बिहार

इलाज की राह में थमी सांस छात्र की मौत पर उठे सवाल

Ratna Netam
14 Sept 2026 7:44 PM IST
इलाज की राह में थमी सांस छात्र की मौत पर उठे सवाल
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जमुई। बिहार के जमुई में एक छात्र की मौत के बाद स्वास्थ्य और एंबुलेंस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि गंभीर हालत में छात्र को समय पर ऑक्सीजन नहीं मिल सकी और एंबुलेंस से अस्पताल ले जाने के दौरान उसकी स्थिति बिगड़ती चली गई। बाद में छात्र की मौत हो गई। घटना के बाद परिजनों ने एंबुलेंस कर्मियों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए नाराजगी जताई है। हालांकि छात्र की मौत वास्तव में ऑक्सीजन की कमी से हुई या इसके पीछे कोई अन्य चिकित्सकीय कारण था, इसकी पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट और आधिकारिक जांच से ही हो सकेगी।
छात्र की मौत से परिवार में मातम पसरा हुआ है। परिजनों का आरोप है कि मरीज की हालत गंभीर होने के बावजूद एंबुलेंस में आवश्यक चिकित्सा सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई। उनका कहना है कि अगर छात्र को जरूरत के समय ऑक्सीजन मिल जाती और उसे उचित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाती तो शायद उसकी जान बचाई जा सकती थी।
घटना सामने आने के बाद एंबुलेंस सेवा की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। गंभीर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस केवल परिवहन का साधन नहीं होती, बल्कि उसमें मरीज की स्थिति के अनुसार जरूरी जीवनरक्षक उपकरण और प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होती है।
परिजनों के आरोपों के अनुसार छात्र को सांस लेने में परेशानी या गंभीर स्वास्थ्य समस्या के कारण ऑक्सीजन की जरूरत थी। उसे अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की गई, लेकिन यात्रा के दौरान आवश्यक ऑक्सीजन सहायता नहीं मिलने का आरोप लगाया गया है। इसी दौरान उसकी हालत और बिगड़ गई।
मरीज की मौत के बाद परिजनों का गुस्सा एंबुलेंस व्यवस्था पर फूट पड़ा। उन्होंने संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। परिजनों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवा में ऐसी लापरवाही किसी भी मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
हालांकि इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल छात्र की मौत के वास्तविक कारण का है। किसी मरीज की मृत्यु के पीछे कई चिकित्सकीय कारण हो सकते हैं। इसलिए केवल घटनाक्रम के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मौत ऑक्सीजन नहीं मिलने के कारण ही हुई। डॉक्टरों की रिपोर्ट, मरीज के इलाज का रिकॉर्ड और आवश्यक होने पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट से वास्तविक कारण स्पष्ट हो सकता है।
इसी तरह एंबुलेंस कर्मियों की लापरवाही का आरोप भी जांच का विषय है। यह देखना होगा कि एंबुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर मौजूद था या नहीं। अगर सिलेंडर था तो उसमें पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध थी या नहीं। उपकरण काम कर रहा था या नहीं और मरीज को ऑक्सीजन देने की आवश्यकता के बारे में कर्मचारियों को क्या निर्देश मिले थे—इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी होगी।
मामले की निष्पक्ष जांच में एंबुलेंस के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। किस समय एंबुलेंस के लिए कॉल किया गया, वाहन कितने समय में मरीज तक पहुंचा और अस्पताल तक पहुंचने में कितना समय लगा, इन जानकारियों से घटनाक्रम की स्पष्ट टाइमलाइन तैयार की जा सकती है।
इसके अलावा एंबुलेंस में मौजूद कर्मचारियों के बयान भी महत्वपूर्ण होंगे। उनसे यह पूछा जा सकता है कि मरीज को जब वाहन में लाया गया तब उसकी हालत कैसी थी और रास्ते में क्या चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई गई। अगर ऑक्सीजन नहीं दी गई तो इसके पीछे क्या वजह थी, यह भी जांच का प्रमुख सवाल होगा।
अस्पताल के डॉक्टरों का बयान इस मामले में निर्णायक हो सकता है। छात्र को अस्पताल पहुंचाए जाने के समय उसकी स्थिति क्या थी और डॉक्टरों ने उसे बचाने के लिए क्या प्रयास किए, मेडिकल रिकॉर्ड से इसकी जानकारी मिल सकती है।
यह घटना आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारियों पर व्यापक सवाल भी खड़े करती है। एंबुलेंस में ऑक्सीजन जैसी बुनियादी जीवनरक्षक सुविधा की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है। खासकर सांस लेने में परेशानी, गंभीर चोट या दूसरी आपात परिस्थितियों में मरीज को अस्पताल पहुंचने तक स्थिर रखने के लिए आवश्यक उपकरणों की जरूरत पड़ सकती है।
सिर्फ उपकरण उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित रखरखाव और समय-समय पर जांच भी जरूरी है। ऑक्सीजन सिलेंडर वाहन में मौजूद हो लेकिन खाली हो या उसका रेगुलेटर काम न कर रहा हो तो आपात स्थिति में वह उपयोगी नहीं रहेगा।
इसी तरह एंबुलेंस कर्मियों को उपकरणों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण होना भी आवश्यक है। आपात स्थिति में कुछ मिनट की देरी भी मरीज की स्थिति को गंभीर बना सकती है। इसलिए एंबुलेंस सेवा में तैनात कर्मचारियों को मरीज की स्थिति पहचानने और तय प्रोटोकॉल के अनुसार मदद देने के लिए प्रशिक्षित होना जरूरी है।
छात्र की मौत के बाद अगर विभागीय जांच होती है तो उसमें एंबुलेंस की तकनीकी स्थिति की जांच भी महत्वपूर्ण होगी। वाहन में उपलब्ध ऑक्सीजन सिलेंडर, मास्क, रेगुलेटर और दूसरे आवश्यक उपकरणों की स्थिति देखी जा सकती है।
जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित एंबुलेंस का नियमित निरीक्षण कब किया गया था। क्या उसके उपकरणों की जांच का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध है और ड्यूटी शुरू होने से पहले कर्मचारियों ने जरूरी संसाधनों की उपलब्धता की पुष्टि की थी या नहीं।
अगर जांच में किसी स्तर पर लापरवाही साबित होती है तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा। वहीं यदि मेडिकल रिपोर्ट से पता चलता है कि छात्र की हालत पहले से अत्यंत गंभीर थी और मौत किसी अन्य चिकित्सकीय कारण से हुई तो उस तथ्य को भी स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना चाहिए।
स्वास्थ्य सेवा से जुड़े मामलों में शुरुआती आरोप और मेडिकल निष्कर्ष अलग-अलग हो सकते हैं। इसी कारण किसी कर्मचारी या संस्था को जांच पूरी होने से पहले मौत के लिए निश्चित रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
इस घटना ने सरकारी और निजी दोनों तरह की एंबुलेंस सेवाओं में न्यूनतम सुरक्षा मानकों की अहमियत को फिर सामने रखा है। मरीज और उसके परिवार को यह भरोसा होना चाहिए कि आपात स्थिति में बुलाया गया वाहन जरूरी उपकरणों के साथ पहुंचेगा।
ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में एंबुलेंस सेवाओं का महत्व और बढ़ जाता है। कई बार बड़े अस्पताल तक पहुंचने में काफी समय लगता है। ऐसे में रास्ते में मरीज को मिलने वाली प्राथमिक चिकित्सा और जीवनरक्षक सहायता उसकी स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।
जमुई की इस घटना में छात्र की मौत ने परिवार को गहरा सदमा दिया है। परिजनों का आरोप है कि समय पर ऑक्सीजन मिलने पर उसकी जान बच सकती थी। उनकी मांग है कि पूरे मामले की जांच कर यह पता लगाया जाए कि आखिर चूक किस स्तर पर हुई।
अब स्वास्थ्य विभाग या संबंधित प्रशासन की जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए कि एंबुलेंस में ऑक्सीजन उपलब्ध थी या नहीं और कर्मचारियों ने निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन किया था या नहीं। साथ ही छात्र के मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर उसकी मौत का वास्तविक कारण सामने आना जरूरी है।
इस मामले का उद्देश्य केवल किसी एक कर्मचारी की जिम्मेदारी तय करना नहीं होना चाहिए। अगर एंबुलेंस सेवा की व्यवस्था में कोई तकनीकी या प्रशासनिक कमी सामने आती है तो उसे दूर करना भी उतना ही जरूरी होगा, ताकि भविष्य में किसी दूसरे मरीज के साथ ऐसी स्थिति पैदा न हो।
फिलहाल छात्र की मौत और परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों ने जमुई की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला दिया है। जांच के बाद ही साफ होगा कि छात्र को ऑक्सीजन क्यों नहीं मिल सकी, एंबुलेंस कर्मियों के स्तर पर कोई लापरवाही हुई या नहीं और मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था। परिवार अब जवाब के साथ जिम्मेदारी तय होने का इंतजार कर रहा है।
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