
मुजफ्फरपुर। बिहार में नेपाल सीमा के रास्ते भारतीय बाजारों में उच्च गुणवत्ता वाले नकली नोट पहुंचाए जाने का बड़ा मामला सामने आया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों में सक्रिय जाली नोट तस्करी नेटवर्क की जांच कर रही है। जांच में 500 रुपये की ओएसएस (OSS) सीरीज और 100 रुपये की 6एफके (6FK) सीरीज के नकली नोटों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है। आशंका जताई जा रही है कि इन जाली नोटों को नेपाल के रास्ते बिहार लाकर स्थानीय बाजारों में खपाया जा रहा है। जब्त किए गए नोटों की गुणवत्ता काफी अच्छी बताई जा रही है, जिसके चलते इनकी छपाई पाकिस्तान में होने की आशंका भी जताई गई है। हालांकि नोटों की छपाई कहां हुई, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। जांच एजेंसियों को यह भी संदेह है कि नकली मुद्रा के इस नेटवर्क का इस्तेमाल चरस की तस्करी और अवैध लेनदेन में किया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एनआईए तस्करों के नेटवर्क और जाली नोटों की आपूर्ति से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाने में लगी है।
जानकारी के अनुसार, नेपाल से सटे उत्तर बिहार के कई जिलों में नकली नोटों की खेप पहुंचने की आशंका के बाद जांच एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। खासकर मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर में संदिग्ध सीरीज के नोटों की तलाश की जा रही है। आशंका है कि तस्करों ने इन नोटों को छोटे कारोबारियों और खुदरा बाजारों के माध्यम से प्रचलन में लाने का प्रयास किया है।
इस पूरे मामले में मधुबनी की कथित नकली नोट तस्कर हीरा महासेठ उर्फ चाची का नाम सामने आया है। जांच में उसके नेटवर्क से जुड़े लोगों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है। एनआईए के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 2 अगस्त 2026 को मधुबनी जिले के बासोपट्टी थाने को सूचना मिली थी कि भरत महासेठ, हीरा महासेठ उर्फ चाची और शिव कुमार राउत उर्फ मेहमान नेपाल से नकली भारतीय मुद्रा लाने, उसका भंडारण करने और उसे बाजार में चलाने में कथित रूप से शामिल थे।
इस सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए सशस्त्र सीमा बल और बिहार एसटीएफ ने भरत महासेठ तथा शिव कुमार उर्फ मेहमान को गिरफ्तार किया था। दोनों से पूछताछ और बरामद सामग्री के आधार पर नकली नोटों के एक बड़े नेटवर्क की जानकारी सामने आने का दावा किया गया है। बाद में मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई।
कार्रवाई के दौरान गिरफ्तार आरोपियों के पास से 500 रुपये की ओएसएस सीरीज के 57 नकली नोट बरामद किए गए थे। इनका कुल अंकित मूल्य 28,500 रुपये था। इसके अलावा 100 रुपये की 6एफके सीरीज के 110 जाली नोट भी जब्त किए गए, जिनका अंकित मूल्य 11 हजार रुपये था। इस तरह दोनों सीरीज के कुल 167 नकली नोट बरामद हुए, जिनका कुल अंकित मूल्य 39,500 रुपये था।
जांच में सामने आया कि जब्त नकली नोट सामान्य जाली नोटों की तुलना में बेहतर गुणवत्ता के थे। इनके कागज, छपाई और डिजाइन में असली मुद्रा से काफी समानता होने की बात कही गई है। इसी कारण इन्हें सामान्य लेनदेन के दौरान पहचानना मुश्किल हो सकता है। हालांकि जांच एजेंसियां इन नोटों की वास्तविक छपाई तकनीक और स्रोत का पता लगाने में जुटी हैं।
एनआईए को आशंका है कि बरामद किए गए नोटों के अलावा इसी तरह की अन्य नकली मुद्रा पहले ही बिहार के बाजारों में पहुंचाई जा चुकी है। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इन नोटों का वितरण किन लोगों के माध्यम से हुआ और किन क्षेत्रों में इनका इस्तेमाल किया गया।
नकली नोटों का यह मामला केवल आर्थिक अपराध तक सीमित नहीं माना जा रहा है। जांच से जुड़े विवरणों के अनुसार, जाली मुद्रा के कारोबार में शामिल कुछ तस्करों का संबंध चरस की अवैध तस्करी से भी होने की आशंका है। नेपाल से भारत में चरस की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क और नकली नोटों के कारोबार के बीच संभावित संबंधों की जांच की जा रही है।
बताया जा रहा है कि हीरा महासेठ उर्फ चाची से जुड़े कथित नेटवर्क पर नकली मुद्रा के साथ मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल होने का भी संदेह है। जांच एजेंसियां यह जानने का प्रयास कर रही हैं कि क्या जाली नोटों का उपयोग चरस खरीदने या इसके अवैध व्यापार से संबंधित भुगतान में किया गया था। इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
इस मामले में एनआईए ने 15 सितंबर को मधुबनी में संबंधित नेटवर्क के खिलाफ छापेमारी भी की थी। इस दौरान जांच एजेंसी ने जाली नोटों की तस्करी से जुड़े संभावित साक्ष्य जुटाने का प्रयास किया। एजेंसी को संदेह है कि नेटवर्क केवल बिहार तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि अन्य राज्यों में भी उसके संपर्क हो सकते हैं।
नेपाल के साथ बिहार की लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों के सामने तस्करी रोकने की चुनौती बनी रहती है। सीमा के दोनों ओर व्यापारिक गतिविधियां और लोगों की आवाजाही होती है। ऐसे में अवैध मुद्रा और प्रतिबंधित पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए लगातार निगरानी की आवश्यकता होती है।
जाली नोटों के मामलों में सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि नकली मुद्रा सामान्य आर्थिक गतिविधियों में शामिल हो सकती है। छोटे दुकानदार, सब्जी विक्रेता, पेट्रोल पंप संचालक और अन्य कारोबारी नकद लेनदेन करते समय अनजाने में नकली नोट स्वीकार कर सकते हैं। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नकली मुद्रा की पहचान के लिए केवल नोट की सीरीज देखना पर्याप्त नहीं होता। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सुरक्षा विशेषताओं, जैसे वॉटरमार्क, सुरक्षा धागा, उभरी हुई छपाई और अन्य पहचान चिह्नों की जांच भी जरूरी होती है। एक ही सीरीज के असली नोट भी प्रचलन में हो सकते हैं। इसलिए केवल ओएसएस या 6एफके सीरीज होने के आधार पर किसी नोट को नकली नहीं कहा जा सकता।
इस मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर लोगों से संदिग्ध नोट मिलने पर संबंधित बैंक या नजदीकी पुलिस थाने को सूचना देने की अपील की गई है। नागरिकों को भी नकद लेनदेन के दौरान सतर्क रहने और किसी संदिग्ध नोट को आगे चलाने के बजाय उसकी जांच कराने की सलाह दी जा रही है।
जाली मुद्रा की तस्करी को रोकने के लिए बिहार पुलिस, एसटीएफ, सशस्त्र सीमा बल और केंद्रीय जांच एजेंसियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे पहले भी बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में नकली नोटों की कई खेप पकड़ी जा चुकी हैं। इन मामलों ने स्पष्ट किया है कि अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की जांच करना आवश्यक है।
फिलहाल एनआईए की जांच का मुख्य उद्देश्य नकली नोटों के स्रोत, तस्करी के रास्तों और वितरण नेटवर्क की पूरी जानकारी जुटाना है। इसके साथ ही यह पता लगाया जा रहा है कि नकली मुद्रा के कारोबार से मादक पदार्थों की तस्करी के लिए धन उपलब्ध कराया जा रहा था या नहीं।
जांच में आगे होने वाले खुलासों से इस नेटवर्क की वास्तविक पहुंच और इसमें शामिल लोगों की भूमिका स्पष्ट हो सकेगी। पाकिस्तान में नोटों की छपाई और चरस कारोबार से उनके संबंध के बारे में अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों के ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएगा।





