
पटना। बिहार में ग्रामीण क्षेत्रों से कर उगाही के सरकार के फैसले को लेकर सियासत तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस निर्णय का कड़ा विरोध करते हुए इसे गरीब ग्रामीणों पर आर्थिक बोझ डालने वाला कदम बताया है। राजद किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष सुधाकर सिंह ने शनिवार को प्रेस वार्ता कर सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाए और कहा कि महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहे ग्रामीणों पर नया कर लगाना उनके आर्थिक शोषण के समान है।
सुधाकर सिंह ने कहा कि गांवों में रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर है। ऐसे समय में यदि उनसे अतिरिक्त कर की वसूली की जाएगी तो इसका सीधा असर गरीब परिवारों की जेब पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि पंचायतों को मजबूत करने के लिए सरकार को ग्रामीण जनता से पैसा लेने के बजाय उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहायता और संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए।
राजद नेता ने कहा कि पंचायतों की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए ग्रामीणों पर कर लगाना उचित समाधान नहीं है। सरकार को पहले यह आकलन करना चाहिए कि कर वसूली से वास्तव में कितना राजस्व प्राप्त होगा और इसके लिए अतिरिक्त कर्मचारियों, व्यवस्था और प्रशासनिक खर्च पर कितना पैसा खर्च होगा। उन्होंने कहा कि कई बार कर संग्रह की प्रक्रिया में जितना राजस्व प्राप्त होता है, उससे अधिक खर्च व्यवस्था बनाने में हो जाता है।
सुधाकर सिंह ने सुझाव दिया कि यदि सरकार को राजस्व बढ़ाने की जरूरत है तो बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अधिक आय वाले क्षेत्रों से कर वसूली पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि एक ओर बड़े उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को राहत दी जाती है, वहीं दूसरी ओर आम ग्रामीणों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
प्रेस वार्ता में योजना आयोग के पूर्व सचिव और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स रिसर्च के पूर्व महानिदेशक डॉ. संतोष मेहरोत्रा भी मौजूद थे। उन्होंने बिहार की आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य देश के सबसे गरीब राज्यों में शामिल है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में कर व्यवस्था लागू करने से आम लोगों के लिए वस्तुओं और सेवाओं की लागत बढ़ सकती है।
उन्होंने कहा कि जब ग्रामीण परिवार पहले से ही सीमित आय में जीवन यापन कर रहे हैं, तब नए करों का असर उनकी रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ेगा। इससे गरीबों की आवश्यक सेवाओं और सुविधाओं तक पहुंच और कठिन हो सकती है। उन्होंने कहा कि पंचायतों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए राज्य सरकार को अनुदान, योजनाओं की राशि और वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए।
राजद ने पंचायतों के परिसीमन के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा। सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया कि पंचायतों के परिसीमन की प्रक्रिया के पीछे सरकार की मंशा साफ नहीं है। उन्होंने इसे भूमि हड़पने का एक हथकंडा बताया। उनका कहना था कि परिसीमन के जरिए पंचायत प्रतिनिधियों को प्रभावित किया जा सकता है और भविष्य में भूमि अधिग्रहण जैसी प्रक्रियाओं में सरकार को आसानी हो सकती है।
उन्होंने कहा कि ग्राम सभा की भूमिका भूमि संबंधी फैसलों में महत्वपूर्ण होती है और पंचायत प्रतिनिधि इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए पंचायत परिसीमन को लेकर पारदर्शिता जरूरी है ताकि ग्रामीणों के हितों की रक्षा हो सके।
राजद ने मांग की है कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों पर नए कर लगाने के फैसले पर पुनर्विचार करे। पार्टी का कहना है कि पंचायतों को मजबूत बनाने के लिए गरीब जनता से पैसा लेने के बजाय सरकार को वित्तीय सहायता और विकास योजनाओं के माध्यम से संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए। वहीं, सरकार की ओर से इस मामले में अभी कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
ग्रामीण कर व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है, क्योंकि पंचायत स्तर पर आर्थिक फैसलों का सीधा असर बड़ी ग्रामीण आबादी पर पड़ता है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है, जबकि सरकार का पक्ष आने के बाद ही इस नीति की आगे की दिशा स्पष्ट हो पाएगी।





