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Assam असम: केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल 14वें डिब्रूगढ़ पुस्तक मेले में शनिवार को मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने इस मेले का उद्घाटन किया और साहित्यिक गतिविधियों तथा असम और पूरे भारत में पढ़ाई और किताबों के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया। डिब्रूगढ़ पुस्तक मेले का आयोजन प्रत्येक वर्ष साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाता है। इस साल के मेले में देशभर के लेखक, प्रकाशक, पुस्तक प्रेमी और छात्र बड़ी संख्या में शामिल हुए। केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने उद्घाटन सत्र में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि पुस्तकें केवल ज्ञान का भंडार नहीं होतीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक चेतना को भी मजबूत करती हैं।
सोनोवाल ने कहा कि असम और पूर्वोत्तर क्षेत्र में साहित्य और भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए राज्य और केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर रही हैं। उन्होंने पुस्तक मेला जैसे आयोजनों को छात्रों, युवाओं और आम जनता के लिए ज्ञान और संस्कृति से जुड़ने का बेहतरीन माध्यम बताया। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के कई लेखकों के साथ बातचीत की और उनकी पुस्तकें पढ़ने और पढ़ाने के महत्व पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज की डिजिटल दुनिया में भी पुस्तकें लोगों को सटीक जानकारी, गहरी सोच और सामाजिक समझ प्रदान करने का सबसे प्रभावी जरिया हैं।
डिब्रूगढ़ पुस्तक मेले में इस साल लगभग 150 स्टॉल लगाए गए हैं, जिनमें विभिन्न प्रकाशनों और लेखकों की किताबें प्रदर्शित की गई हैं। मेले में विज्ञान, इतिहास, साहित्य, समाजशास्त्र, बच्चों की किताबें और स्थानीय भाषा में प्रकाशित पुस्तकें विशेष रूप से लोकप्रिय रहीं। सोनोवाल ने इस अवसर पर कहा कि सरकार पुस्तकालयों और स्कूलों में किताबों की पहुंच बढ़ाने के लिए विशेष पहल कर रही है। उन्होंने छात्रों और युवाओं से अपील की कि वे पुस्तक मेला और अन्य साहित्यिक आयोजनों में अधिक से अधिक भाग लें ताकि ज्ञान का प्रसार बढ़े और शिक्षा के स्तर में सुधार हो।
मंच पर उनके साथ असम के साहित्यकार, युवा लेखक और पुस्तक प्रेमी भी मौजूद रहे। मेले में विभिन्न सत्र आयोजित किए गए, जिनमें लेखक अपने अनुभव और साहित्यिक यात्रा साझा कर रहे थे। बच्चों और युवाओं के लिए विशेष कहानी-सुनाने के कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, जिससे युवा वर्ग का आकर्षण बढ़ा। केंद्रीय मंत्री ने मेले का दौरा करते हुए यह भी कहा कि भविष्य में इस तरह के आयोजनों को और बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाएगा, ताकि असम और पूर्वोत्तर क्षेत्र के साहित्य और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले।
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