बिहार

बारिश कम तो चिंता नहीं, स्प्रिंकलर से बढ़ेगी धान की पैदावार

Saba Naaz
21 July 2026 2:51 PM IST
बारिश कम तो चिंता नहीं, स्प्रिंकलर से बढ़ेगी धान की पैदावार
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बक्सर। मानसून में देरी और सामान्य से कम बारिश के कारण बिहार के बक्सर जिले में धान की खेती प्रभावित हो रही है। पानी की कमी के चलते कई किसान धान की रोपनी शुरू नहीं कर पा रहे हैं, वहीं जिन किसानों ने रोपाई कर दी है, उन्हें फसल बचाने के लिए अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ रही है। ऐसे हालात में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को कम पानी में बेहतर उत्पादन हासिल करने के लिए टपक और फव्वारा सिंचाई यानी स्प्रिंकलर तकनीक अपनाने की सलाह दी है।

बक्सर जिले में इस साल करीब 98 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन जुलाई के अंतिम दिनों तक भी बारिश की कमी के कारण धान की रोपनी पूरी गति नहीं पकड़ पाई है। शुरुआती दिनों में मानसून कमजोर रहने से किसान खेतों में पर्याप्त नमी का इंतजार करते रहे। हालांकि हाल में हुई कुछ बारिश के बाद रोपनी की रफ्तार में सुधार देखने को मिला है।

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि बदलते मौसम और कम बारिश की स्थिति में पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर रहना किसानों के लिए मुश्किल हो सकता है। ऐसे में आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल कर पानी की बचत के साथ फसल उत्पादन को बनाए रखा जा सकता है।

जिला कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक हरिगोविंद जायसवाल ने बताया कि किसान टपक विधि और फव्वारा विधि अपनाकर कम पानी में भी धान समेत अन्य फसलों की अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। इन तकनीकों में खेतों में पाइपलाइन बिछाई जाती है, जिसके जरिए पौधों तक जरूरत के अनुसार पानी पहुंचाया जाता है।

उन्होंने बताया कि स्प्रिंकलर सिस्टम में पानी दबाव के जरिए फव्वारे की तरह खेत में फैलता है। इससे पानी सीधे पौधों तक पहुंचता है और मिट्टी में नमी भी बनी रहती है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे पारंपरिक सिंचाई की तुलना में करीब 50 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार धान की खेती में खेत को लगातार पानी से भरा रखने की जरूरत नहीं होती। किसान वैकल्पिक गीला और सूखा सिंचाई पद्धति अपनाकर भी बेहतर उत्पादन ले सकते हैं। इसके लिए खेत में उचित क्यारियां बनाकर पौधों की रोपाई करना जरूरी है। इससे पानी का सही उपयोग होता है और पौधों की जड़ों तक पर्याप्त नमी पहुंचती रहती है।

विशेषज्ञों ने किसानों को यह भी सलाह दी है कि खेत में सिंचाई तभी करें, जब मिट्टी की ऊपरी सतह पर हल्की दरारें दिखाई देने लगें। जरूरत से ज्यादा पानी देने से जहां पानी की बर्बादी होती है, वहीं फसल पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।

खेतों में नमी बनाए रखने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने मल्चिंग तकनीक अपनाने की सलाह दी है। इसके तहत पौधों की कतारों के बीच सूखी घास, पुआल या प्लास्टिक शीट बिछाई जाती है। इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और खरपतवार की समस्या भी कम होती है।

कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को उर्वरक प्रबंधन को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि धान की रोपाई के समय एक साथ ज्यादा मात्रा में यूरिया डालने से बचना चाहिए। इसके बजाय तीन से चार चरणों में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल करना ज्यादा लाभकारी होता है। इससे पौधों को लगातार पोषण मिलता रहता है और उत्पादन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

राज्य कृषि विभाग की ओर से स्प्रिंकलर उपकरणों की खरीद पर किसानों को अनुदान देने का भी प्रावधान है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट और अनियमित बारिश के दौर में ऐसी आधुनिक तकनीकें किसानों के लिए काफी मददगार साबित हो सकती हैं।

कम बारिश के बावजूद यदि किसान वैज्ञानिक सलाह और आधुनिक सिंचाई पद्धतियों को अपनाते हैं तो धान की अच्छी पैदावार हासिल की जा सकती है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में पानी की बचत वाली तकनीकें खेती को टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी।

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