बिहार

कोरोना में छूटी नौकरी, गांव लौटे प्रवीण के संघर्ष में पत्नी का भरोसा बना सहारा

Kavita2
30 Sept 2026 5:45 PM IST
कोरोना में छूटी नौकरी, गांव लौटे प्रवीण के संघर्ष में पत्नी का भरोसा बना सहारा
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औरंगाबाद। कोरोना संक्रमण का दौर भले ही अब पीछे छूट चुका है, लेकिन उस समय रोजगार गंवाने वाले हजारों परिवारों की जिंदगी आज भी उस दौर की कहानी बयां करती है। हसपुरा प्रखंड के धुसरी गांव निवासी प्रवीण कुमार सिंह भी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिनकी जिंदगी कोरोना महामारी के दौरान पूरी तरह बदल गई। लुधियाना की कपड़ा फैक्ट्री में नौकरी करने वाले प्रवीण का रोजगार बंद हुआ तो परिवार के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया।

कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के समय देश के विभिन्न हिस्सों में उद्योग और कारखाने बंद हुए थे। इसका सीधा असर वहां काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों पर पड़ा। प्रवीण भी उसी दौर में अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे।

लुधियाना की कपड़ा फैक्ट्री की नौकरी ही उनके परिवार की आय का मुख्य जरिया थी। नियमित काम होने के कारण घर का खर्च किसी तरह चलता था, लेकिन नौकरी छूटने के बाद आय का स्रोत अचानक बंद हो गया।

रोजगार नहीं रहने से प्रवीण के सामने सबसे बड़ी चिंता परिवार का खर्च चलाने की थी। रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर भविष्य की जिम्मेदारियों तक सभी चीजें एक साथ चुनौती बनकर सामने खड़ी हो गईं।

कुछ समय तक परिस्थितियां सामान्य होने का इंतजार किया गया, लेकिन जब काम दोबारा मिलने की उम्मीद कमजोर होती गई तो प्रवीण ने गांव वापस लौटने का फैसला लिया।

लुधियाना से धुसरी गांव वापस आने के बाद उन्हें लगा था कि स्थानीय स्तर पर कोई न कोई काम मिल जाएगा, जिससे परिवार का खर्च चलाया जा सकेगा। लेकिन गांव पहुंचने के बाद हालात आसान नहीं थे।

प्रवीण कई दिनों तक रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटकते रहे। आसपास के क्षेत्रों में भी काम खोजा, लेकिन स्थायी रोजगार नहीं मिल सका।

कभी कोई छोटा-मोटा काम मिलता तो उससे कुछ दिन का खर्च निकल जाता, लेकिन परिवार के भविष्य के लिए एक स्थायी आय की जरूरत थी। इसी चिंता के कारण प्रवीण लगातार नए विकल्प तलाशते रहे।

इस कठिन दौर में उनकी पत्नी नगिया देवी उनके साथ मजबूती से खड़ी रहीं। जब बार-बार प्रयास के बावजूद रोजगार नहीं मिल रहा था और निराशा बढ़ने लगी थी, तब पत्नी का भरोसा उनके लिए सबसे बड़ा सहारा बना।

परिवार के सामने आर्थिक संकट था, लेकिन नगिया देवी ने प्रवीण को हिम्मत नहीं हारने दी। उनका मानना था कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मेहनत और लगातार प्रयास से कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा।

प्रवीण के लिए पत्नी का यह भरोसा बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। नौकरी छूटने के बाद व्यक्ति केवल आर्थिक समस्या से नहीं जूझता, बल्कि भविष्य को लेकर मानसिक दबाव भी बढ़ जाता है।

रोजगार का स्थायी साधन नहीं होने से प्रवीण भी चिंतित रहने लगे थे। परिवार की जिम्मेदारियां और आमदनी का अभाव उनके सामने लगातार चुनौती बना हुआ था।

ऐसे समय में पत्नी ने परिवार को संभालने के साथ-साथ उनका मनोबल भी बनाए रखा। प्रवीण को विश्वास दिलाया गया कि पुराने रोजगार के खत्म होने का अर्थ जिंदगी के अवसर खत्म होना नहीं है।

कोरोना महामारी ने लाखों प्रवासी मजदूरों और कर्मचारियों को गांव लौटने पर मजबूर किया था। बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे जो शहरों में वर्षों से काम कर रहे थे, लेकिन अचानक रोजगार बंद होने के बाद उन्हें अपने पैतृक गांव लौटना पड़ा।

प्रवीण की कहानी भी उसी दौर की एक तस्वीर पेश करती है। वर्षों तक घर से दूर रहकर परिवार के लिए कमाई करने वाला व्यक्ति अचानक बेरोजगार हो गया और फिर उसे गांव में नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी पड़ी।

गांवों में रोजगार के सीमित अवसर के कारण लौटे प्रवासियों के लिए परिस्थितियां और कठिन थीं। शहरों में जिस तरह के काम का अनुभव था, वैसा रोजगार गांव में आसानी से उपलब्ध नहीं था।

इसके बावजूद प्रवीण ने काम की तलाश जारी रखी। उनका प्रयास था कि परिवार की आय दोबारा शुरू हो और किसी तरह घर की आर्थिक स्थिति संभाली जा सके।

नगिया देवी ने भी घर की परिस्थितियों को समझते हुए खर्च में संतुलन बनाया और पति को नई शुरुआत के लिए प्रेरित किया।

पति-पत्नी के बीच आपसी भरोसा इस मुश्किल समय में परिवार की सबसे बड़ी ताकत बना। आर्थिक संसाधन कम थे, लेकिन हिम्मत बनाए रखने से हालात का सामना करना संभव हुआ।

प्रवीण के लिए यह समय जीवन की बड़ी परीक्षा जैसा था। पहले शहर में नियमित नौकरी थी और आय तय थी, लेकिन गांव लौटने के बाद हर दिन यह सवाल था कि अब आगे क्या किया जाए।

कोरोना काल की परिस्थितियों ने उन्हें यह भी समझाया कि केवल एक रोजगार पर निर्भर रहना कई बार मुश्किल पैदा कर सकता है। अचानक काम बंद होने की स्थिति में परिवार की पूरी आर्थिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

धुसरी गांव में प्रवीण के संघर्ष को स्थानीय लोग भी कोरोना काल की उन वास्तविक कहानियों से जोड़कर देखते हैं, जिनमें रोजगार छूटने के बाद लोगों ने नए सिरे से जीवन शुरू करने की कोशिश की।

इस संघर्ष में परिवार का साथ सबसे बड़ी पूंजी साबित हुआ। पत्नी नगिया देवी का भरोसा और प्रवीण की मेहनत ने मुश्किल परिस्थितियों में उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया।

महामारी का असर केवल स्वास्थ्य व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा था। इससे रोजगार, कारोबार और आम परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा।

आज संक्रमण का वह भयावह दौर समाप्त हो चुका है, लेकिन उस समय लिए गए फैसले और झेले गए संघर्ष कई परिवारों के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं।

प्रवीण कुमार सिंह का परिवार भी उन्हीं में से एक है। लुधियाना की नौकरी छूटने के बाद गांव लौटना मजबूरी थी, लेकिन नई परिस्थितियों के बीच हार न मानना उनका निर्णय था।

लंबे समय तक स्थायी रोजगार नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने प्रयास जारी रखा और परिवार ने भी उनका साथ नहीं छोड़ा।

प्रवीण की कहानी इस बात का उदाहरण है कि संकट के समय केवल आर्थिक संसाधन ही नहीं, बल्कि परिवार का भरोसा भी बेहद महत्वपूर्ण होता है।

कोरोना ने उनका पुराना रोजगार छीन लिया, लेकिन पत्नी नगिया देवी के विश्वास ने प्रवीण को मुश्किल समय में टूटने नहीं दिया। संघर्ष के इस दौर में दोनों ने मिलकर परिस्थितियों का सामना किया और नई शुरुआत की उम्मीद बनाए रखी।

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