
पटना। बिहार में लागू शराबबंदी को लेकर एक नई शोध रिपोर्ट ने बहस को फिर तेज कर दिया है। राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) के एक अध्ययन में शराबबंदी की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए इसे समाप्त करने की सिफारिश किए जाने की बात सामने आई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम करने के अपने उद्देश्य में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी है। इसके साथ ही ऐसे संकेत भी मिले हैं कि वैध शराब की उपलब्धता बंद होने के बाद नशीली दवाओं और अवैध शराब के सेवन में बढ़ोतरी हुई है।
‘बिहार के विकास की उपलब्धियों का व्यापक परिप्रेक्ष्य, अधूरा एजेंडा और आगे की राह’ शीर्षक वाले शोध पत्र में राज्य की अर्थव्यवस्था, सामाजिक विकास और राजस्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में शराबबंदी को बिहार की अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल करते हुए इसके प्रभावों की समीक्षा की गई है।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने के उद्देश्य पर सवाल
शराबबंदी लागू करने के पीछे बिहार सरकार की प्रमुख दलीलों में से एक शराब से जुड़ी घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम करना रहा है। हालांकि, NCAER के अध्ययन में कहा गया है कि शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने में अपेक्षित रूप से सफल नहीं रही।
रिपोर्ट के अनुसार, शराब की बिक्री और सेवन पर कानूनी रोक लगाए जाने के बावजूद हिंसा से जुड़ी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अध्ययन में इस बात पर भी ध्यान दिलाया गया है कि शराबबंदी के बाद उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव आया और वैध शराब की जगह अवैध शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों की ओर रुझान बढ़ने के संकेत मिले हैं।
हालांकि, इस तरह के निष्कर्षों को शराबबंदी पर व्यापक नीति बहस के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। शराबबंदी के समर्थक लंबे समय से इसे सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा से जोड़ते रहे हैं, जबकि विरोधी इसके क्रियान्वयन, अवैध शराब और राजस्व नुकसान को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
अवैध शराब और नशीले पदार्थों की चुनौती
शोध में यह भी संकेत दिया गया है कि शराब पर कानूनी प्रतिबंध के बाद कुछ उपभोक्ताओं ने वैकल्पिक नशीले पदार्थों और अवैध शराब का सहारा लिया। इससे शराबबंदी लागू करने वाली व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती पैदा हुई है।
अवैध शराब के कारोबार पर नियंत्रण के लिए पुलिस और प्रशासन को लगातार कार्रवाई करनी पड़ती है। इसके अलावा तस्करी रोकने के लिए राज्य की सीमाओं पर भी निगरानी और प्रवर्तन गतिविधियां बढ़ानी पड़ती हैं। NCAER के अध्ययन में इन अभियानों पर होने वाले खर्च को भी आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, शराबबंदी की वजह से सरकार को केवल शराब से मिलने वाले उत्पाद शुल्क से ही वंचित नहीं होना पड़ता, बल्कि अवैध शराब और शराब की तस्करी पर रोक लगाने के लिए अतिरिक्त प्रशासनिक संसाधन भी लगाने पड़ते हैं।
राजस्व में 14 से 15 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान
NCAER के अध्ययन में शराब उत्पाद शुल्क को फिर से लागू करने से बिहार सरकार के अपने राजस्व में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने का अनुमान जताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि शराब उत्पाद शुल्क दोबारा लागू किया जाता है तो राज्य के अपने राजस्व में करीब 14 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।
राजस्व के लिहाज से यह प्रस्ताव बिहार के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। बिहार की अर्थव्यवस्था लंबे समय से कम प्रति व्यक्ति आय और सीमित राज्यीय कर संग्रह जैसी चुनौतियों से जूझती रही है। NCAER की एक अन्य बिहार संबंधी रिपोर्ट में भी राज्य के कम कर और गैर-कर संग्रह तथा केंद्र से मिलने वाले हस्तांतरण पर उसकी निर्भरता का उल्लेख किया गया है।
ऐसे में शराब उत्पाद शुल्क से होने वाली अतिरिक्त आय का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और अन्य विकास कार्यों में किया जा सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह नीति निर्णय और सरकार की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।
तस्करी-रोधी अभियान का खर्च भी घटने का दावा
शोध पत्र में केवल राजस्व बढ़ने की बात नहीं कही गई है, बल्कि यह भी कहा गया है कि शराब उत्पाद शुल्क की व्यवस्था बहाल होने से प्रवर्तन और तस्करी-रोधी अभियानों पर होने वाले सरकारी खर्च में कमी आ सकती है।
वर्तमान व्यवस्था में शराब की अवैध बिक्री, परिवहन और तस्करी रोकने के लिए पुलिस तथा प्रशासन को लगातार कार्रवाई करनी पड़ती है। राज्य की सीमाओं से शराब की आवाजाही पर निगरानी भी की जाती है। यदि शराब की वैध बिक्री और उस पर कर व्यवस्था बहाल होती है तो सरकार के लिए निगरानी और प्रवर्तन का स्वरूप बदल सकता है।
शराबबंदी पर फिर शुरू हो सकती है राजनीतिक बहस
NCAER के अध्ययन के सामने आने के बाद बिहार में शराबबंदी की नीति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होने की संभावना है। एक तरफ शराबबंदी को सामाजिक सुधार, परिवारों की आर्थिक स्थिति और महिलाओं की सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके कारण राजस्व नुकसान, अवैध शराब और तस्करी जैसे मुद्दे उठते रहे हैं।
शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नीति बिहार में लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा रही है। ऐसे में किसी भी बदलाव का असर केवल राजस्व पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर भी पड़ेगा।
फिलहाल NCAER के अध्ययन ने शराबबंदी के प्रभावों को आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टिकोण से देखने का सवाल सामने रखा है। रिपोर्ट में शराब उत्पाद शुल्क बहाल करने से राजस्व बढ़ने और प्रवर्तन खर्च घटने की संभावना जताई गई है, जबकि शराबबंदी के सामाजिक उद्देश्यों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि बिहार सरकार इस अध्ययन के निष्कर्षों को किस तरह देखती है और शराबबंदी की मौजूदा नीति में किसी बदलाव की दिशा में आगे बढ़ती है या नहीं। राज्य में शराबबंदी जारी रखने या उसमें बदलाव करने का फैसला आने वाले समय में बिहार की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।





