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प्राकृतिक आवास का नुकसान बना खतरा
गुवाहाटी: पूर्वोत्तर भारत के मूल निवासी समुदायों की पारंपरिक खान-पान की आदतों में लंबे समय से खाने योग्य कीड़े शामिल रहे हैं। यहाँ लोग भृंग (बीटल) के लार्वा को स्थानीय मसालों के साथ भूनकर खाते हैं, और धान के खेतों से जलीय जीवों को इकट्ठा करते हैं। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में इस क्षेत्र में पाए जाने वाले खाने योग्य भृंगों की विविधता को दर्ज किया गया है। इसमें उनके पोषण संबंधी गुणों और उनके आवास (हैबिटेट) के सामने मौजूद खतरों पर प्रकाश डाला गया है।
'नेचर पोर्टफोलियो' जर्नल, 'एनपीजे एंटोमोलॉजी' (npj Entomology) में प्रकाशित इस अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के मूल निवासी समुदायों द्वारा खाए जाने वाले भृंगों और वीविल (एक प्रकार का भृंग) की 75 प्रजातियों को दर्ज किया गया है। इनमें से 24 प्रजातियों को पहली बार वैश्विक स्तर पर खाने योग्य के रूप में पहचाना गया है, जबकि पांच प्रजातियों को पहली बार भारत में खाद्य स्रोत के रूप में दर्ज किया गया है।
हालांकि, इस अध्ययन में भृंगों की घटती आबादी को लेकर चिंता भी जताई गई है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि वनों की कटाई, प्राकृतिक आवास का नष्ट होना और व्यावसायिक मांग के कारण इनका अत्यधिक संग्रह (हार्वेस्टिंग) इनकी घटती संख्या के मुख्य कारण हैं।
इस शोध का नेतृत्व 'अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट' (ATREE) के प्रियदर्शन धर्म राजन ने किया। इसमें स्वप्निल एस. बोयाने, आविका ढांडा, ए. पी. रंजीत और टी. शांतिबाला ने भी योगदान दिया। भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के 'नेशनल मिशन ऑफ हिमालयन स्टडीज' और 'बायोटेक्नोलॉजी विभाग' के सहयोग से किए गए इस अध्ययन में नौ मूल निवासी समुदायों के 162 लोगों के साक्षात्कार, फील्ड सर्वे और प्रयोगशाला में पोषण संबंधी विश्लेषण को शामिल किया गया।
शोधकर्ताओं ने इन कीड़ों से जुड़ी पारंपरिक संग्रह तकनीकों, भोजन बनाने के तरीकों, उनके मौसमी रूप से उपलब्ध होने, सांस्कृतिक प्रथाओं और औषधीय उपयोगों का दस्तावेजीकरण किया।
ये निष्कर्ष जैव विविधता को दर्ज करने और पोषण के वैकल्पिक स्रोतों की पहचान करने में मूल निवासियों के पारिस्थितिक ज्ञान (इकोलॉजिकल नॉलेज) के महत्व को रेखांकित करते हैं। साथ ही, ये उन पारिस्थितिक तंत्रों (इकोसिस्टम) को संरक्षित करने की आवश्यकता पर भी जोर देते हैं, जो इन प्रजातियों और उनसे जुड़ी खाद्य परंपराओं को बनाए रखते हैं।
खाने योग्य भृंगों में अलग-अलग मात्रा में प्रोटीन होता है।
भृंगों की चार प्रजातियों के पोषण संबंधी विश्लेषण से पता चला है कि उनके सूखे वजन (ड्राई वेट) में प्रोटीन की मात्रा 22.43% से लेकर 61% तक होती है, और अलग-अलग प्रजातियों के बीच इसमें काफी अंतर पाया जाता है। कोकोनट राइनोसिरस बीटल (ओरिक्टेस राइनोसिरस) और बांस के घुन (बैम्बू वीविल्स - जीनस साइरटोट्राचेलस) में सबसे अधिक प्रोटीन पाया गया, जो उनके सूखे वजन का 46.44% से 61% तक था। जलीय भृंगों (एक्वेटिक बीटल्स) में प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत कम, यानी 22.43% से 23.23% के बीच थी।
विश्लेषण में यह भी पाया गया कि अध्ययन की गई चारों प्रजातियों में वसा, नमी, ऊर्जा और खनिजों की मात्रा अलग-अलग थी।
निष्कर्षों के अनुसार, खाने योग्य भृंग (बीटल्स) आहार में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं, हालांकि इनका पोषण मूल्य अलग-अलग प्रजातियों में काफी भिन्न होता है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि सभी खाने योग्य कीड़ों का पोषण मूल्य एक जैसा नहीं होता, इसलिए उन्हें एक समान नहीं माना जाना चाहिए।
यह अध्ययन ऐसे समय में आया है जब पशु प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोत के रूप में कीड़ों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुचि बढ़ रही है। पारंपरिक पशुपालन में भूमि और जल संसाधनों की भारी खपत होती है और इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी होता है, जिसके कारण शोधकर्ता भोजन के अन्य स्रोतों की तलाश कर रहे हैं।
हालांकि, पूर्वोत्तर भारत में कीड़ों का सेवन कोई नई बात नहीं है। यहां कई स्थानीय समुदायों में यह एक पुरानी परंपरा है, जहां खाने योग्य प्रजातियों और उन्हें पकाने के तरीकों का ज्ञान पीढ़ियों से चला आ रहा है।
अंगामी समुदाय में खाने योग्य प्रजातियों की संख्या सबसे अधिक है।
अध्ययन में पाया गया कि अलग-अलग समुदायों द्वारा खाए जाने वाले भृंगों की विविधता में काफी अंतर है, जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र, खान-पान की प्राथमिकताओं और पारंपरिक ज्ञान में भिन्नता को दर्शाता है।
नागालैंड के अंगामी समुदाय में 31 प्रजातियों का सेवन किया जाता है, जो अध्ययन में शामिल सभी समुदायों में सबसे अधिक है। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश का न्यिशी समुदाय आता है, जो 27 प्रजातियों का सेवन करता है, जबकि मणिपुर के मैतेई समुदाय में 7 प्रजातियों के सेवन की जानकारी मिली है।
कई प्रजातियां ऐसी थीं जिनका सेवन केवल एक ही समुदाय द्वारा किया जाता है, जिससे पता चलता है कि अलग-अलग समूहों द्वारा खाए जाने वाले भृंगों में बहुत कम समानता है।
इन कीड़ों को जंगलों, बांस के झुरमुटों, आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) और धान के खेतों जैसे विभिन्न स्थानों से इकट्ठा किया गया था। इनकी उपलब्धता भी मौसम के अनुसार बदलती रहती है।
लुकेनिडे (Lucanidae), स्कारैबिडे (Scarabaeidae) और पैसलिडे (Passalidae) परिवारों के स्थलीय भृंग आमतौर पर अप्रैल से नवंबर के बीच मिलते हैं। जलीय भृंग और राइनोसिरस बीटल मई से दिसंबर के बीच पाए जाते हैं, जबकि लॉन्गहॉर्न बीटल मुख्य रूप से मानसून से पहले और मानसून के दौरान देखने को मिलते हैं।
इन्हें पकाने के तरीकों में उबालना, भूनना और तलना शामिल है, जिसमें अक्सर स्थानीय मसालों और बांस के कोपलों (बैम्बू शूट्स) का इस्तेमाल किया जाता है। जहाँ कुछ समुदायों ने शरीर के खास हिस्सों को प्राथमिकता दी, वहीं अन्य समुदायों ने पूरे कीट का ही सेवन किया।
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