
सीतामढ़ी। शहर के रिंग बांध स्थित मथुरा उच्च विद्यालय में छात्रों के लिए कमरों की कमी दूर करने के उद्देश्य से करीब 40 लाख रुपये की लागत से बनाया गया दो मंजिला भवन उद्घाटन से पहले ही तोड़ना पड़ा। भवन का एक हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की सीमा में आने के कारण निर्माण को हटाने की कार्रवाई की गई। इस घटना ने सरकारी निर्माण कार्यों में स्थल निरीक्षण, योजना तैयार करने और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विद्यालय में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं के नामांकन को देखते हुए अतिरिक्त कक्षों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इसी समस्या को दूर करने के लिए करीब तीन वर्ष पहले नए भवन के निर्माण की योजना स्वीकृत की गई थी। भवन निर्माण विभाग की ओर से तैयार कराए गए इस दो मंजिला भवन पर लगभग 40 लाख रुपये खर्च किए गए।
लेकिन जिस उद्देश्य से भवन बनाया गया था, वह पूरा होने से पहले ही निर्माण को हटाने की नौबत आ गई।
1176 छात्र-छात्राओं के लिए कमरों की कमी
मथुरा उच्च विद्यालय में वर्तमान में करीब 1176 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं। विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने के कारण विद्यालय में कक्षाओं के संचालन के लिए कमरों की कमी बनी हुई थी। इसी समस्या को देखते हुए नए भवन की योजना तैयार की गई थी।
नए भवन के निर्माण के बाद उम्मीद थी कि विद्यालय में कक्षाओं के लिए अतिरिक्त जगह उपलब्ध होगी और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सकेगा। भवन का निर्माण भी इसी उद्देश्य से कराया गया था।
हालांकि, निर्माण पूरा होने और कक्षाएं शुरू होने से पहले ही रिंग बांध के चौड़ीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ गई। इसके बाद पता चला कि नवनिर्मित भवन का हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की जद में आ रहा है।
सड़क सीमा में आ गया भवन
रिंग बांध के चौड़ीकरण का काम शुरू होने के बाद नए भवन की स्थिति को लेकर सवाल उठे। सड़क के विस्तार के लिए निर्धारित सीमा में भवन का हिस्सा आने के कारण उसे हटाना जरूरी बताया गया।
इसके बाद भवन को तोड़ने की कार्रवाई की गई। इस कार्रवाई से स्थानीय लोगों और विद्यालय से जुड़े लोगों में हैरानी है। लोगों का सवाल है कि यदि सड़क चौड़ीकरण की योजना पहले से प्रस्तावित थी तो भवन निर्माण के लिए स्थल का चयन करते समय इसकी जानकारी क्यों नहीं जुटाई गई।
निर्माण से पहले नहीं हुआ उचित निरीक्षण?
इस घटना ने सरकारी भवनों के निर्माण से पहले होने वाले स्थल निरीक्षण की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी भी निर्माण परियोजना को स्वीकृति देने से पहले संबंधित भूमि की स्थिति, स्वामित्व, सड़क सीमा और भविष्य की विकास योजनाओं की जानकारी जुटाना जरूरी माना जाता है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भवन निर्माण से पहले रिंग बांध के प्रस्तावित चौड़ीकरण की जानकारी संबंधित विभागों को थी या नहीं। यदि जानकारी थी तो सड़क सीमा के भीतर भवन निर्माण की अनुमति कैसे मिली।
वहीं, यदि चौड़ीकरण की योजना बाद में बनी थी तो निर्माण शुरू होने के बाद संबंधित विभागों के बीच समन्वय क्यों नहीं किया गया, यह भी जांच का विषय है।
विभागों के बीच तालमेल पर सवाल
मामले ने भवन निर्माण विभाग और सड़क चौड़ीकरण से जुड़े विभागों के बीच आपसी तालमेल की कमी की ओर भी ध्यान खींचा है। एक तरफ विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त कक्ष उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकारी धन खर्च कर भवन बनाया गया, वहीं दूसरी तरफ सड़क परियोजना के कारण उसे तोड़ना पड़ा।
इससे सरकारी राशि के इस्तेमाल की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि निर्माण से पहले सभी संबंधित विभागों के बीच समन्वय होता तो संभव है कि भवन के लिए कोई दूसरी जगह चुनी जा सकती थी।
उद्घाटन से पहले ही खत्म हो गया उपयोग
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस भवन का निर्माण छात्रों की सुविधा के लिए कराया गया था, उसमें कक्षाएं शुरू तक नहीं हो सकीं। भवन के उद्घाटन से पहले ही उसे तोड़ने की स्थिति पैदा हो गई।
विद्यालय में पहले से कमरों की कमी है। ऐसे में अतिरिक्त भवन के हटाए जाने से विद्यार्थियों को मिलने वाली प्रस्तावित सुविधा भी फिलहाल खत्म हो गई है।
विद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए नए कमरों की आवश्यकता अब भी बनी हुई है। ऐसे में भवन हटाए जाने के बाद इस समस्या का समाधान कैसे होगा, यह महत्वपूर्ण सवाल है।
दोबारा निर्माण की जरूरत
भवन हटाए जाने के बाद विद्यालय में अतिरिक्त कक्षों की जरूरत फिर सामने आ गई है। अब यदि नए भवन के लिए दूसरी जगह का चयन किया जाता है तो उस पर दोबारा सरकारी धन खर्च होने की संभावना है।
ऐसे में स्थानीय लोगों का कहना है कि नए निर्माण से पहले सभी तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं की गहन जांच की जानी चाहिए। भविष्य में किसी अन्य सड़क परियोजना या विकास कार्य की जद में भवन न आए, इसके लिए संबंधित विभागों से आवश्यक अनापत्ति और स्थल संबंधी जानकारी पहले हासिल की जानी चाहिए।
जवाबदेही तय करने की मांग
करीब 40 लाख रुपये की लागत से तैयार भवन के उपयोग में आने से पहले ही तोड़े जाने की घटना के बाद जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ सकती है। लोगों का कहना है कि सरकारी धन से होने वाले निर्माण में इस तरह की स्थिति दोबारा नहीं आनी चाहिए।
यदि जांच में यह सामने आता है कि निर्माण से पहले पर्याप्त स्थल निरीक्षण नहीं किया गया या विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण सरकारी राशि का नुकसान हुआ, तो जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों की भूमिका की समीक्षा की जानी चाहिए।
मथुरा उच्च विद्यालय का यह मामला सरकारी निर्माण योजनाओं में बेहतर योजना, स्थल निरीक्षण और विभागीय समन्वय की जरूरत को उजागर करता है। करीब 40 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद भवन विद्यार्थियों के काम नहीं आ सका। अब जरूरत है कि मामले की पूरी जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि सड़क चौड़ीकरण की जानकारी के बावजूद भवन का निर्माण कैसे हुआ और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।





