बिहार

बांस के हुनर ने बदली ममता की जिंदगी 3 हजार से पहुंची 30 हजार की कमाई

nidhi
24 Aug 2026 7:37 AM IST
बांस के हुनर ने बदली ममता की जिंदगी 3 हजार से पहुंची 30 हजार की कमाई
x
ममता की सफलता की सीढ़ी दस गुना बढ़ी मासिक आमदनी

समस्तीपुर : बिहार के समस्तीपुर में पारंपरिक बांस शिल्प ने एक महिला की जिंदगी बदल दी है। कभी सीमित आमदनी में परिवार चलाने के लिए संघर्ष करने वाली ममता देवी आज अपने हुनर के दम पर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गई हैं। जीविका से मिले सहयोग और प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने पारंपरिक बांस के काम को रोजगार का मजबूत जरिया बनाया। उनकी मासिक आमदनी करीब तीन हजार रुपये से बढ़कर 30 हजार रुपये तक पहुंच गई है।

ममता देवी पहले से बांस से सामान बनाने का काम जानती थीं, लेकिन उनके पास न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था। इस कारण मेहनत के बावजूद कमाई बेहद सीमित थी। परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करना मुश्किल होता था। इसके बावजूद उन्होंने अपने पारंपरिक हुनर को छोड़ने के बजाय उसे आगे बढ़ाने का फैसला किया। उनकी जिंदगी में बदलाव तब आया जब वह जीविका से जुड़ीं। यहां उन्हें अपने काम को बेहतर तरीके से करने, उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और उन्हें बाजार की मांग के अनुसार तैयार करने में सहयोग मिला। इसके बाद ममता ने बांस से बनने वाली पारंपरिक वस्तुओं के साथ कई उपयोगी और सजावटी उत्पाद तैयार करना शुरू किया।
बांस से बने सामान की मांग बढ़ने के साथ उनकी कमाई में भी सुधार होने लगा। पहले जहां महीने में करीब तीन हजार रुपये की आमदनी होती थी, वहीं अब अच्छी बिक्री के समय कमाई 30 हजार रुपये तक पहुंच रही है। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया है और ममता को अपने काम को आगे बढ़ाने का आत्मविश्वास भी मिला है। ममता की सफलता यह दिखाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद पारंपरिक हुनर को सही प्रशिक्षण, आर्थिक सहयोग और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो इसे रोजगार के बड़े साधन में बदला जा सकता है। बांस शिल्प में अपेक्षाकृत स्थानीय कच्चे माल का इस्तेमाल होता है और इससे घर से भी कई तरह के उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
ममता के लिए यह काम अब केवल आय का साधन नहीं रहा, बल्कि उनकी पहचान भी बन गया है। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में योगदान देने के साथ वह अपने हुनर को व्यवसाय का रूप देने में सफल हुई हैं। उनकी कहानी दूसरी ग्रामीण महिलाओं को भी स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकती है।
बिहार के ग्रामीण इलाकों में जीविका के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों और महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने की कोशिश की जाती रही है। ममता की कहानी इसी दिशा में पारंपरिक कौशल और आजीविका के मेल का उदाहरण है। समस्तीपुर जिले की बड़ी ग्रामीण आबादी के बीच ऐसे छोटे उद्यम स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
ममता की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने अपने पुराने हुनर को बदलते बाजार के साथ जोड़ा। सही मार्गदर्शन मिलने पर वही बांस, जो पहले मामूली आमदनी देता था, अब परिवार के लिए नियमित कमाई का आधार बन गया है। तीन हजार रुपये से 30 हजार रुपये तक पहुंची कमाई की यह यात्रा आसान नहीं रही, लेकिन मेहनत, प्रशिक्षण और अवसर ने ममता के जीवन में बड़ा बदलाव किया। आज उनकी कहानी बताती है कि ग्रामीण महिलाओं के हाथों में मौजूद पारंपरिक हुनर को सही मंच मिले तो वह आत्मनिर्भरता और बेहतर जीवन की मजबूत नींव बन सकता है।

Next Story