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बिहार में 52 फीसदी से ज्यादा बालूघाटों की नीलामी अटकी

Kavita2
10 Aug 2026 9:27 AM IST
बिहार में 52 फीसदी से ज्यादा बालूघाटों की नीलामी अटकी
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पटना। वित्तीय वर्ष 2026-27 के चार महीने बीत जाने के बावजूद बिहार में बालूघाटों की नीलामी की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। राज्य के 52 फीसदी से अधिक बालूघाट अब तक नीलामी से बाहर हैं। समय पर बालूघाटों की नीलामी नहीं होने का सीधा असर राज्य सरकार के राजस्व पर पड़ने की आशंका है। अनुमान है कि नीलामी में देरी के कारण सरकार को 650 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व का नुकसान हो सकता है।

बालूघाटों की नीलामी में देरी का असर केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं रहने वाला है। पर्याप्त संख्या में वैध बालूघाटों के संचालन में नहीं आने से निर्माण कार्यों के लिए बालू की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। मांग के मुकाबले वैध आपूर्ति कम होने पर जिलों में बालू की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। वहीं, बंद बालूघाटों की प्रभावी निगरानी नहीं होने पर अवैध खनन और बालू के अवैध कारोबार का खतरा भी बना हुआ है।

चार महीने बाद भी बड़ी संख्या में घाटों की नीलामी बाकी

वित्तीय वर्ष शुरू हुए चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन राज्य में 52 फीसदी से अधिक बालूघाटों की नीलामी की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई है। बालूघाटों की नीलामी समय पर नहीं होने से वैध खनन व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

सरकार के लिए बालूघाटों की नीलामी राजस्व जुटाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। घाटों की नीलामी से प्राप्त राशि राज्य के खजाने में जाती है। ऐसे में बड़ी संख्या में घाटों की नीलामी लंबित रहने से राजस्व संग्रह पर सीधा असर पड़ना स्वाभाविक है। अनुमान के मुताबिक, इस देरी से सरकार को 650 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो सकता है।

अवैध खनन की आशंका बढ़ी

बालूघाटों की नीलामी नहीं होने की स्थिति में संबंधित क्षेत्रों में वैध खनन गतिविधियां प्रभावित रहती हैं। इसके साथ ही बंद घाटों और नदी क्षेत्रों की निगरानी चुनौती बन सकती है। पर्याप्त निगरानी नहीं होने पर अवैध तरीके से बालू निकालने वाले तत्व इसका फायदा उठा सकते हैं।

अवैध खनन से न केवल सरकार को राजस्व का नुकसान होता है, बल्कि नदी के प्राकृतिक स्वरूप और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसके अलावा अवैध तरीके से निकाली गई बालू की ढुलाई और बिक्री से प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं।

ऐसे में नीलामी प्रक्रिया को जल्द पूरा करने के साथ-साथ उन घाटों और नदी क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाना भी जरूरी माना जा रहा है, जहां फिलहाल वैध खनन की अनुमति नहीं है।

बालू की कीमत बढ़ने की संभावना

बालूघाटों की नीलामी में देरी का असर आम लोगों और निर्माण क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। बिहार में मकान निर्माण से लेकर सड़क और अन्य आधारभूत संरचना से जुड़े कामों में बालू की बड़ी मांग रहती है। पर्याप्त वैध खनन नहीं होने की स्थिति में बाजार में बालू की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

यदि मांग बनी रहती है और वैध स्रोतों से आपूर्ति कम होती है तो इसका असर कीमतों पर पड़ सकता है। जिलों में बालू महंगा होने से निर्माण कार्य की लागत बढ़ने की संभावना है। इसका असर निजी मकान बनाने वाले लोगों के साथ-साथ निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों पर भी पड़ सकता है।

बालू की कीमत में बढ़ोतरी होने पर निर्माण सामग्री की कुल लागत भी बढ़ सकती है। ऐसे में नीलामी में देरी को जल्द दूर करना केवल राजस्व के लिहाज से ही नहीं, बल्कि निर्माण क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सरकार के राजस्व पर सीधा असर

बालूघाटों की नीलामी से सरकार को मिलने वाला राजस्व राज्य की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बड़ी संख्या में घाटों की नीलामी लंबित रहने से इस मद में अपेक्षित राजस्व की प्राप्ति नहीं हो पा रही है। चार महीने बीतने के बाद भी स्थिति सामान्य नहीं होने पर राजस्व नुकसान बढ़ने की आशंका है।

650 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान इस बात को दर्शाता है कि नीलामी प्रक्रिया में देरी का वित्तीय प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है। यदि लंबित घाटों की नीलामी जल्द नहीं होती है तो आने वाले महीनों में राजस्व नुकसान और बढ़ सकता है।

नीलामी प्रक्रिया जल्द पूरी करने की जरूरत

बालूघाटों की नीलामी में तेजी लाने के साथ प्रशासन के सामने अवैध खनन पर रोक लगाने की भी चुनौती है। जिन घाटों की नीलामी नहीं हुई है, वहां निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा, ताकि अवैध खनन और बालू की चोरी पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।

वहीं, जिन क्षेत्रों में वैध खनन शुरू हो चुका है, वहां भी नियमों के अनुसार खनन और परिवहन सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा। इससे बाजार में बालू की नियमित आपूर्ति बनी रह सकती है और कीमतों में अनावश्यक बढ़ोतरी की संभावना को कम किया जा सकता है।

निर्माण क्षेत्र पर भी पड़ सकता है असर

बिहार में सड़क, आवास और अन्य निर्माण गतिविधियां लगातार चलती रहती हैं। इन सभी कार्यों में बालू की आवश्यकता होती है। ऐसे में वैध बालू की उपलब्धता कम होने पर निर्माण कार्यों की लागत और गति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

अगर बालू की कीमत बढ़ती है तो इसका अतिरिक्त बोझ सीधे निर्माण कार्य से जुड़े लोगों और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। खासकर ऐसे परिवार जो अपने घर का निर्माण करा रहे हैं, उनके बजट पर इसका असर पड़ने की संभावना है।

फिलहाल वित्तीय वर्ष 2026-27 के चार महीने गुजरने के बाद भी 52 फीसदी से अधिक बालूघाटों की नीलामी लंबित है। इससे एक ओर राज्य सरकार को 650 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वैध बालू की उपलब्धता और अवैध खनन को लेकर भी चिंता बनी हुई है। अब निगाह इस बात पर है कि लंबित नीलामी प्रक्रिया कब तक पूरी होती है और सरकार राजस्व नुकसान के साथ-साथ अवैध खनन तथा बालू की बढ़ती कीमतों की संभावित चुनौती से कैसे निपटती है।

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