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सियांग परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन कई हिरासत में
डूमडूमा: नई दिल्ली में अरुणाचल भवन के बाहर सैकड़ों छात्रों और कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। उनकी मांग थी कि हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा किया जाए, अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' को रद्द किया जाए, और राज्य में तैनात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) को वापस बुलाया जाए।
यह प्रदर्शन 'हिमखंड' और 'यूथ फॉर चेंज' द्वारा आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना के खिलाफ नारे लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस परियोजना का विरोध कर रहे स्थानीय समुदायों और छात्र संगठनों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया है।
दिल्ली पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जिनमें 'सियांग हाइड्रोपावर एक्टिविस्ट' काटन मोयोंग (जिन्हें अबोरमैन के नाम से भी जाना जाता है) शामिल हैं। अरुणाचल भवन के बाहर भारी पुलिस बल की तैनाती भी देखी गई।
अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार इस परियोजना को एक बड़ी जलविद्युत और बहुउद्देशीय बुनियादी ढांचा परियोजना के रूप में आगे बढ़ा रही है। हालांकि, विरोध करने वालों का कहना है कि सियांग घाटी के स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर इसके संभावित प्रभावों का सही ढंग से आकलन नहीं किया गया है।
पूरे अरुणाचल प्रदेश में इस परियोजना का विरोध बढ़ रहा है। 'आदि बाने केबांग यूनाइटेड' और 'सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम' जैसे स्थानीय संगठनों ने चिंता जताई है कि इस परियोजना से उनके पूर्वजों की ज़मीन डूब सकती है, गांवों को विस्थापित होना पड़ सकता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है। सियांग क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील पूर्वी हिमालयी बेल्ट में स्थित है और यहां समृद्ध जैव विविधता पाई जाती है। यहां के प्राकृतिक संसाधन स्थानीय समुदायों की आजीविका का आधार भी हैं।
पिछले हफ्ते पासीघाट में हुए प्रदर्शनों के दौरान तनाव तब और बढ़ गया, जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसके बाद स्थिति हिंसक हो गई।
अधिकारियों के अनुसार, इस दौरान पथराव हुआ, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी घायल हो गए और सार्वजनिक तथा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा।
दिल्ली में हुए इस प्रदर्शन के जरिए आयोजकों ने स्थानीय समुदायों की चिंताओं की ओर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की और परियोजना को वापस लेने की मांग की।
उनका तर्क है कि विकास ऐसा नहीं होना चाहिए जिसकी कीमत लोगों को अपनी पुश्तैनी ज़मीन, सांस्कृतिक पहचान और प्रभावित समुदायों के अधिकारों को खोकर चुकानी पड़े।
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