
पटना : बिहार की चर्चित बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उम्मीदवार बदलकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। पार्टी ने पहले पूरे जोर-शोर के साथ अभिषेक बंटी का नामांकन कराया, लेकिन महज 24 घंटे के भीतर उन्हें चुनावी मैदान से हटा दिया। उनकी जगह भाजपा ने लंबे समय से संगठन से जुड़े कार्यकर्ता नीरज सिन्हा को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है और विपक्षी दल भाजपा पर लगातार हमलावर हैं।
बांकीपुर सीट भाजपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री रहे नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी, जिसके कारण यहां उपचुनाव कराया जा रहा है। इस सीट पर भाजपा की रणनीति को लेकर पहले से ही राजनीतिक दलों की नजर थी, लेकिन उम्मीदवार बदलने के फैसले ने चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
भाजपा ने शुरुआत में अभिषेक बंटी को उम्मीदवार बनाकर उनका नामांकन भी कराया था। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता नामांकन के दौरान मौजूद रहे थे। इससे यह संदेश गया था कि भाजपा पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ने जा रही है। हालांकि अगले ही दिन पार्टी ने अप्रत्याशित फैसला लेते हुए अभिषेक बंटी की जगह नीरज सिन्हा को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
नीरज सिन्हा को भाजपा का जमीनी कार्यकर्ता माना जाता है। बताया जा रहा है कि वह करीब 28 वर्षों से पार्टी संगठन से जुड़े हुए हैं और लंबे समय तक बूथ अध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके हैं। संगठन में उनकी सक्रिय भूमिका और लंबे अनुभव को देखते हुए पार्टी ने उन्हें चुनाव मैदान में उतारने का निर्णय लिया।
भाजपा की ओर से उम्मीदवार बदलने के फैसले पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इसे भाजपा की रणनीतिक विफलता बताते हुए कहा कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। राजद नेताओं का आरोप है कि उम्मीदवार बदलने की नौबत आना भाजपा की "पॉकेट पॉलिटिक्स" और आंतरिक असंतोष को दर्शाता है।
वहीं कांग्रेस ने भी भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि उम्मीदवार बदलने की घटना पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के भीतर गुटबाजी और समन्वय की कमी का संकेत देती है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पारदर्शी और सुविचारित होती, तो 24 घंटे के भीतर ऐसा बड़ा बदलाव करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
बिहार की राजनीति में सक्रिय जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने भाजपा के फैसले को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि उम्मीदवार बदलना पार्टी के भीतर चल रही राजनीतिक परिस्थितियों की ओर इशारा करता है। हालांकि भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए इसे पार्टी का आंतरिक और रणनीतिक निर्णय बताया है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनाव जीतने के उद्देश्य से पार्टी समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेती है। उनका दावा है कि नीरज सिन्हा लंबे समय से संगठन के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं और स्थानीय स्तर पर उनकी अच्छी पकड़ है। पार्टी को विश्वास है कि उनके नेतृत्व में भाजपा बांकीपुर उपचुनाव में बेहतर प्रदर्शन करेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उम्मीदवार बदलने का फैसला असामान्य जरूर है, लेकिन भारतीय राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। कई बार दल स्थानीय समीकरणों, संगठनात्मक फीडबैक या अन्य कारणों के आधार पर अंतिम समय में उम्मीदवार बदल देते हैं। हालांकि इस मामले में नामांकन के तुरंत बाद बदलाव होने के कारण यह मुद्दा अधिक चर्चा में आ गया है।
बांकीपुर विधानसभा सीट को पटना की महत्वपूर्ण शहरी सीटों में गिना जाता है। यहां का चुनाव हमेशा राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का विषय रहा है। इस बार भी भाजपा, राजद, कांग्रेस और अन्य दलों की नजर इस सीट पर है। ऐसे में उम्मीदवार बदलने का फैसला चुनावी रणनीति और प्रचार अभियान दोनों पर असर डाल सकता है।
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भाजपा के नए उम्मीदवार नीरज सिन्हा चुनावी मैदान में कितना प्रभाव छोड़ पाते हैं और विपक्ष इस मुद्दे को किस हद तक चुनावी प्रचार का हिस्सा बनाता है। फिलहाल भाजपा अपने फैसले को संगठन की रणनीति बता रही है, जबकि विपक्ष इसे पार्टी के भीतर असंतोष और नेतृत्व की कमजोरी से जोड़कर जनता के बीच उठाने की तैयारी में है।
बांकीपुर उपचुनाव का यह घटनाक्रम बिहार की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। आने वाले दिनों में चुनाव प्रचार तेज होने के साथ इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और भी बढ़ने की संभावना है।





