बिहार

खुलासा: रखरखाव की कमी से खंडहर बनते जा रहे पशु अस्पताल

Admindelhi1
30 March 2024 6:43 AM GMT
खुलासा: रखरखाव की कमी से खंडहर बनते जा रहे पशु अस्पताल
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चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि आम जनता के बीच किए गए वादे को भूल जाते हैं.

भागलपुर: चुनाव नजदीक आते ही तमाम राजनीतिक पार्टियों के नेता क्षेत्र के विकास के मुद्दों को प्राथमिकता देते हुए तरह-तरह के लोक लुभावन वादे करते हैं. लेकिन, चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि आम जनता के बीच किए गए वादे को भूल जाते हैं. इन समस्याओं की भीड़ में गुम छौड़ाही प्रखंड में भोजा, रामपुर कचहरी, नारायणपीपर, एकंबा आदि गांवों का पशु अस्पताल तकरीबन तीन दशक से उद्धारक की बाट जोह रहा है. सबसे खास बात यह रही कि लाखों वोटरों ने जिस नेता को सांसद बनाकर दिल्ली भेजा और वह इत्तेफाक से केन्द्रीय पशुपालन, डेयरी व मत्स्यपालन मंत्री भी बने लेकिन उन्होंने पशुपालकों पर ध्यान नहीं दिया. यहां तक कि चेरियाबरियारपुर विधानसभा से जीतीं पूर्व विधायक सह समाज कल्याण मंत्री भी पशुपालकों के दर्द को नहीं समझ सकीं.

इलाके के लोगों का कहना है कि कई सासंद व विधायक आए और गये लेकिन पशु अस्पतालों के मुद्दे को लेकर एक भी जनप्रतिनिधि ने ठोस पहल नहीं की. इसका खामियाजा आज भी प्रखंड की दस पंचायतों के हजारों पशुपालक भुगत रहे हैं और निजी पशु चिकित्सकों से अपने पशुओं का महंगी दर पर इलाज कराना उनकी मजबूरी बन गयी है. समय के साथ गांवों के गली-मोहल्ले, बिजली-पानी, सड़क व पंचायतें हाईटेक होती गयी लेकिन जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से पशु अस्पताल तीन दशकों से खुद बीमार पड़ा है. वर्तमान में आलम यह है कि उक्त गांवों का पशु अस्पताल धीरे-धीरे भूत बंगले में तब्दील होता जा रहा है.

ग्रामीण इलाकों के मृतप्राय पशु अस्पताल पर विभागीय स्तर से ही पहल की जा सकती है. जहां तक पशुओं के इलाज का सवाल है तो सावंत पंचायत भवन में अस्थायी रूप से पशु अस्पताल संचालित किया जा रहा है. विभाग से जिले को राशि आवंटित कर दी गयी है. सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो आगामी को राजस्व समन्वय समिति की बैठक में प्रखंड स्तर पर पशु अस्पताल निर्माण के लिए भूमि मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा. -डॉ. मकेश्वर साह, प्रखंड पशुपालन अधिकारी

1952 में ग्रामीणों के सहयोग से कुछ पंचायतों में पशु अस्पताल की रखी गई थी नींव

पशुपालक राम अशीष यादव, बुलीत यादव, शिवजी महतो, कैलाश महतो, पवन महतो, रामचंद्र महतो, कारी शर्मा, सिंटु कुमार, नंदन कुमार सिंह, रामलोचन महतो, मिंटू कुमार समेत अन्य पशुपालकों का कहना है कि आजादी के बाद वर्ष 1952 में स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से प्रखंड की कुछ पंचायतों में पशु अस्पताल की नींव रखी गई थी. तब अस्पतालों में एक पशु चिकित्सक तथा एक कम्पाउंडर की प्रतिनियुक्ति हुई जहां हरेक पशु अस्पताल में आसपास के गांवों के पशुपालक को राहत मिली और वे अपने पशुओं को गंभीर बीमारी होने पर इलाज कराने के लिए आने-जाने लगे.

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