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रामदेव की किताब पर विवाद खत्म? हाईकोर्ट ने आपराधिक केस किया खारिज

nidhi
4 Nov 2026 9:23 AM IST
रामदेव की किताब पर विवाद खत्म? हाईकोर्ट ने आपराधिक केस किया खारिज
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स्वामी रामदेव की किताब पर बड़ा फैसला
पटना: योग गुरु स्वामी रामदेव के जीवन पर आधारित चर्चित किताब को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पुस्तक 'गॉडमैन टू टायकून: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ स्वामी रामदेव' के प्रकाशक जुगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का अनुयायी होने मात्र से कोई अन्य व्यक्ति उसकी कथित मानहानि के मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का कानूनी अधिकारी नहीं बन जाता। अदालत ने इस मामले में शिकायतकर्ता की कानूनी पात्रता और धार्मिक भावनाएं आहत होने के आरोपों की भी समीक्षा की।
पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने 3 नवंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने हाजीपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-द्वितीय द्वारा 7 अक्टूबर और 9 अक्टूबर 2017 को पारित आदेशों को रद्द कर दिया। इन आदेशों के आधार पर प्रकाशक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए, 500, 501 और 502 के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई थी। यह पूरा मामला वर्ष 2017 से जुड़ा हुआ है। वैशाली जिले के हाजीपुर निवासी अमित कुमार ने स्वामी रामदेव पर लिखी पुस्तक को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने खुद को स्वामी रामदेव का अनुयायी बताते हुए आरोप लगाया था कि पुस्तक में कई ऐसी बातें लिखी गई हैं, जिनसे योग गुरु की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है और उनके अनुयायियों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने 1 सितंबर 2017 को बाजार में स्वामी रामदेव की तस्वीर वाली यह किताब देखी थी। उन्होंने पुस्तक खरीदी और घर जाकर पढ़ना शुरू किया। कुछ पन्ने पढ़ने के बाद उन्हें लगा कि किताब में स्वामी रामदेव के जीवन से जुड़े कुछ घटनाक्रमों को आपत्तिजनक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पुस्तक में गुरु शंकरानंद, स्वामी योगानंद और राजीव दीक्षित की मृत्यु से संबंधित घटनाओं का उल्लेख ऐसे तरीके से किया गया है, जिससे स्वामी रामदेव की छवि प्रभावित होती है। इसके अलावा उनके पारिवारिक और सामाजिक जीवन तथा गेरुआ वस्त्र धारण करने से संबंधित कुछ विवरणों पर भी आपत्ति जताई गई थी।
शिकायत के आधार पर हाजीपुर की निचली अदालत ने अक्टूबर 2017 में प्रकाशक के खिलाफ विभिन्न धाराओं में संज्ञान लिया था। इसके बाद प्रकाशन कंपनी ने वर्ष 2018 में पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की। प्रकाशक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष गिरी ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ता स्वयं कथित मानहानि से प्रभावित व्यक्ति नहीं है। उनका कहना था कि पुस्तक में यदि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री होने का आरोप है, तो संबंधित व्यक्ति को ही कानून के अनुसार शिकायत करने का अधिकार है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 199(1) के तहत आपराधिक मानहानि के मामले में शिकायत करने का अधिकार सामान्यतः उसी व्यक्ति को है, जिसकी मानहानि होने का आरोप लगाया गया है। किसी व्यक्ति के अनुयायी या समर्थक होने के आधार पर यह अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता अमित कुमार ने स्वयं अपने खिलाफ किसी मानहानिकारक टिप्पणी का आरोप नहीं लगाया था। शिकायत में मुख्य रूप से स्वामी रामदेव की कथित मानहानि का उल्लेख था।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्ति के प्रति श्रद्धा रखने से उसके अनुयायियों को व्यक्तिगत रूप से मानहानि का मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं मिल जाता। इसके लिए कानून में निर्धारित आवश्यक शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
अदालत ने धार्मिक भावनाएं आहत होने से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए के इस्तेमाल पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने पाया कि इस धारा के तहत आपराधिक मामला चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196(1)(ए) के अनुसार केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक थी। इस मामले में ऐसी पूर्व अनुमति प्राप्त किए जाने का कोई रिकॉर्ड सामने नहीं आया। अदालत ने कहा कि आवश्यक सरकारी मंजूरी के अभाव में निचली अदालत द्वारा संबंधित अपराध का संज्ञान लेना कानून के अनुरूप नहीं था।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पुस्तक में लिखी बातों से धार्मिक भावनाएं आहत होने का सामान्य आरोप लगाना धारा 295-ए के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने की जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मंशा जैसी कानूनी शर्तों का पूरा होना आवश्यक है।
अदालत के अनुसार, शिकायत में किसी विशिष्ट धार्मिक मान्यता के अपमान और आवश्यक दुर्भावनापूर्ण मंशा को पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं किया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया के अन्य पहलुओं पर भी विचार किया। प्रकाशक ने यह दलील भी दी थी कि कंपनी निचली अदालत के क्षेत्राधिकार से बाहर स्थित थी और समन जारी करने से पहले आवश्यक जांच प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने इस आधार पर कार्यवाही को पूरी तरह अवैध मानने की दलील स्वीकार नहीं की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जांच की प्रक्रिया अपनाए जाने से शिकायतकर्ता की कानूनी पात्रता और सरकारी अनुमति जैसी अनिवार्य शर्तों की कमी दूर नहीं हो सकती। न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी आपराधिक मामले को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक वैधानिक शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो ऐसी कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।
इसी आधार पर अदालत ने जुगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका स्वीकार करते हुए वर्ष 2017 में पारित दोनों आदेश और उनसे उत्पन्न प्रकाशक के खिलाफ समस्त संबंधित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। यह निर्णय विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत ने आपराधिक मानहानि और धार्मिक भावनाएं आहत होने के मामलों में कानूनी पात्रता तथा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
स्वामी रामदेव पर आधारित इस पुस्तक को लेकर पहले भी कानूनी विवाद सामने आ चुके हैं। पुस्तक में योग गुरु के जीवन, सामाजिक गतिविधियों और कारोबारी सफर से जुड़े विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है। फिलहाल पटना हाईकोर्ट के ताजा आदेश से प्रकाशक को इस विशेष आपराधिक मामले में राहत मिली है। हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि पुस्तक की प्रत्येक सामग्री को अदालत ने तथ्यात्मक रूप से सही घोषित कर दिया है। न्यायालय का निर्णय मुख्य रूप से शिकायत की वैधानिक पात्रता और आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की आवश्यक कानूनी शर्तों पर आधारित है।
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