बिहार

भ्रष्टाचारः बिहार में सोने-चांदी में खेल रहे हैं जीरो टॉलरेंस वाले अफसर, बालू और शराब बना अवैध कमाई का बड़ा जरिया

Renuka Sahu
30 Dec 2021 5:52 AM GMT
भ्रष्टाचारः बिहार में सोने-चांदी में खेल रहे हैं जीरो टॉलरेंस वाले अफसर,  बालू और शराब बना अवैध कमाई का बड़ा जरिया
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फाइल फोटो 

भारत में भ्रष्टाचार कितना कम हुआ, इसका पता बिहार में अफसरों के घरों पर पड़ते छापों से लगता है।

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। भारत में भ्रष्टाचार कितना कम हुआ, इसका पता बिहार में अफसरों के घरों पर पड़ते छापों से लगता है। सोने-चांदी की ईंटें, नकदी और प्रॉपर्टी कागजात के ढेर इसकी तस्वीर दिखाते हैं। बिहार में भ्रष्टाचार के प्रति नीतीश सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के बावजूद बहुत से क्लर्कों से लेकर आईपीएस अफसरों तक ने अपनी आय से कई गुणा अधिक संपत्ति अर्जित की है।

सरकारी एजेंसियों द्वारा की जा रही ताबड़तोड़ कार्रवाई में भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी अधिकारियों के पास अकूत संपत्ति का पता चल रहा है। किसी के घर से सोने-चांदी की ईंटें मिल रही हैं तो कहीं से करोड़ों की नकदी। मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर (एमवीआई) से लेकर डिस्ट्रिक्ट ट्रांसपोर्ट ऑफिसर (डीटीओ) तक, सर्किल आफिसर (सीओ) से लेकर कार्यपालक अभियंता (एक्जीक्यूटिव इंजीनियर) तक, सिपाही से लेकर पुलिस अधीक्षक (एसपी) तक तथा सब रजिस्ट्रार से लेकर वाइस चांसलर (कुलपति) तक, हर स्तर के अधिकारी और कर्मचारी कार्रवाई की जद में आए हैं। सिर्फ दिसंबर माह में की गई कार्रवाई में भ्रष्टाचारियों के कब्जे से चार करोड़ रुपये से अधिक की केवल नकदी बरामद की गई है।
रिश्वतखोरी में और खराब हुई बिहार की रैंकिंग
राज्य सरकार की तीन एजेंसियां, आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू), स्पेशल विजिलेंस यूनिट (एसवीयू) तथा निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (विजिलेंस) विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं या शिकायतों के आधार पर भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है। छापेमारी में बरामद सामान तथा निवेश का पता चलने पर एकबारगी यह अनुमान करना कठिन हो जाता है कि आखिर किस हद तक ये भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इन एजेंसियों ने बीते छह माह में करीब 30 अफसरों के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी कर 600 करोड़ से अधिक की काली कमाई को पकड़ा है।
छापेमारी में करोड़ों की संपत्ति उजागर
1999 में नौकरी में आए हाजीपुर के श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी दीपक कुमार शर्मा के पटना, हाजीपुर व मोतिहारी में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (विजिलेंस) ने बीते 11 दिसंबर को छापेमारी की। ब्यूरो के मुताबिक इस छापेमारी में एक करोड़ 76 लाख रुपये नकद बरामद किए गए। ये रुपये तीन सूटकेस तथा एक ट्रॉली बैग में ठूंस-ठूंस कर रखे गए थे। इसके साथ ही टीम को 47 लाख रुपये के सोने-चांदी के आभूषणों के अलावा जमीन में निवेश किए गए सात करोड़ रुपये के कागजात भी मिले। दीपक कुमार शर्मा 22 साल से नौकरी में हैं। 17 दिसंबर को स्पेशल विजिलेंस यूनिट (एसवीयू) ने समस्तीपुर के सब रजिस्ट्रार मणि रंजन के पटना, मुजफ्फरपुर व समस्तीपुर स्थित ठिकानों पर छापे मारे।
आरोप है कि इन छापों में 60 लाख नकद व लाखों के आभूषण बरामद हुए। इसके अतिरिक्त करोड़ों की जमीन, रियल इस्टेट में निवेश व कई बैंकों के पासबुक व फिक्स्ड डिपॉजिट के कागजात भी मिले। एसवीयू को इनके द्वारा मुजफ्फरपुर में करोड़ों की लागत से 21 कमरों का होटल बनवाने का भी पता चला। अधिकारियों के मुताबिक मणि रंजन सालाना पांच लाख रुपये एलआईसी का प्रीमियम भी भरते थे। कुल मिलाकर इनके पास आय से 165 फीसदी अधिक की संपत्ति होने का अनुमान है।
किलो के हिसाब से चांदी-सोना
इसी तरह पटना जिले के मसौढ़ी में ग्रामीण कार्य विभाग के कार्यपालक अभियंता के पद पर तैनात अजय कुमार सिंह के ठिकानों पर विजिलेंस ने छापेमारी की तो पटना के इंद्रपुरी इलाके में स्थित उनके घर से तलाशी के दौरान 95 लाख रुपये कैश मिले। अधिकारियों के मुताबिक एक किलो 295 ग्राम स्वर्णाभूषण तथा 12 किलो चांदी के जेवर व बर्तन बरामद किए गए। इसमें चांदी की तीन ईंटे भी शामिल हैं। बरामद सोने चांदी की कीमत 66 लाख से अधिक आंकी गई है। विजिलेंस की टीम को नोटों की गिनती के लिए बाहर से मशीन मंगानी पड़ी।
वहीं मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) जिले के एक्साइज इंस्पेक्टर (उत्पाद अधीक्षक) अविनाश प्रकाश के ठिकानों पर छापा मारा तो पत्नी के नाम से तीन फ्लैट व पिता के नाम से 20 प्लॉट के अलावा कई जगह निवेश, इंश्योरेंस व बैंकों के पासबुक मिले। इनके यहां से नोट गिनने की मशीन बरामद की गई। बिहार में संभवत: पहली बार ऐसा हुआ कि कार्रवाई के दौरान किसी लोक सेवक के घर से नोट गिनने की मशीन बरामद की गई है। अविनाश के सहयोगी रहे एक व्यक्ति ने बताया कि भ्रष्टाचार को लेकर विभाग में यह कहा जाता था कि ''क्यों अविनाश बन रहे हो''।
रोहतास के जिला भू अर्जन पदाधिकारी राजेश कुमार गुप्ता के यहां तलाशी में विजिलेंस को 29 लाख कैश व 19 करोड़ के जेवर मिले। इसके साथ ही छह फ्लैट व रांची तथा पूर्णिया में जमीन का भी पता चला। ये चंद उदाहरण तो महज बानगी भर हैं। कार्रवाई की लिस्ट तो काफी लंबी है।
अवैध कमाई का बड़ा जरिया बालू और शराब
बिहार में अफसर-राजनेता व माफियाओं के गठजोड़ से बालू का अवैध खनन निर्बाध रूप से जारी है। अवैध खनन की लगातार मिल रही सूचनाओं के आधार पर बीते मई माह में ही आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) को सरकार ने उन लोक सेवकों का पता लगाने का टास्क दिया जिनकी बालू माफिया से साठगांठ थी। पता चलते ही ऐसे 41 प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। इन्हें निलंबित कर दिया गया। इसके साथ ही ईओयू को दोषी पाए गए अधिकारियों द्वारा अर्जित संपत्तियों की जांच का आदेश दिया गया। इसके बाद इन अफसरों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर एक के बाद एक करके छापेमारी का सिलसिला शुरू हो गया।
बालू के खेल में इस साल 13 अगस्त से 21 दिसंबर तक 12 अधिकारियों के ठिकानों पर छापेमारी की गई। इनमें भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी व भोजपुर के एसपी रहे राकेश कुमार दुबे एवं औरंगाबाद के एसपी रहे सुधीर कुमार पोरिका (आईपीएस) भी शामिल हैं। दुबे के पास आय से 90 प्रतिशत अधिक संपत्ति मिली है। इसके अलावा इन अधिकारियों में खान व भूतत्व विभाग के सहायक निदेशक संजय कुमार, औरंगाबाद के पूर्व डीटीओ व दरभंगा के अपर समाहर्ता अनिल कुमार सिन्हा समेत चार एसडीपीओ व दो एमवीआई हैं। राज्य के खनन मंत्री के आप्त सचिव रहे मृत्युंजय कुमार के यहां एसवीयू की छापेमारी में 30 लाख की नकदी तथा 60 लाख के आभूषण एवं सोने के 40 बिस्कुट बरामद किए गए।
शराबबंदी के बाद जारी है तस्करी का धंधा
इसी तरह राज्य में शराबबंदी लागू होने के बावजूद शराब की तस्करी का धंधा धड़ल्ले से आज भी जारी है। इन धंधों से कमाई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब बीते एक दिसंबर को वैशाली जिले के लालगंज थाना प्रभारी घनश्याम शुक्ला के ठिकानों पर छापेमारी की गई तो उनके पास आय से 98 फीसद अधिक संपत्ति होने का पता चला। इतना ही नहीं सिपाही रहे बिहार पुलिस मेंस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र कुमार धीरज के ठिकाने पर ईओयू ने छापेमारी की तो उनके पास आय से 544 प्रतिशत अधिक की संपत्ति होने का पता चला।
आखिर भ्रष्टाचार पर कैसे लगेगी रोक?
जानकार बताते हैं कि जब तक नेता-अफसरों के गठजोड़ की वजह से ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसे व पैरवी का खेल समाप्त नहीं होगा, तब तक लोकसेवकों के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। पत्रकार सुधीर कुमार मिश्रा कहते हैं, "'जब कोई अफसर एक निश्चित रकम देकर पोस्टिंग पाता है तो तय है कि वह उससे ज्यादा कमाने का टारगेट रखेगा और इस टारगेट को तो वह भ्रष्टाचार से ही प्राप्त करना चाहेगा। दारोगा, बीडीओ-सीओ, एमवीआई व डीटीओ जैसे मलाईदार पद तो इस राज्य में जैसे काली कमाई के लिए ही सृजित किए गए हैं।''
सामाजिक कार्यकर्ता राजेश चौधरी कहते हैं, "'आप स्थिति को ऐसे समझिए, जब भोजपुर में राजस्व कर्मचारी 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते पकड़ा गया तो उसने तुरंत ही विजिलेंस की टीम से साफ-साफ कहा कि इसमें सीओ साहब समेत सभी का हिस्सा है। अब आप भ्रष्टाचार की चेन को समझ सकते हैं।''
ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचारी पकड़े नहीं जाते हैं किंतु इतना तो सच है कि सजा कम को ही मिल पाती है। इस मुद्दे पर ईओयू व एसवीयू के अपर पुलिस महानिदेशक नैयर हसनैन खान कहते हैं, ''आय से अधिक संपत्ति (डीए) वाले मामले में सजा मिलने की दर कम है। ऐसा केस के लंबा खिंच जाने के कारण होता है। कोशिश की जा रही है कि समय सीमा के अंदर चार्जशीट हो जाए तथा तेजी से ट्रायल हो सके। कोर्ट में हम पूरे साक्ष्यों के साथ जाएंगे ताकि हर हाल में दोषियों को सजा मिले।''
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