बिहार

दशहरे पर यहां घर-घर खिलाई जाती है मिठाई, पान का बीड़ा देकर होती है विदाई

Kavita2
21 Oct 2026 5:52 PM IST
दशहरे पर यहां घर-घर खिलाई जाती है मिठाई, पान का बीड़ा देकर होती है विदाई
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बगहा। आधुनिक दौर में जहां मोबाइल फोन और इंटरनेट मीडिया ने लोगों के बीच बातचीत और मेलजोल के तरीकों को बदल दिया है, वहीं बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बगहा स्थित मलकौली-पठखौली में दशहरे की एक अनोखी परंपरा आज भी रिश्तों की मिठास बनाए हुए है। यहां विजयादशमी की शाम लोग एक-दूसरे के घर पहुंचकर मिठाई खाते हैं और विदाई के समय पान का बीड़ा ग्रहण करते हैं। इस परंपरा की खास बात यह है कि इसमें बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी भाग लेते हैं। घरों के सामने मिठाई की थाली और सजे हुए पान लेकर अतिथियों का स्वागत किया जाता है। यह आयोजन केवल त्योहार की खुशियां बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का संदेश भी देता है।

विजयादशमी की शाम सजती है मिठाई की थाली

मलकौली-पठखौली में दशहरे की शाम का नजारा अन्य दिनों से अलग होता है। लोग अपने घरों के सामने मिठाइयों की थाली सजाकर बैठते हैं। साथ ही अतिथियों को विदा करने के लिए पान का बीड़ा भी तैयार रखा जाता है।

जैसे-जैसे लोग एक-दूसरे के घर पहुंचते हैं, उनका स्वागत मिठाई खिलाकर किया जाता है। कुछ देर बातचीत और शुभकामनाओं के आदान-प्रदान के बाद मेहमानों को पान का बीड़ा देकर विदा किया जाता है।

इस तरह एक घर से दूसरे घर तक मुलाकातों का सिलसिला चलता है। त्योहार के बहाने पड़ोसियों और परिचितों को साथ बैठने तथा खुशियां साझा करने का अवसर मिलता है।

उम्र का कोई बंधन नहीं, सभी निभाते हैं परंपरा

इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता इसमें सभी आयु वर्ग के लोगों की भागीदारी है। बच्चे हों या बुजुर्ग, युवा हों या महिलाएं, सभी एक-दूसरे के घर जाकर दशहरे की शुभकामनाएं देते हैं।

बच्चों को जहां मिठाई खाने और लोगों से मिलने का अवसर मिलता है, वहीं युवाओं को अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का मौका मिलता है।

बुजुर्गों के लिए यह आयोजन पुरानी सामाजिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम है। परिवार के सदस्य मिलकर अतिथियों का स्वागत करते हैं और त्योहार की खुशियों को साझा करते हैं।

मोबाइल संदेशों से अलग है मुलाकात की खुशी

आज त्योहारों पर शुभकामनाएं भेजने के लिए मोबाइल फोन और इंटरनेट मीडिया का व्यापक इस्तेमाल होता है। लोग संदेश, तस्वीरें और वीडियो भेजकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं।

इससे दूर रहने वाले लोगों से संपर्क करना आसान हुआ है, लेकिन आमने-सामने बैठकर बातचीत करने का अपना अलग महत्व है।

मलकौली-पठखौली की दशहरा परंपरा इसी व्यक्तिगत मेलजोल को बनाए रखने का उदाहरण है। यहां लोग केवल संदेश भेजने के बजाय एक-दूसरे के घर पहुंचते हैं।

मिठाई खिलाने और पान देकर विदा करने के दौरान होने वाली बातचीत रिश्तों में आत्मीयता बनाए रखने का अवसर देती है।

मिठाई से स्वागत, पान से सम्मान

भारतीय संस्कृति में मिठाई का संबंध शुभ अवसरों और खुशियों से रहा है। त्योहारों पर मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं देने की परंपरा देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित है।

इसी तरह पान का बीड़ा कई क्षेत्रों में अतिथि सत्कार और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

मलकौली-पठखौली में इन दोनों परंपराओं का अनूठा संगम दिखाई देता है। यहां मिठाई से अतिथि का स्वागत होता है और पान के बीड़े से सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है।

इस छोटे से व्यवहार के माध्यम से लोगों के बीच अपनापन और आदर व्यक्त किया जाता है।

सामाजिक भाईचारे को मजबूत करती है परंपरा

दशहरे पर घर-घर जाकर मिलने की यह परंपरा सामाजिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

रोजमर्रा की व्यस्तता में कई बार पड़ोसियों और परिचितों से नियमित मुलाकात नहीं हो पाती। ऐसे में त्योहार एक-दूसरे से मिलने का अवसर बन जाते हैं।

मलकौली-पठखौली में विजयादशमी की शाम होने वाला यह आयोजन लोगों को आपसी संवाद का मौका देता है।

इस दौरान सभी एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। इससे समाज में प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिलता है।

नई पीढ़ी को मिल रही सांस्कृतिक सीख

किसी भी स्थानीय परंपरा को जीवित रखने के लिए नई पीढ़ी की भागीदारी जरूरी होती है।

मलकौली-पठखौली में बच्चों और युवाओं का इस आयोजन में शामिल होना सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

जब बच्चे अपने परिवार के साथ पड़ोसियों के घर जाते हैं, तो उन्हें अतिथि सत्कार, बड़ों के सम्मान और सामाजिक व्यवहार के बारे में सीखने का अवसर मिलता है।

ऐसी परंपराएं केवल सुनने या पढ़ने से नहीं, बल्कि उनमें भाग लेने से आगे बढ़ती हैं।

दशहरे को मिलता है सामाजिक उत्सव का स्वरूप

दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।

कहीं रावण दहन होता है, तो कहीं धार्मिक अनुष्ठान, शोभायात्राएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

बगहा के मलकौली-पठखौली में विजयादशमी की शाम मिठाई और पान के साथ अतिथियों का स्वागत करना इस पर्व को विशेष पहचान देता है।

यहां त्योहार का महत्व केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक मेलजोल और रिश्तों को मजबूत करने से भी जुड़ जाता है।

बदलते समय में भी बरकरार है रिश्तों की मिठास

समय के साथ लोगों की जीवनशैली और त्योहार मनाने के तरीकों में बदलाव आया है। आधुनिक तकनीक ने संपर्क के नए साधन उपलब्ध कराए हैं।

इसके बावजूद मलकौली-पठखौली में दशहरे की यह परंपरा लोगों को व्यक्तिगत रूप से मिलने और खुशियां बांटने के लिए प्रेरित करती है।

इस आयोजन के लिए किसी बड़े मंच या औपचारिक समारोह की आवश्यकता नहीं होती। घरों के सामने रखी मिठाई की थाली और सजे हुए पान ही स्वागत का माध्यम बन जाते हैं।

यही सादगी इस परंपरा को विशेष बनाती है।

पूरे समाज को जोड़ने का संदेश

मलकौली-पठखौली की यह अनूठी परंपरा बताती है कि त्योहारों का वास्तविक आनंद मिलजुलकर मनाने में है।

जब लोग एक-दूसरे के घर पहुंचते हैं, साथ बैठते हैं और शुभकामनाएं देते हैं, तो सामाजिक संबंधों में निकटता बढ़ती है।

विजयादशमी की शाम मिठाई खिलाने और पान का बीड़ा देकर विदा करने की यह परंपरा आज भी प्रेम, सम्मान और भाईचारे का सुंदर उदाहरण बनी हुई है। इंटरनेट मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच बगहा की यह सांस्कृतिक पहचान याद दिलाती है कि रिश्तों की असली मिठास व्यक्तिगत मुलाकात और अपनत्व में ही बसती है।

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