
फतेहपुर: प्रखंड के रंगूनगर गांव में बोरवेल में गिरे चार वर्षीय पीयूष के सकुशल बाहर निकलने के बाद पूरे क्षेत्र में राहत और खुशी का माहौल है। जहां लोग एसडीआरएफ की टीम की सफल रेस्क्यू कार्रवाई और प्रशासन की तत्परता की सराहना कर रहे हैं, वहीं ग्रामीणों के बीच इस घटना को लेकर एक भावनात्मक चर्चा भी चल रही है। गांव की महिलाएं पीयूष के बच जाने को मां की ममता, दुआ और उसके माथे पर लगाए गए काले टीके से जोड़कर देख रही हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, पीयूष की मां प्रमिला देवी ने घटना वाले दिन गुरुवार को ही बेटे की आंखों में काजल लगाया था और उसके माथे पर काला टीका भी लगाया था। गांव की परंपरा के अनुसार छोटे बच्चों को बुरी नजर और नकारात्मक प्रभाव से बचाने के लिए काजल या काला टीका लगाया जाता है। महिलाओं का मानना है कि मां के स्नेह और दुआ के साथ लगाया गया यह टीका बच्चे की रक्षा में एक भावनात्मक प्रतीक बन गया।
रंगूनगर गांव में पीयूष के सुरक्षित बचने की खबर पहुंचते ही लोगों ने राहत की सांस ली। कई ग्रामीणों ने बताया कि जब बच्चे के बोरवेल में गिरने की जानकारी मिली थी, तब पूरे गांव में चिंता का माहौल था। परिवार के साथ-साथ आसपास के लोग भी लगातार उसकी सलामती की प्रार्थना कर रहे थे। घंटों चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद जब पीयूष को बाहर निकाला गया तो लोगों की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।
इस पूरे अभियान में एसडीआरएफ की टीम ने बेहद सावधानी और तकनीकी कुशलता के साथ काम किया। बच्चे तक पहुंचने के लिए विशेषज्ञों ने लगातार प्रयास किए और सुरक्षित तरीके से उसे बाहर निकालने में सफलता हासिल की। प्रशासनिक अधिकारियों और राहत टीमों की सक्रियता की ग्रामीणों ने जमकर प्रशंसा की।
हालांकि, इस घटना के बाद गांव में चर्चा का एक भावनात्मक पहलू भी सामने आया है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि मां अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास करती है। काला टीका लगाने की परंपरा भी इसी भावना से जुड़ी हुई है। उनका मानना है कि प्रमिला देवी ने जिस प्यार और विश्वास के साथ बेटे को काला टीका लगाया था, वह इस मुश्किल समय में उनके लिए उम्मीद और विश्वास का प्रतीक बन गया।
गांवों में बच्चों को काजल लगाने और माथे पर काला टीका लगाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। कई परिवार आज भी छोटे बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए यह परंपरा निभाते हैं। हालांकि इसके पीछे वैज्ञानिक आधार को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन ग्रामीण समाज में यह परंपरा भावनाओं और पारिवारिक विश्वास से जुड़ी हुई है।
पीयूष की मां प्रमिला देवी के लिए यह घटना किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं थी। बच्चे के बोरवेल में गिरने की खबर के बाद परिवार के लोग बेहद परेशान थे। मां की चिंता और बेटे की सलामती के लिए की गई प्रार्थनाएं पूरे गांव की संवेदनाओं से जुड़ गई थीं।
रेस्क्यू के बाद पीयूष के स्वास्थ्य को लेकर भी लोगों ने राहत महसूस की। चिकित्सकीय निगरानी के बाद उसकी स्थिति सामान्य बताई गई। परिवार और ग्रामीणों ने राहत टीमों का धन्यवाद किया और प्रशासन से खुले पड़े बोरवेल को लेकर सतर्कता बरतने की मांग भी की।
ग्रामीणों का कहना है कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए गांव और आसपास के क्षेत्रों में खुले बोरवेल की पहचान कर उन्हें सुरक्षित तरीके से बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पीयूष की जिंदगी बचना एक बड़ी राहत है, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सावधानी जरूरी है।
फतेहपुर के रंगूनगर में पीयूष का रेस्क्यू अब केवल एक हादसे से जुड़ी घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह मां के विश्वास, ग्रामीणों की एकजुटता और बचाव दल की मेहनत की कहानी बन गया है। जहां तकनीकी प्रयासों ने बच्चे की जान बचाई, वहीं परिवार और ग्रामीणों की भावनाएं इस घटना को और भी यादगार बना रही हैं।





