
मुजफ्फरपुर। बिहार के मुजफ्फरपुर में गोशाला की जमीन पर केंद्रीय विद्यालय के निर्माण को लेकर चल रहे विवाद में पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। गोशाला की पांच एकड़ जमीन केंद्रीय विद्यालय को देने के प्रस्ताव पर पहले अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) देने और बाद में उसी निर्णय को अदालत में चुनौती देने पर हाईकोर्ट ने गोशाला समिति के सचिव कृष्ण कुमार डारोलिया को कड़ी फटकार लगाई। न्यायालय ने याचिका को अनुचित और निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही याचिकाकर्ता पर एक हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने गोशाला समिति के कामकाज और वित्तीय स्थिति का ऑडिट कराने का भी आदेश दिया। न्यायमूर्ति राजीव रॉय की अदालत ने तीन अगस्त 2026 को यह आदेश पारित किया था।
पहले एनओसी दी, फिर उसी निर्णय के खिलाफ पहुंचे कोर्ट
मुजफ्फरपुर में केंद्रीय विद्यालय की स्थापना के लिए गोशाला की जमीन उपलब्ध कराने का प्रस्ताव तैयार किया गया था।
इसके लिए 30 जून 2026 को गोशाला समिति की बैठक आयोजित की गई। बैठक में केंद्रीय विद्यालय निर्माण के लिए पांच एकड़ जमीन देने पर सहमति बनी।
इस प्रस्ताव पर समिति से जुड़े पदाधिकारियों ने हस्ताक्षर किए थे। इनमें सचिव कृष्ण कुमार डारोलिया भी शामिल थे।
हालांकि, बाद में सचिव ने जमीन देने के फैसले का विरोध करते हुए पटना हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी।
याचिका में गोशाला की जमीन केंद्रीय विद्यालय को देने से संबंधित एनओसी और राज्य सरकार की मंजूरी को रद्द करने की मांग की गई थी।
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जिस निर्णय पर सचिव ने स्वयं सहमति दी थी, उसे बाद में किस आधार पर चुनौती दी जा रही है।
14.41 एकड़ जमीन में से पांच एकड़ देने का प्रस्ताव
अदालत के आदेश के अनुसार, गोशाला समिति के पास कुल 14 एकड़ 41 डिसमिल जमीन है।
समिति की बैठक में इस भूमि में से पांच एकड़ हिस्सा केंद्रीय विद्यालय के निर्माण के लिए चिह्नित करने का निर्णय लिया गया था।
बैठक की अध्यक्षता तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी पूर्वी ने की थी, जो गोशाला समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभा रहे थे।
समिति का मानना था कि केंद्रीय विद्यालय बनने से मुजफ्फरपुर के बच्चों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
प्रस्तावित स्थान शहर से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर बताया गया है।
अदालत ने अपने आदेश में इस तथ्य का उल्लेख किया कि जमीन देने का फैसला समिति की बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया था।
आठ जुलाई को कैबिनेट ने दी थी मंजूरी
गोशाला समिति की ओर से एनओसी जारी किए जाने के बाद प्रस्ताव राज्य सरकार के समक्ष पहुंचा।
बिहार मंत्रिमंडल ने आठ जुलाई 2026 को केंद्रीय विद्यालय की स्थापना के लिए संबंधित जमीन को 30 वर्षों की लीज पर उपलब्ध कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।
इस निर्णय के बाद केंद्रीय विद्यालय संगठन के पक्ष में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जमीन उपलब्ध कराने का रास्ता खुला।
हालांकि, गोशाला सचिव कृष्ण कुमार डारोलिया ने कैबिनेट के इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी।
उन्होंने अदालत से मांग की कि जमीन हस्तांतरण और लीज से संबंधित कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
इसके अलावा उन्होंने प्रस्तावित भूमि पर निर्माण कार्य रोकने और उसकी वर्तमान स्थिति बनाए रखने की मांग भी की थी।
सचिव ने कहा- दबाव में किए थे हस्ताक्षर
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि गोशाला का मुख्य उद्देश्य बेसहारा पशुओं का संरक्षण, पालन-पोषण और उनकी देखभाल करना है।
उनका कहना था कि केंद्रीय विद्यालय के लिए पांच एकड़ भूमि देने से गोशाला में पशुओं के लिए उपलब्ध जगह कम हो जाएगी।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि एनओसी पर सचिव ने दबाव में हस्ताक्षर किए थे।
इसके आधार पर उन्होंने एनओसी को अमान्य घोषित करने की मांग की।
हालांकि, अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि सचिव स्वयं समिति के उस निर्णय में शामिल थे, जिसके खिलाफ बाद में याचिका दायर की गई।
सरकार ने अदालत में किया याचिका का विरोध
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया।
सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि गोशाला समिति ने 30 जून को सर्वसम्मति से केंद्रीय विद्यालय के लिए जमीन देने का फैसला किया था।
इस निर्णय में सचिव के हस्ताक्षर भी मौजूद थे।
सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि याचिका दाखिल करने के लिए गोशाला समिति ने सचिव को अधिकृत नहीं किया था।
ऐसी स्थिति में समिति के सामूहिक निर्णय के खिलाफ सचिव द्वारा व्यक्तिगत रूप से याचिका दाखिल करने का कोई उचित आधार नहीं है।
सरकार ने यह भी कहा कि केंद्रीय विद्यालय की स्थापना से क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा संबंधी सुविधाएं मिलेंगी।
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
न्यायमूर्ति राजीव रॉय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने पाया कि गोशाला समिति की ओर से केंद्रीय विद्यालय के लिए जमीन देने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था।
सचिव ने इस निर्णय में भाग लिया और एनओसी पर हस्ताक्षर भी किए।
इसके बावजूद उन्होंने बाद में उसी निर्णय को चुनौती दे दी।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने गोशाला समिति के उपाध्यक्ष को मामले में पक्षकार नहीं बनाया था।
इसके अलावा समिति की ओर से याचिका दाखिल करने के लिए कोई अधिकृत प्रस्ताव भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने याचिका को गलत तरीके से दाखिल किया गया मामला मानते हुए खारिज कर दिया।
गोशाला की आय और खर्च का होगा ऑडिट
इस प्रकरण में पटना हाईकोर्ट ने केवल याचिका खारिज करने तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रखी।
अदालत ने गोशाला समिति की वित्तीय स्थिति और संचालन से संबंधित जानकारी पर भी सवाल उठाए।
न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वर्तमान में गोशाला में कितने पशु हैं।
इसके अलावा गोशाला को मिलने वाली राशि और पशुओं की देखभाल पर होने वाले खर्च का विवरण भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायालय ने कहा कि इन परिस्थितियों में गोशाला समिति का ऑडिट कराया जाना आवश्यक है।
इसके लिए अनुमंडल पदाधिकारी पूर्वी, मुजफ्फरपुर को निर्देश दिया गया कि राज्य के पेशेवर ऑडिटकर्ताओं के माध्यम से एक महीने के भीतर ऑडिट कराने के कदम उठाए जाएं।
एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया
हाईकोर्ट ने गोशाला सचिव की याचिका खारिज करते हुए एक हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
अदालत ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि पटना हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति में जमा कराई जाए।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निर्धारित राशि जमा नहीं कराने की स्थिति में कानून के अनुसार वसूली की कार्रवाई की जा सकती है।
आदेश की प्रति मुजफ्फरपुर जिलाधिकारी और अनुमंडल पदाधिकारी पूर्वी को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का निर्देश भी दिया गया।
इस आदेश से स्पष्ट है कि न्यायालय ने समिति के सामूहिक निर्णय को बिना उचित अधिकार के चुनौती देने को गंभीरता से लिया।
केंद्रीय विद्यालय निर्माण का रास्ता हुआ साफ
गोशाला की जमीन को लेकर दायर याचिका खारिज होने के बाद केंद्रीय विद्यालय निर्माण के प्रस्ताव में एक महत्वपूर्ण कानूनी बाधा दूर हुई है।
हालांकि, विद्यालय का वास्तविक निर्माण कब शुरू होगा और जमीन हस्तांतरण से संबंधित शेष प्रक्रियाएं कब पूरी होंगी, इसकी अंतिम जानकारी उपलब्ध नहीं है।
केंद्रीय विद्यालय बनने से क्षेत्र के विद्यार्थियों को शिक्षा का एक नया विकल्प मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर गोशाला के संचालन और उसकी वित्तीय व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट के ऑडिट आदेश से समिति की जवाबदेही भी बढ़ गई है।
अब जिला प्रशासन को न्यायालय के निर्देशों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।





