
पटना। बिहार सरकार ने राज्य में चीनी और गन्ना आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए निवेशकों को बड़ी सुविधाएं देने की घोषणा की है। नई चीनी मिल लगाने वाले पात्र निवेशकों को केवल एक रुपये की टोकन राशि पर अधिकतम 40 एकड़ सरकारी जमीन उपलब्ध कराई जाएगी। यह जमीन बेची नहीं जाएगी, बल्कि 30 वर्षों की लीज पर दी जाएगी। इसका प्रावधान बिहार गन्ना उद्योग निवेश प्रोत्साहन नीति 2026 में किया गया है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने बिहार में 25 नई चीनी मिलें स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ ही वर्षों से बंद पड़ी पुरानी चीनी मिलों को दोबारा शुरू करने और चालू मिलों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी काम किया जाएगा। सरकार का मानना है कि चीनी उद्योग के विस्तार से गन्ना उत्पादक किसानों को स्थानीय बाजार मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
नई चीनी मिलों की स्थापना में सबसे बड़ी समस्या पर्याप्त भूमि और शुरुआती निवेश की होती है। इसे देखते हुए सरकार ने एक रुपये की टोकन राशि पर अधिकतम 40 एकड़ सरकारी जमीन देने का निर्णय लिया है। पात्र निवेशक इस जमीन का इस्तेमाल 30 साल तक चीनी मिल लगाने और उससे जुड़ी औद्योगिक गतिविधियों के लिए कर सकेंगे। इस सुविधा का लाभ नीति की शर्तों को पूरा करने वाले निवेशकों को ही मिलेगा।
नई चीनी मिलों की स्थापना के काम को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई गई है। यह समिति निवेश प्रस्तावों, जमीन की उपलब्धता, विभागीय स्वीकृतियों और परियोजनाओं की प्रगति की निगरानी करेगी। अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय बनाकर निवेशकों की समस्याओं को निर्धारित समय में दूर करने की जिम्मेदारी भी इस समिति की होगी।
बिहार गन्ना उद्योग निवेश प्रोत्साहन नीति 2026 में भूमि के अलावा कई वित्तीय सुविधाओं का भी प्रावधान किया गया है। निवेशकों को जमीन की खरीद पर लगने वाले निबंधन और स्टांप शुल्क की शत-प्रतिशत राशि वापस करने की व्यवस्था है। इसके अलावा चीनी उत्पादन पर देय राज्य वस्तु एवं सेवा कर यानी एसजीएसटी की राशि पांच वर्षों तक वापस की जा सकती है। इसका उद्देश्य नई इकाइयों पर शुरुआती वर्षों में पड़ने वाले वित्तीय बोझ को कम करना है।
नीति के तहत निर्धारित उत्पादन क्षमता वाली नई चीनी मिलों को पूंजीगत सहायता भी मिलेगी। प्रतिदिन 3500 टन गन्ना पेराई क्षमता वाली मिल को अधिकतम 70 करोड़ रुपये तक का प्रोत्साहन दिए जाने का प्रावधान बताया गया है। इससे अधिक क्षमता लगाने पर सहायता की राशि बढ़ सकती है। प्रतिदिन 5000 टन गन्ना पेराई क्षमता वाली बड़ी चीनी मिल को पांच वर्षों में अधिकतम 100 करोड़ रुपये तक की सहायता मिल सकती है।
वित्तीय सहायता एक साथ देने के बजाय तय अवधि में किस्तों के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए निवेशकों को परियोजना पूरी करने, उत्पादन शुरू करने और निर्धारित शर्तों का पालन करने से संबंधित प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। सरकार का प्रयास है कि प्रोत्साहन का लाभ केवल वास्तविक और समय पर पूरी होने वाली परियोजनाओं को मिले।
नई नीति का दायरा केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं रखा गया है। सरकार चीनी मिलों से जुड़े एथेनॉल, बिजली उत्पादन, कम्प्रेस्ड बायोगैस और अन्य सहायक उद्योगों को भी बढ़ावा देना चाहती है। चीनी मिलों में गन्ने की पेराई के बाद बचने वाले अवशेषों से एथेनॉल, बिजली और जैव ईंधन तैयार किया जा सकता है। इससे मिलों को आय के अतिरिक्त स्रोत मिलेंगे और गन्ने के अवशेषों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
चीनी मिल खुलने से उसके आसपास के क्षेत्र में गन्ने की खेती का विस्तार होने की उम्मीद है। किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए अधिक दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी। परिवहन खर्च कम होने के साथ समय पर गन्ना खरीद और भुगतान की व्यवस्था मजबूत हो सकती है। हालांकि किसानों को वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब मिलें नियमित रूप से चलें और गन्ने की कीमत का भुगतान तय समय पर किया जाए।
राज्य में 25 नई चीनी मिलें खुलने से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में रोजगार पैदा होने की संभावना है। मिलों में तकनीकी कर्मचारी, मशीन ऑपरेटर, इंजीनियर, प्रशासनिक कर्मचारी और श्रमिकों की आवश्यकता होगी। इसके अलावा गन्ने की कटाई, ढुलाई, मशीनों की मरम्मत, पैकेजिंग, गोदाम और परिवहन जैसे क्षेत्रों में भी काम के अवसर बढ़ेंगे।
बिहार में कभी चीनी उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार था। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में कई बड़ी चीनी मिलें संचालित होती थीं। समय के साथ वित्तीय संकट, मशीनों के पुराने होने, गन्ने की उपलब्धता और प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं के कारण कई मिलें बंद हो गईं। मिलों के बंद होने से किसानों के साथ बड़ी संख्या में श्रमिकों और छोटे कारोबारियों पर असर पड़ा।
नई नीति के माध्यम से सरकार बंद पड़े उद्योगों को पुनर्जीवित करने के साथ निजी निवेश आकर्षित करना चाहती है। निवेशकों को जमीन, कर वापसी और पूंजीगत सहायता देकर परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहारिक बनाने का प्रयास किया जा रहा है। अधिकतम 40 एकड़ सरकारी जमीन एक रुपये में 30 साल की लीज पर देने का प्रावधान है।
नीति लागू होने के बाद अब सरकार के सामने उपयुक्त जमीन चिह्नित करने, निवेशकों का चयन करने और परियोजनाओं को निर्धारित समय में धरातल पर उतारने की चुनौती होगी। उच्चस्तरीय कमेटी निवेश प्रस्तावों की जांच करेगी। इसमें निवेश की क्षमता, परियोजना की तकनीक, गन्ने की उपलब्धता और रोजगार सृजन जैसे पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।
सरकार का लक्ष्य केवल नई मिलें स्थापित करना नहीं, बल्कि गन्ना आधारित एक पूरा औद्योगिक ढांचा विकसित करना है। यदि 25 नई चीनी मिलों की योजना समय पर पूरी होती है तो इससे गन्ना किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार, एथेनॉल उत्पादन और राज्य के औद्योगिक विकास को नई गति मिल सकती है।





