
मुजफ्फरपुर: प्रसिद्ध लीची को लंबे समय तक ताजा रखने और विदेशी बाजारों तक पहुंचाने की कोशिश को बड़ा झटका लगा है। मेडागास्कर की सल्फर आधारित प्रसंस्करण तकनीक से लीची को 40 दिनों तक सुरक्षित रखने का प्रयोग सफल नहीं हो सका। इस तकनीक से तैयार की गई चाइना किस्म की लीची को दुबई भेजा गया था, लेकिन वहां पहुंचने के बाद फलों पर सफेद दाग दिखाई देने लगे। इसके चलते दुबई के अधिकारियों ने लीची को बाजार में बिक्री के लिए अनुमति नहीं दी।
मुजफ्फरपुर की लीची को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान दिलाने के उद्देश्य से यह प्रयोग किया गया था। इसके लिए जिले के अलग-अलग बागानों से 15 जून को करीब 20 टन लीची का संग्रह किया गया था। विज्रो नाम की कंपनी ने मेडागास्कर के वैज्ञानिक एरिक द्वारा विकसित विशेष प्रसंस्करण यूनिट के जरिए लीची को संरक्षित करने की प्रक्रिया अपनाई।
प्रसंस्करण के बाद करीब आठ टन से अधिक लीची को विशेष वाहन से मुंबई भेजा गया। वहां से इसे समुद्री मार्ग के जरिए दुबई रवाना किया गया। करीब 20 दिन बाद सात जुलाई को लीची दुबई पहुंची, लेकिन जांच के दौरान फलों की गुणवत्ता में कमी पाई गई। लीची के छिलकों पर सफेद दाग मिलने के कारण उसे बिक्री के लिए उपयुक्त नहीं माना गया।
इस प्रयोग के साथ ही राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र में भी समानांतर परीक्षण किया गया था। वहां रखे गए नमूनों में भी इसी तरह के सफेद दाग देखने को मिले। इससे साफ हो गया कि मेडागास्कर की सल्फर आधारित तकनीक चाइना किस्म की लीची को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सफल नहीं हो पाई।
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास ने बताया कि सल्फर आधारित प्रसंस्करण तकनीक नई नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार 10 पीपीएम तक सल्फर से प्रसंस्कृत लीची को स्वीकार किया जाता है। मेडागास्कर के वैज्ञानिक ने इसी मानक को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रसंस्करण यूनिट तैयार की थी।
उन्होंने कहा कि इस बार यह परीक्षण चाइना किस्म की लीची पर किया गया था, जिसमें अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। साथ ही यह प्रयोग लीची सीजन के अंतिम चरण में किया गया था, जिसका असर भी परिणामों पर पड़ सकता है।
डॉ. दास ने बताया कि शाही लीची पर इस तरह की तकनीक के पहले बेहतर परिणाम सामने आते रहे हैं। यदि अगले वर्ष संबंधित एजेंसी शाही लीची पर इस तकनीक का परीक्षण करना चाहती है तो राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र की ओर से पूरा तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा।
मुजफ्फरपुर की लीची देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। किसानों और निर्यातकों को उम्मीद थी कि इस तकनीक से लीची को लंबे समय तक सुरक्षित रखकर खाड़ी देशों और अन्य विदेशी बाजारों में आसानी से भेजा जा सकेगा। लेकिन पहले ही बड़े परीक्षण में सफलता नहीं मिलने से निर्यात योजना को झटका लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी बाजारों में भारतीय लीची की मांग बढ़ाने के लिए बेहतर संरक्षण तकनीक जरूरी है। हालांकि एक प्रयोग की असफलता के बाद भी नई तकनीकों पर शोध जारी रहेगा। आने वाले समय में शाही लीची और अन्य किस्मों पर नए परीक्षण किए जा सकते हैं, जिससे मुजफ्फरपुर की लीची को अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत स्थान मिल सके।





