
पटना। बिहार के चर्चित भागलपुर गोलीकांड मामले में पटना हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को पलट दिया है। करीब दो दशक पुराने इस मामले में हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी 83 वर्षीय शमशेर उर्फ समसुल मिस्त्री समेत अन्य आरोपियों को दोषी करार दिया है। अदालत ने शमशेर को हत्या के प्रयास के अपराध में सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है, जबकि अन्य आरोपी चांद आलम उर्फ मनु को पांच वर्ष की सजा दी गई है।
मामला भागलपुर जिले के जगदीशपुर थाना क्षेत्र का है, जहां वर्ष 2006 में जमीन विवाद को लेकर गोलीबारी की घटना हुई थी। इस मामले में पहले ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया था। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को गलत मानते हुए उसे रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मामले में मौजूद साक्ष्यों को सही तरीके से देखने पर आरोपियों की संलिप्तता स्पष्ट होती है। अदालत ने विशेष रूप से घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि घायल गवाह का बयान शुरुआत से लेकर अंत तक एक जैसा रहा और उसके बयान की पुष्टि चिकित्सीय साक्ष्यों से भी हुई है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 18 नवंबर 2006 को मजार की जमीन पर स्कूल निर्माण को लेकर विवाद हुआ था। इसी विवाद के दौरान चांद आलम उर्फ मनु ने घायल शम्स तबरेज को पकड़ लिया था और शमशेर उर्फ समसुल मिस्त्री को गोली चलाने के लिए कहा था। इसके बाद गोली चलने से शम्स तबरेज गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने घायल व्यक्ति की गवाही, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट को आधार बनाया। हाईकोर्ट ने इन सभी साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद माना कि आरोपियों के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित होता है।
अदालत ने कहा कि जांच में कुछ कमियां होने मात्र से किसी मामले को कमजोर नहीं माना जा सकता। अगर घायल गवाह की गवाही भरोसेमंद है और उसे चिकित्सीय साक्ष्यों का समर्थन मिलता है, तो उस पर विश्वास किया जा सकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के मूल्यांकन को गलत बताते हुए बरी के फैसले को पलट दिया।
मुख्य आरोपी शमशेर उर्फ समसुल मिस्त्री को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 यानी हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया गया। अदालत ने उसे सात वर्ष के कठोर कारावास के साथ 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। वहीं दूसरे आरोपी चांद आलम उर्फ मनु को धारा 307/149, 324/149, 147 और 148 के तहत दोषी पाया गया और उसे पांच वर्ष तक के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।
फैसला सुनाते समय हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान रखा कि मुख्य आरोपी की उम्र अब करीब 83 वर्ष है। अदालत ने बताया कि जब आरोपी का बयान दर्ज किया गया था, तब उसकी उम्र लगभग 75 वर्ष थी और मामला लंबे समय से लंबित था। हालांकि, अपराध की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सजा में राहत नहीं दी।
हाईकोर्ट ने सभी दोषियों को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। इसके बाद उन्हें दी गई सजा भुगतनी होगी।
इस फैसले के बाद पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है, वहीं यह मामला न्याय व्यवस्था में घायल गवाह और चिकित्सीय साक्ष्यों की अहमियत को भी दर्शाता है। हाईकोर्ट के इस निर्णय से यह संदेश गया है कि गंभीर अपराधों में केवल तकनीकी आधार पर आरोपी बच नहीं सकते, अगर उपलब्ध साक्ष्य अपराध को साबित करते हैं।





