बिहार

पांच माह से नहीं मिली मध्याह्न भोजन की राशि, उधार के सहारे चल रही स्कूलों की रसोई

Kavita2
30 Sept 2026 2:31 PM IST
पांच माह से नहीं मिली मध्याह्न भोजन की राशि, उधार के सहारे चल रही स्कूलों की रसोई
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दारौंदा (सिवान)। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए संचालित मध्याह्न भोजन योजना इन दिनों आर्थिक संकट से जूझ रही है। मई से सितंबर तक पिछले पांच महीनों की राशि विद्यालयों को नहीं मिलने से भोजन व्यवस्था प्रभावित होने लगी है। अब तक प्रधानाध्यापक स्थानीय दुकानदारों से उधार राशन और अन्य जरूरी सामग्री लेकर किसी तरह बच्चों के लिए भोजन तैयार करा रहे थे, लेकिन लगातार बढ़ते बकाये के कारण दुकानदारों ने भी सामान देने में असमर्थता जतानी शुरू कर दी है।

स्थिति यह है कि एक तरफ विभाग की ओर से स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी परिस्थिति में बच्चों का मध्याह्न भोजन बंद नहीं होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर विद्यालयों के पास भोजन तैयार कराने के लिए जरूरी राशि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्रधानाध्यापकों के सामने रोजाना भोजन व्यवस्था बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।

मध्याह्न भोजन योजना के तहत सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल के दिनों में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इसके लिए विद्यालयों को निर्धारित राशि दी जाती है, जिससे दाल, सब्जी, मसाले, तेल और अन्य सामग्री खरीदी जाती है। लेकिन पिछले पांच माह से राशि लंबित होने के कारण विद्यालयों पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

प्रधानाध्यापकों का कहना है कि शुरुआत में स्थानीय दुकानदारों से सहयोग मिल रहा था। परिचित दुकानदार उधार में राशन उपलब्ध करा रहे थे और भुगतान आने के बाद पैसा देने की बात तय की गई थी। लेकिन पांच महीने बीतने के बाद भी भुगतान नहीं होने से दुकानदारों का बकाया काफी बढ़ गया है।

कई दुकानदार अब पुराने बकाये का भुगतान किए बिना नया सामान देने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि लंबे समय तक उधार देने से उनकी अपनी पूंजी फंस रही है और कारोबार प्रभावित हो रहा है।

इस स्थिति का सीधा असर विद्यालयों की भोजन व्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। प्रधानाध्यापकों को हर दिन बच्चों के लिए तय मेन्यू के अनुसार खाना तैयार कराना होता है। भोजन में जरूरी सामग्री की कमी होने पर मेन्यू प्रभावित हो सकता है।

विद्यालय प्रबंधन के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे विभागीय निर्देशों का पालन कैसे करें। मध्याह्न भोजन बंद करना संभव नहीं है, लेकिन बिना राशि के नियमित रूप से सामग्री खरीदना भी मुश्किल होता जा रहा है।

कुछ विद्यालयों में शिक्षक और प्रधानाध्यापक अपने स्तर से भी व्यवस्था करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन लंबे समय तक निजी पैसे से सरकारी योजना चलाना संभव नहीं है। शिक्षकों का कहना है कि कुछ दिनों या कुछ सप्ताह तक वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन पांच महीने तक भुगतान नहीं मिलना गंभीर समस्या है।

मध्याह्न भोजन योजना बच्चों की उपस्थिति और पोषण दोनों से जुड़ी हुई है। गरीब और जरूरतमंद परिवारों के कई बच्चों के लिए स्कूल में मिलने वाला भोजन दिन के महत्वपूर्ण भोजन में शामिल होता है। ऐसे में योजना में किसी तरह की बाधा आने से बच्चों पर सीधा असर पड़ सकता है।

प्रधानाध्यापकों को चिंता है कि यदि जल्द राशि जारी नहीं हुई तो आने वाले दिनों में स्थिति और खराब हो सकती है। कई दुकानदार पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि पुराने भुगतान के बिना नया राशन देना उनके लिए संभव नहीं है।

विद्यालयों में रोजाना बड़ी मात्रा में सब्जी, दाल, तेल, मसाले और ईंधन की जरूरत पड़ती है। इन सभी का भुगतान समय पर नहीं होने से स्थानीय स्तर पर पूरी व्यवस्था उधार पर निर्भर हो गई है।

खासकर अधिक छात्र संख्या वाले विद्यालयों में खर्च भी ज्यादा होता है। ऐसे स्कूलों में पांच महीने का बकाया काफी बड़ी राशि में पहुंच सकता है। इससे प्रधानाध्यापकों और दुकानदारों दोनों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है।

विद्यालय प्रबंधन से जुड़े लोगों का कहना है कि राशि नियमित रूप से जारी की जाए तो भोजन व्यवस्था में किसी तरह की समस्या नहीं आती। लेकिन भुगतान में लंबे अंतराल के कारण पूरी योजना के संचालन में कठिनाई पैदा हो रही है।

प्रधानाध्यापकों के सामने एक और समस्या यह है कि दुकानदार लगातार पुराने भुगतान की मांग कर रहे हैं। कुछ दुकानदार रोज विद्यालय पहुंचकर बकाये की जानकारी मांग रहे हैं, जबकि प्रधानाध्यापक भी विभाग से राशि मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

विभागीय स्तर पर यह निर्देश लगातार दिया जा रहा है कि बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने में किसी प्रकार की लापरवाही न हो। लेकिन विद्यालयों का कहना है कि केवल निर्देश से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए लंबित राशि भी समय पर उपलब्ध कराना जरूरी है।

शिक्षकों का कहना है कि मध्याह्न भोजन योजना की राशि नियमित अंतराल पर जारी होनी चाहिए, ताकि विद्यालयों को उधार पर निर्भर न रहना पड़े। इससे दुकानदारों का भरोसा भी बना रहेगा और बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने में परेशानी नहीं होगी।

यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो सबसे अधिक परेशानी छोटे गांवों और दूरदराज के विद्यालयों में हो सकती है। वहां राशन और अन्य सामग्री के लिए सीमित दुकानदार उपलब्ध होते हैं। यदि एक दुकानदार उधार देना बंद कर देता है तो विकल्प तलाशना मुश्किल हो जाता है।

प्रधानाध्यापकों का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य बच्चों को निर्धारित समय पर भोजन उपलब्ध कराना है। लेकिन आर्थिक संसाधन नहीं होने से प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाना कठिन होता जा रहा है।

अभिभावकों के लिए भी यह मामला चिंता का विषय बन सकता है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को नियमित मध्याह्न भोजन मिलने की उम्मीद रहती है। यदि व्यवस्था प्रभावित होती है तो इसका असर बच्चों की स्कूल में उपस्थिति पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल विद्यालयों में उपलब्ध संसाधनों और उधार की व्यवस्था से मध्याह्न भोजन जारी रखने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि यह व्यवस्था ज्यादा दिनों तक चल पाएगी, इसे लेकर प्रधानाध्यापक आशंकित हैं।

अब सभी की नजर लंबित राशि के भुगतान पर टिकी है। विद्यालय प्रबंधन का कहना है कि यदि जल्द मई से सितंबर तक का बकाया जारी कर दिया जाए तो स्थिति सामान्य हो सकती है। अन्यथा उधार के सहारे चल रही स्कूलों की रसोई के सामने आने वाले दिनों में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

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