
x
संडे को बैलों की छुट्टी खेतों में नहीं कराया जाता कोई काम
नवादा: बिहार के नवादा जिले में एक अनोखी परंपरा करीब 80 वर्षों से चली आ रही है। यहां कुछ गांवों के किसान रविवार के दिन अपने बैलों से खेती या किसी दूसरे तरह का काम नहीं कराते। सप्ताह के बाकी दिनों में खेत जोतने से लेकर सामान ढोने तक किसानों का साथ देने वाले बैलों को रविवार को पूरा आराम दिया जाता है। स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि पशुओं के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का प्रतीक भी है। किसानों का कहना है कि जिस तरह लगातार काम करने वाले इंसान को सप्ताह में एक दिन आराम की जरूरत होती है उसी तरह खेती में मेहनत करने वाले बैलों को भी विश्राम मिलना चाहिए। इसी सोच के साथ रविवार को बैलों से काम नहीं कराने की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
रविवार को बैलों से नहीं कराया जाता काम
रविवार आते ही बैलों के लिए मानो छुट्टी का दिन शुरू हो जाता है। किसान उन्हें खेत जोतने, गाड़ी खींचने या दूसरे भारी काम में नहीं लगाते। इस दिन बैलों को आराम दिया जाता है और उनके चारे-पानी का विशेष ध्यान रखा जाता है। खेती में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल बढ़ने के बावजूद कई ग्रामीण क्षेत्रों में बैलों का महत्व आज भी बना हुआ है। छोटे और सीमांत किसान विभिन्न कृषि कार्यों के लिए पशुओं पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में रविवार की छुट्टी वाली यह परंपरा पशुओं और किसानों के बीच पुराने संबंध को भी दर्शाती है।
करीब 80 साल पुरानी बताई जाती है परंपरा
स्थानीय लोगों के मुताबिक बैलों को रविवार के दिन आराम देने की यह परंपरा करीब आठ दशक पुरानी है। बुजुर्ग बताते हैं कि उनके पूर्वज भी इसका पालन करते थे। समय बदला, खेती के तरीके बदले और ट्रैक्टर समेत आधुनिक कृषि मशीनें गांवों तक पहुंच गईं लेकिन यह परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई। नई पीढ़ी के कई किसान भी बुजुर्गों से मिली इस परंपरा का पालन कर रहे हैं। उनका मानना है कि पशु खेती और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं इसलिए उनके स्वास्थ्य और आराम का ध्यान रखना किसान की जिम्मेदारी है।
पशुओं के प्रति संवेदनशीलता की मिसाल
बैलों को सप्ताह में एक दिन आराम देने की यह व्यवस्था पशु कल्याण के नजरिए से भी दिलचस्प है। लगातार भारी काम करने वाले पशुओं को पर्याप्त आराम, पानी और पौष्टिक आहार मिलना उनके स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होता है। ग्रामीण समाज में बैलों को लंबे समय से किसान का साथी माना जाता रहा है। खेत तैयार करने से लेकर फसल और सामान ढोने तक बैलों ने खेती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही वजह है कि नवादा की यह परंपरा पशुओं के प्रति कृतज्ञता से भी जोड़कर देखी जाती है। आज जब खेती तेजी से मशीनीकरण की ओर बढ़ रही है तब भी नवादा में बैलों की 'संडे की छुट्टी' वाली परंपरा लोगों का ध्यान खींच रही है। करीब 80 वर्षों से चली आ रही यह अनूठी प्रथा इंसान और पशुओं के बीच संवेदनशील रिश्ते की एक अलग मिसाल पेश करती है।
Next Story





