बिहार

सब्जी की खेती में नहीं बढ़ रही किसानों की रुचि, 6 साल में सिर्फ 172 हेक्टेयर बढ़ा रकबा

Kavita2
30 Oct 2026 1:25 PM IST
सब्जी की खेती में नहीं बढ़ रही किसानों की रुचि, 6 साल में सिर्फ 172 हेक्टेयर बढ़ा रकबा
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समस्तीपुर। जिले के सभी 18 प्रखंडों में सब्जियों की खेती होने के बावजूद इसके क्षेत्रफल में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है। खेती के लिए अनुकूल मिट्टी और जलवायु उपलब्ध होने के बाद भी पिछले छह वित्तीय वर्षों में सब्जी उत्पादन का रकबा महज 172 हेक्टेयर बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2020-21 में जिले में 24 हजार 103 हेक्टेयर भूमि पर सब्जियों की खेती होती थी, जबकि वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह क्षेत्रफल बढ़कर 24 हजार 275 हेक्टेयर हो गया। इस प्रकार छह वित्तीय वर्षों की अवधि में सब्जी की खेती के रकबे में केवल 0.71 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि जिले में सब्जी उत्पादन के विस्तार की गति बेहद धीमी बनी हुई है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सब्जी की खेती में अधिक आमदनी की संभावनाएं होने के बावजूद किसानों को सिंचाई, बाजार, भंडारण और उत्पादन लागत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि जिले में रकबा नहीं बढ़ने के वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए स्थानीय स्तर पर विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।

जिले के ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में किसान पारंपरिक फसलों के साथ सब्जियों की खेती करते हैं। यहां की मिट्टी और जलवायु विभिन्न प्रकार की मौसमी सब्जियों के उत्पादन के अनुकूल बताई जाती है। इसके बावजूद सब्जी की खेती का दायरा पिछले कई वर्षों से लगभग स्थिर बना हुआ है।

उपलब्ध आंकड़ों की तुलना करने पर यह स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में सब्जी की खेती का कुल क्षेत्रफल 24,103 हेक्टेयर था। पांच वर्ष बाद 2025-26 में यह बढ़कर 24,275 हेक्टेयर पहुंचा। यानी इस अवधि में कुल 172 हेक्टेयर का विस्तार हुआ।

यदि वार्षिक औसत वृद्धि की गणना की जाए, तो पांच वर्षों के अंतराल में हर वर्ष लगभग 34.4 हेक्टेयर की शुद्ध बढ़ोतरी हुई। हालांकि यह केवल शुरुआती और अंतिम वर्ष के आंकड़ों के आधार पर निकाला गया औसत है। बीच के वर्षों में रकबा कितना बढ़ा या घटा, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।

सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में इतनी धीमी वृद्धि स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था के लिए विचारणीय विषय है। सब्जियों की खेती किसानों को अपेक्षाकृत कम समय में आय प्राप्त करने का अवसर दे सकती है। कई सब्जी फसलें ऐसी होती हैं, जिनकी कटाई और बिक्री कम अवधि में शुरू हो जाती है।

टमाटर, बैंगन, भिंडी, लौकी, करेला, फूलगोभी, पत्तागोभी और अन्य मौसमी सब्जियों की खेती किसानों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती है। हालांकि प्रत्येक फसल की सफलता स्थानीय मौसम, मिट्टी, पानी, बाजार की मांग और लागत पर निर्भर करती है।

सब्जियों की खेती का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनकी बिक्री के लिए नियमित बाजार की जरूरत होती है। अधिकांश सब्जियां जल्दी खराब होने वाली कृषि उपज हैं। यदि किसानों को समय पर परिवहन और उचित बिक्री व्यवस्था उपलब्ध नहीं हो, तो उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

कई क्षेत्रों में किसानों को सब्जियां बेचने के लिए स्थानीय मंडियों या व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। मांग कम होने या बाजार में एक साथ अधिक उपज पहुंचने पर कीमतों में गिरावट आ सकती है। ऐसी स्थिति में खेती पर हुआ खर्च निकालना भी कठिन हो सकता है।

किसानों के लिए भंडारण सुविधाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। सब्जियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए शीत भंडारण, पैकिंग, ग्रेडिंग और परिवहन जैसी सुविधाएं उपयोगी होती हैं। इनके अभाव में किसानों को फसल तैयार होते ही बेचनी पड़ सकती है।

हालांकि जिले में भंडारण सुविधाओं की कमी ही खेती का रकबा नहीं बढ़ने का कारण है, ऐसा कोई विशिष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इस संबंध में स्थानीय कृषि एवं उद्यानिकी विभाग से जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होगा।

सिंचाई की व्यवस्था भी सब्जियों की खेती के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पारंपरिक खाद्यान्न फसलों की तुलना में अनेक सब्जियों को नियमित अंतराल पर पानी की जरूरत होती है। यदि खेतों में पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं हो, तो उत्पादन और फसल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों के माध्यम से पानी के उपयोग को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। विशेष रूप से सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्रों में ऐसी तकनीकें उपयोगी हो सकती हैं। हालांकि इनके लिए किसानों को प्रारंभिक निवेश और तकनीकी मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है।

इसके अलावा सब्जियों की खेती में बीज, पौध, खाद, कीटनियंत्रण और मजदूरी जैसी लागतों पर भी ध्यान देना पड़ता है। अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और पौध तैयार करने की सुविधाएं उपलब्ध होने से किसानों को उत्पादन सुधारने में सहायता मिल सकती है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सब्जी उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल खेती का क्षेत्रफल बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन, फसलों की गुणवत्ता और बिक्री से मिलने वाली वास्तविक आय पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

संभव है कि किसी क्षेत्र में सब्जी की खेती का रकबा लगभग स्थिर रहने के बावजूद आधुनिक तकनीकों के उपयोग से उत्पादन बढ़ रहा हो। लेकिन संबंधित जिले में कुल सब्जी उत्पादन और उत्पादकता के आंकड़े उपलब्ध नहीं होने के कारण इस संबंध में कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

भारत में सब्जी उत्पादन कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में देश में ताजी सब्जियों का उत्पादन 20 करोड़ टन से अधिक दर्ज किया गया था। यह आंकड़ा सब्जी उत्पादन के राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक महत्व को दर्शाता है।

जिले में सभी 18 प्रखंडों में सब्जियों की खेती होना इस बात का संकेत है कि उत्पादन गतिविधि व्यापक रूप से मौजूद है। ऐसे में कृषि क्षेत्र के विस्तार के लिए प्रखंडवार परिस्थितियों का अध्ययन उपयोगी हो सकता है।

यह पता लगाना आवश्यक होगा कि किन प्रखंडों में सब्जियों की खेती अधिक होती है, किन क्षेत्रों में किसान इसका विस्तार करना चाहते हैं और किन स्थानों पर आवश्यक संसाधनों की कमी है।

कृषि एवं उद्यानिकी विभाग की योजनाओं के माध्यम से किसानों को आधुनिक खेती की तकनीकों, सिंचाई और पौध उत्पादन के संबंध में मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके साथ ही किसानों को बाजार की मांग के अनुरूप फसल चयन के लिए प्रशिक्षित करना भी उपयोगी होगा।

किसान उत्पादक संगठन और सामूहिक विपणन व्यवस्था भी सब्जी उत्पादकों के लिए संभावित विकल्प हो सकते हैं। सामूहिक रूप से उपज की बिक्री करने से परिवहन और विपणन संबंधी खर्चों के बेहतर प्रबंधन की संभावना रहती है।

इसके अतिरिक्त सब्जियों के प्रसंस्करण से जुड़े छोटे उद्यम भी कृषि आधारित रोजगार के अवसर विकसित कर सकते हैं। हालांकि ऐसे उद्यमों की सफलता के लिए बाजार की वास्तविक मांग, आवश्यक पूंजी और तकनीकी सुविधाओं का मूल्यांकन जरूरी है।

फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यही बताते हैं कि जिले में सब्जी की खेती का क्षेत्रफल पिछले छह वित्तीय वर्षों में एक प्रतिशत से भी कम बढ़ा है। वर्ष 2020-21 के मुकाबले वर्ष 2025-26 में केवल 172 हेक्टेयर की वृद्धि हुई है।

यह स्थिति कृषि और उद्यानिकी क्षेत्र से जुड़े विभागों के लिए ध्यान देने योग्य है। अब आवश्यकता इस बात की है कि सब्जी उत्पादन के विस्तार में आने वाली वास्तविक बाधाओं की पहचान की जाए और किसानों की आवश्यकताओं के अनुसार सहायता उपलब्ध कराई जाए।

यदि सिंचाई, तकनीकी मार्गदर्शन, बाजार संपर्क और भंडारण जैसी सुविधाओं को बेहतर बनाया जाए, तो जिले में सब्जी की खेती के विस्तार की संभावनाओं का अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकता है।

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