बिहार

वैशाली में बाढ़ का कहर, 22 दिनों में डूबने से 19 लोगों की मौत

Kavita2
15 Sept 2026 4:13 PM IST
वैशाली में बाढ़ का कहर, 22 दिनों में डूबने से 19 लोगों की मौत
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वैशाली। जिले में गंगा नदी के बढ़े जलस्तर और बाढ़ ने जनजीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 23 अगस्त से 13 सितंबर के बीच जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों में डूबने से 19 लोगों की मौत हो चुकी है। मृतकों में 15 महीने की बच्ची और तीन साल का बच्चा भी शामिल है। लगातार सामने आ रही घटनाओं से बाढ़ प्रभावित इलाकों में भय और चिंता का माहौल बना हुआ है।

डूबने से हुई सबसे अधिक मौतें राघोपुर प्रखंड में बताई जा रही हैं। यहां की 20 पंचायतों के करीब 76 गांव बाढ़ के पानी से घिरे हुए हैं। कई गांवों का सड़क संपर्क प्रभावित होने से स्थानीय लोगों को आवागमन में भारी परेशानी हो रही है। जरूरी सामान लाने, इलाज कराने और दूसरे गांवों तक पहुंचने के लिए लोगों को बाढ़ के पानी के बीच से गुजरना पड़ रहा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रभावित क्षेत्रों में नावों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई है। मजबूरी में कई लोग निजी या छोटी नावों का सहारा ले रहे हैं। कुछ स्थानों पर ग्रामीण पानी से भरे रास्तों को पैदल पार करने की कोशिश कर रहे हैं। पानी की गहराई और तेज बहाव का सही अंदाजा नहीं होने के कारण दुर्घटना का खतरा बना हुआ है।

बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के लिए स्थिति सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण बताई जा रही है। बाढ़ के दौरान नदी, नाले, गड्ढे और खेतों के बीच का अंतर दिखाई नहीं देता। कई स्थानों पर सामान्य रास्ते भी गहरे पानी में डूब गए हैं। ऐसे में थोड़ी सी असावधानी जानलेवा साबित हो सकती है। मृतकों में मासूम बच्चों के शामिल होने से प्रभावित परिवारों के साथ पूरे क्षेत्र में शोक का माहौल है।

ग्रामीणों के मुताबिक, बाढ़ के कारण कई इलाकों में रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। सुरक्षित रास्ता उपलब्ध नहीं होने के बावजूद लोगों को भोजन, दवा और अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए घरों से बाहर निकलना पड़ रहा है। नावों की संख्या कम होने पर लोगों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है या फिर जोखिम उठाकर दूसरे साधनों का उपयोग करना पड़ता है।

स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और अंचल स्तर की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में आवश्यकता के अनुसार नाव, प्रशिक्षित गोताखोर और राज्य आपदा मोचन बल यानी एसडीआरएफ की टीमें उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि संवेदनशील स्थानों पर बचाव दल की मौजूदगी रहने से डूबने की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।

लोगों ने उन रास्तों और स्थानों की पहचान कर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है, जहां पानी का बहाव अधिक है या पहले भी डूबने की घटनाएं हो चुकी हैं। ऐसे स्थानों पर चेतावनी बोर्ड लगाने, बैरिकेडिंग करने और स्थानीय स्तर पर निगरानी दल तैनात करने की आवश्यकता बताई जा रही है। ग्रामीणों ने बच्चों को पानी के पास जाने से रोकने के लिए भी जागरूकता अभियान चलाने की मांग की है।

राघोपुर में हर साल बाढ़ की स्थिति बनने का दावा करते हुए स्थानीय लोगों ने स्थायी समाधान की मांग उठाई है। उनका कहना है कि हर वर्ष जलस्तर बढ़ने के बाद गांवों का संपर्क प्रभावित होता है और लोगों को लगभग एक जैसी परेशानियों से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद सुरक्षित आवागमन, पर्याप्त नावों और त्वरित राहत-बचाव की स्थायी व्यवस्था नहीं बन पाई है।

बाढ़ प्रभावित इलाकों में किसी व्यक्ति के डूबने के बाद उसे खोजने में समय लगने की आशंका बनी रहती है। प्रशिक्षित गोताखोरों और बचाव उपकरणों की उपलब्धता कम होने पर स्थानीय लोग खुद ही तलाश शुरू कर देते हैं। इससे उन्हें भी खतरा हो सकता है। ग्रामीण चाहते हैं कि संवेदनशील पंचायतों के पास बचाव दल को तैनात रखा जाए, ताकि सूचना मिलते ही खोज अभियान शुरू किया जा सके।

23 अगस्त से 13 सितंबर तक 22 दिनों के भीतर 19 लोगों की डूबने से मौत का आंकड़ा स्थिति की गंभीरता को दिखाता है। हालांकि, सभी घटनाओं का थाना क्षेत्रवार विवरण और मृतकों की पूरी आधिकारिक सूची सामने आना बाकी है। प्रशासन की ओर से राहत एवं बचाव व्यवस्था तथा मृतकों के परिवारों को दी जाने वाली सहायता के संबंध में भी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।

बाढ़ के बीच नावों की कमी का मुद्दा सबसे प्रमुख रूप से सामने आ रहा है। 20 पंचायतों और 76 गांवों में बड़ी आबादी प्रभावित होने के कारण केवल सीमित नावों से आवागमन की जरूरत पूरी करना मुश्किल हो सकता है। लोगों ने मांग की है कि पंचायतवार आवश्यकता का आकलन कर अतिरिक्त नावें लगाई जाएं और नावों के संचालन के लिए प्रशिक्षित नाविकों की व्यवस्था की जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि बचाव व्यवस्था के साथ स्वास्थ्य सेवाओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। पानी से घिरे गांवों में किसी व्यक्ति के बीमार होने या आपात स्थिति बनने पर उसे स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाना कठिन हो सकता है। गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों के लिए सुरक्षित परिवहन व्यवस्था आवश्यक बताई जा रही है।

बाढ़ प्रभावित इलाकों में प्रशासन की ओर से लोगों को गहरे पानी और तेज बहाव वाले क्षेत्रों से दूर रहने की सलाह दिए जाने की जरूरत है। अभिभावकों को बच्चों पर विशेष नजर रखने और उन्हें नदी, तालाब या जलमग्न रास्तों के पास अकेले नहीं जाने देने के लिए जागरूक किया जाना चाहिए। साथ ही, किसी भी हादसे की सूचना तत्काल स्थानीय प्रशासन और बचाव दल को देने की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।

लगातार हो रही मौतों के बाद प्रभावित परिवारों और ग्रामीणों की चिंता बढ़ती जा रही है। स्थानीय लोगों की मांग है कि अस्थायी राहत के साथ ऐसी दीर्घकालीन योजना बनाई जाए, जिससे हर साल आने वाली बाढ़ के दौरान सुरक्षित आवागमन और त्वरित बचाव सुनिश्चित किया जा सके। फिलहाल बाढ़ से घिरे गांवों में पर्याप्त नावों, गोताखोरों और एसडीआरएफ की तैनाती बढ़ाने की मांग तेज हो गई है।

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