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बिहार में मिलेट खेती को मिलेगा बढ़ावा, गया में 450 एकड़ में विकसित हो रहा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

Kavita2
24 Sept 2026 5:31 PM IST
बिहार में मिलेट खेती को मिलेगा बढ़ावा, गया में 450 एकड़ में विकसित हो रहा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस
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गया। कम पानी में खेती, अपेक्षाकृत कम लागत और बेहतर पोषण जैसी खूबियों के कारण मोटे अनाज यानी मिलेट किसानों के लिए नई संभावनाओं का रास्ता खोल रहे हैं। बदलते कृषि परिदृश्य और जलवायु संबंधी चुनौतियों के बीच बिहार में भी मिलेट की खेती को बढ़ावा देने की दिशा में बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है। गया जिले के टनकुप्पा प्रखंड स्थित मायापुर में करीब 450 एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जा रहा ‘बिहार सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर मिलेट्स वैल्यू चेन’ इसी पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बिहार के पहले और देश के प्रमुख मिलेट केंद्रों में शामिल इस संस्थान में अनुसंधान, प्रशिक्षण, उत्पादन, प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन को एक ही परिसर में जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से परिचित कराने के साथ मोटे अनाज की खेती को बेहतर आय और बाजार के अवसरों से जोड़ना है।

25 एकड़ में मिलेट की अलग-अलग प्रजातियां

मायापुर स्थित केंद्र के करीब 25 एकड़ क्षेत्र में फिलहाल विभिन्न प्रकार के मोटे अनाज की फसलें लगाई गई हैं। इनमें रागी, कोदो, बाजरा, कंगनी, पुटकी और सांवा जैसी फसलें शामिल हैं।

इन फसलों को अलग-अलग परिस्थितियों में उगाकर उनकी उपज, गुणवत्ता और स्थानीय जलवायु के अनुरूप अनुकूलता का अध्ययन किया जा रहा है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों के लिए कौन सी किस्में अधिक उपयोगी और लाभकारी हो सकती हैं।

परीक्षण के परिणामों के आधार पर किसानों को उपयुक्त किस्मों और खेती की तकनीकों के बारे में जानकारी दी जा सकेगी। इससे किसानों के लिए जोखिम कम करने और उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं बन सकती हैं।

कम पानी में तैयार होती हैं फसलें

मिलेट की सबसे बड़ी विशेषताओं में कम पानी की जरूरत शामिल है। धान जैसी परंपरागत फसलों की तुलना में कई मोटे अनाज अपेक्षाकृत कम सिंचाई में तैयार हो सकते हैं। ऐसे क्षेत्रों में इनकी खेती महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है, जहां पानी की उपलब्धता सीमित है।

गया और दक्षिण बिहार के कई क्षेत्रों में खेती बारिश पर निर्भर रहती है। ऐसे में कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने से किसानों को मौसम की अनिश्चितता से निपटने में मदद मिल सकती है।

मोटे अनाज की कई फसलें प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता रखती हैं। इसी कारण जलवायु परिवर्तन और अनियमित बारिश के दौर में मिलेट की खेती को भविष्य की कृषि के विकल्पों में देखा जा रहा है।

अनुसंधान से बाजार तक एक ही परिसर में व्यवस्था

सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की खासियत यह है कि यहां केवल फसल उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मिलेट की पूरी वैल्यू चेन को विकसित करने की योजना है।

इसके तहत बीज और किस्मों पर अनुसंधान से लेकर खेती की तकनीक, कटाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और मूल्यवर्धन तक की व्यवस्था विकसित की जा रही है। इसका फायदा किसानों के साथ मिलेट आधारित उत्पाद तैयार करने वाले उद्यमियों को भी मिल सकता है।

मोटे अनाज को केवल कच्चे अनाज के रूप में बेचने के बजाय उसका प्रसंस्करण कर आटा, रेडी-टू-कुक और अन्य खाद्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। मूल्यवर्धन होने से उत्पाद की बाजार कीमत बढ़ने की संभावना रहती है और इससे किसानों तथा ग्रामीण उद्यमियों के लिए आय के अतिरिक्त रास्ते खुल सकते हैं।

किसानों को दिया जाएगा प्रशिक्षण

केंद्र में किसानों को आधुनिक तकनीक से मिलेट की खेती करने का प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसमें खेत की तैयारी, उन्नत बीज का चयन, बुआई, पोषण प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, कटाई और फसल के भंडारण जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं।

प्रशिक्षण के माध्यम से किसानों को यह समझाने की कोशिश होगी कि किस क्षेत्र और मिट्टी में कौन सी फसल बेहतर परिणाम दे सकती है। इसके साथ उत्पादन लागत कम करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की तकनीक भी बताई जाएगी।

केंद्र किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच संपर्क स्थापित करने के लिए भी महत्वपूर्ण मंच बन सकता है। किसानों की समस्याओं और खेतों में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों के आधार पर अनुसंधान को आगे बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मिलेट

मोटे अनाज केवल खेती की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अलग-अलग मिलेट में फाइबर, खनिज और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसी कारण पिछले कुछ वर्षों में लोगों के बीच मोटे अनाज से तैयार खाद्य पदार्थों की मांग भी बढ़ी है।

रागी, बाजरा, कोदो और सांवा जैसे अनाज परंपरागत भारतीय खानपान का हिस्सा रहे हैं। बदलती जीवनशैली के बीच अब इन्हें दोबारा दैनिक आहार में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।

बाजार में मिलेट आधारित आटा, बिस्कुट, स्नैक्स और अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों की उपलब्धता भी बढ़ रही है। ऐसे में किसानों को उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ना जरूरी हो गया है।

किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

मायापुर में विकसित हो रहे केंद्र का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों के लिए मिलेट को आर्थिक रूप से लाभकारी फसल बनाना है। केवल उत्पादन बढ़ाने से किसानों की आय में अपेक्षित सुधार संभव नहीं है, जब तक उन्हें बेहतर बाजार और उचित कीमत न मिले।

इसी कारण केंद्र में वैल्यू चेन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। फसल उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और तैयार उत्पाद की बिक्री तक की व्यवस्था विकसित होने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

महिला स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन और छोटे उद्यमी भी मिलेट आधारित उत्पादों के निर्माण और विपणन से जुड़ सकते हैं।

बिहार में मिलेट खेती को मिल सकती है नई दिशा

गया के मायापुर में करीब 450 एकड़ में विकसित किया जा रहा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस आने वाले समय में बिहार में मोटे अनाज की खेती के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। यहां किए जा रहे परीक्षणों से स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों की पहचान करने में मदद मिलेगी।

करीब 25 एकड़ में लगाई गई रागी, कोदो, बाजरा, कंगनी, पुटकी और सांवा की फसलों के परिणाम किसानों के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं।

कम पानी, कम लागत और पोषण से जुड़ी खूबियों के कारण मिलेट की खेती किसानों के लिए परंपरागत फसलों के साथ एक अतिरिक्त विकल्प बन सकती है। अनुसंधान, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण और बाजार को एक साथ जोड़ने की मायापुर केंद्र की पहल सफल होती है तो इससे बिहार में मोटे अनाज की खेती और इससे जुड़े ग्रामीण कारोबार को नई दिशा मिलने की संभावना है।

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