपये बताई गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि जमीन की खरीद के समय वास्तविक भुगतान कितना किया गया था और संबंधित भूमि का उस समय प्रचलित बाजार मूल्य क्या था।
सुधाकर सिंह ने पटना के नाला रोड स्थित संपत्ति और हरियाणा के गुरुग्राम में एक फ्लैट को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, गुरुग्राम की पुरी डिप्लोमैटिक ग्रीन्स परियोजना में स्थित तीन बेडरूम वाले फ्लैट का मूल्य लगभग दो करोड़ रुपये बताया गया है।
राजद सांसद ने मांग की कि इस फ्लैट सहित अन्य संपत्तियों के अधिग्रहण की तारीख, भुगतान की प्रक्रिया और घोषित आय का मिलान किया जाए। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान यह भी देखा जाना चाहिए कि संपत्तियां व्यक्तिगत आय, पैतृक स्रोत या किसी अन्य वैध माध्यम से प्राप्त की गई थीं।
इस मामले में पटना सिटी के ट्रांसपोर्ट नगर की एक जमीन का भी जिक्र सामने आया है। सुधाकर सिंह ने खाता संख्या 77 और प्लॉट संख्या 1484 की लगभग 14.0624 डिसमिल जमीन का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इसका सरकारी मूल्य करीब 91.40 लाख रुपये और बाजार मूल्य लगभग सात करोड़ रुपये है।
उनका आरोप है कि इस जमीन का विवरण संबंधित वार्षिक संपत्ति घोषणा में उपलब्ध नहीं है। हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। जमीन के स्वामित्व और संपत्ति घोषणा में उसके उल्लेख की वास्तविक स्थिति का पता संबंधित सरकारी अभिलेखों के मिलान से ही लगाया जा सकता है।
इसके अलावा राजद सांसद ने पटना के रूपसपुर थाना क्षेत्र के धनौत मौजे की जमीन से संबंधित दस्तावेजों पर भी सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, संपत्ति घोषणा में एक जमीन को वर्ष 2021 में बेचा हुआ दर्शाया गया था, जबकि बिहार भूमि पोर्टल के रिकॉर्ड में संबंधित जमीन का नामांतरण स्पष्ट नहीं दिखाई देता।
सुधाकर सिंह ने मांग की कि ऐसी स्थिति में बिक्री दस्तावेजों और भूमि अभिलेखों का मिलान कराया जाना चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि जमीन वास्तव में कब बेची गई थी और राजस्व रिकॉर्ड में उसका विवरण किस स्थिति में है।
सांसद ने परिवार के सदस्यों के नाम पर मौजूद नकदी, सोना, हीरे और अन्य कीमती वस्तुओं से संबंधित दावों की भी जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि किसी अधिकारी और उनके परिवार की संपत्तियों को लेकर सवाल उठते हैं, तो सभी संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
सुधाकर सिंह ने कृषि भूमि की कुल मात्रा को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि संबंधित अधिकारी और उनके परिवार के नाम पर कितनी कृषि भूमि है, इसकी जांच होनी चाहिए। साथ ही बिहार के भूमि सुधार और अधिकतम सीमा निर्धारण संबंधी कानूनों के पालन का परीक्षण भी जरूरी है।
उन्होंने यह पता लगाने की मांग की कि कहीं अलग-अलग परिजनों के नाम पर जमीन खरीदने के माध्यम से भूमि संबंधी नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया गया। हालांकि, केवल परिवार के विभिन्न सदस्यों के नाम जमीन होना अपने आप में किसी कानून के उल्लंघन को साबित नहीं करता।
इस विवाद की पृष्ठभूमि में एक पुराना मामला भी जुड़ा हुआ है। भोजपुर में भरत भूषण तिवारी की पुलिस कार्रवाई के दौरान हुई मौत को लेकर सुधाकर सिंह पहले भी सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने उस प्रकरण में वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की थी।
इन आरोपों के बाद कुंदन कृष्णन की ओर से सुधाकर सिंह को पांच करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजे जाने की खबर सामने आई थी। इसके बाद सांसद ने मुख्यमंत्री को खुला पत्र लिखकर इस विवाद की जानकारी दी और नोटिस भेजे जाने के औचित्य पर सवाल उठाए थे।
सुधाकर सिंह ने कहा है कि वह मानहानि नोटिस से डरने वाले नहीं हैं और जनहित से जुड़े सवाल उठाते रहेंगे। उनका कहना है कि सार्वजनिक पदों पर कार्यरत अधिकारियों की संपत्तियों से जुड़े सवालों का जवाब दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच के माध्यम से दिया जाना चाहिए।
इस बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी अधिकारी की संपत्ति का वर्तमान बाजार मूल्य उसकी खरीद के समय घोषित राशि से अधिक हो सकता है। इसलिए केवल मूल्य में अंतर के आधार पर अनियमितता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। किसी भी जांच में खरीद के समय का मूल्य, पैतृक संपत्ति की स्थिति, वैध आय और सरकारी अभिलेखों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।
फिलहाल कुंदन कृष्णन की ओर से इन नए संपत्ति संबंधी आरोपों पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आरोपों के संबंध में किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा अनियमितता की पुष्टि की जानकारी भी उपलब्ध नहीं है।
अब देखना होगा कि सरकार सुधाकर सिंह की मांग पर संपत्तियों के स्वतंत्र मूल्यांकन और दस्तावेजों की जांच का आदेश देती है या नहीं। इस मामले में वास्तविक स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब संबंधित अभिलेखों का विधिवत परीक्षण किया जाएगा और सभी पक्षों को अपना स्पष्टीकरण देने का अवसर मिलेगा।





