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मधेपुरा: बिहार के मधेपुरा में मां काली के एक धाम से जुड़ी कोसी नदी की धारा मोड़ने की मान्यता श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। दिए गए विवरण के अनुसार, भक्त इस स्थान को मां की कृपा और क्षेत्र की रक्षा से जोड़कर देखते हैं। काली पूजा के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं। नदी की धारा बदलने की बात धार्मिक विश्वास और स्थानीय कथा के रूप में कही जाती है; इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
मधेपुरा जिले में मां काली की आराधना की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है। चौसा, रामनगर महेश और मोहनपुर जैसे क्षेत्रों के काली मंदिरों से अलग-अलग कथाएं और पूजा परंपराएं जुड़ी हैं। इन मंदिरों के इतिहास को एक-दूसरे से अलग समझना जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों में कहीं नदी के पास प्रतिमा मिलने की कथा है, तो कहीं बाढ़ के समय देवी की प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिलने की मान्यता का उल्लेख मिलता है।
चौसा प्रखंड मुख्यालय स्थित सार्वजनिक काली मंदिर के बारे में स्थानीय परंपरा लगभग ढाई सौ वर्ष पुराने इतिहास का उल्लेख करती है। अक्टूबर 2024 में प्रकाशित रिपोर्ट में मंदिर समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सूर्य कुमार पटवे ने बताया था कि पहले इस स्थान पर जंगल और झाड़ियां थीं। पास की नदी में खुदाई के दौरान मां काली की छोटी प्रतिमा मिलने की कथा प्रचलित है। उनके अनुसार, ग्रामीणों के सहयोग से पहले झोपड़ीनुमा मंदिर बनाया गया और बाद में उसे पक्के मंदिर का रूप दिया गया। यह विवरण स्थानीय लोगों द्वारा सुनाई जाने वाली स्थापना कथा पर आधारित है।
चौसा के इस मंदिर में श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। भक्तों का विश्वास है कि मां के दरबार में की गई प्रार्थना स्वीकार होती है। मन्नत पूरी होने पर कुछ श्रद्धालु प्रतिमा निर्माण में सहयोग करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार आभूषण तथा अन्य चढ़ावा अर्पित करते हैं। संबंधित रिपोर्ट के अनुसार, यहां लगभग अस्सी के दशक से बलि प्रथा बंद है और काली पूजा पर दो दिवसीय मेले की परंपरा रही है।
काली पूजा के समय चौसा में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की खबरें भी प्रकाशित होती रही हैं। अक्टूबर 2025 की एक स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर के कपाट खुलते ही महिला और पुरुष श्रद्धालु दर्शन के लिए जुटे थे। भक्तों ने मां के चरणों में प्रार्थना की और परिसर में जयकारे गूंजे। उसी रिपोर्ट में चौसा क्षेत्र के बशैठा, लौआलगान और अरजपुर के काली मंदिरों में भी दर्शन के लिए लोगों के पहुंचने का उल्लेख है।
दूसरी ओर, बिहारीगंज प्रखंड के मोहनपुर स्थित काली मंदिर से कोसी की बाढ़ की एक अलग लोककथा जुड़ी है। अक्टूबर 2025 में प्रकाशित स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण बताते हैं कि बाढ़ के दौरान परिवार की अन्य धार्मिक प्रतिमाओं को दूसरे स्थान पर ले जाया गया था। लेकिन मां काली की प्रतिमा को हटाने का प्रयास सफल नहीं हुआ। इसे श्रद्धालु देवी की महिमा से जोड़ते हैं। यह कथा प्रतिमा के अपने स्थान पर रहने की है; इसमें कोसी की धारा मोड़ने की पुष्टि नहीं की गई है।
मोहनपुर के मंदिर के बारे में उसी रिपोर्ट में लगभग 1780 में स्थापना की स्थानीय जानकारी दी गई है। समय के साथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और 2025 में नवनिर्मित परिसर में प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई। यहां दीपावली पर विशेष काली पूजा और पारंपरिक अनुष्ठान किए जाने का उल्लेख है। मंदिर की वास्तु संरचना को दक्षिणेश्वर काली मंदिर से प्रेरित बताया गया है।
जिले के कुमारखंड प्रखंड की रामनगर महेश पंचायत में भी काली पूजा महत्वपूर्ण सामुदायिक आयोजन है। 27 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, वहां पूजा और चार दिवसीय मेले की तैयारियों को लेकर आयोजन समिति की बैठक हुई। प्रतिमा निर्माण, मंदिर के सौंदर्यीकरण, सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर चर्चा की गई। समिति ने ग्रामीणों से सहयोग की अपील करते हुए शांतिपूर्ण आयोजन पर जोर दिया। मधेपुरा के इन मंदिरों में श्रद्धा की परंपरा स्थानीय इतिहास, पारिवारिक स्मृतियों और लोककथाओं के साथ आगे बढ़ी है। आपके दिए शीर्षक में उल्लिखित धाम का नाम मिलने पर कोसी की धारा मोड़ने वाली मान्यता को उसी मंदिर के संदर्भ में अधिक सटीक रूप से जोड़ा जा सकेगा।
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